Monday, 19 December 2011

रूस में गीता पर प्रतिबंध बारे फैसला 28 तक टाला

रूस में गीता पर प्रतिबंध बारे फैसला 28 तक टाला
सनातन धर्म को भारतीय सरकार द्वारा अनदेखा करने के कारण मुर्ख अज्ञानी भी अपनी बोली बोलने लगे हैं रूस भी उन्ही में से एक है ,भारत में तो हर कोई रुसी ही बना हुआ है ,यही सनातन विरोधी समय आने पर भगवान द्वारा सनातन पक्ष में उतर आते हैं

Thursday, 15 December 2011

Thursday, 1 December 2011

-समर्पण त्रिवेदी.


- यस्क मुनि के अनुसार-



जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात्‌ भवेत द्विजः।



वेद पाठात्‌ भवेत्‌ विप्रःब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः।।



अर्थात - व्यक्ति जन्मतः शूद्र है। संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। किंतु जो ब्रह्म को जान ले, वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधिकारी है।

- योग सूत्र व भाष्य के रचनाकार पतंजलि के अनुसार


 विद्या तपश्च योनिश्च एतद् ब्राह्मणकारकम्।

विद्यातपोभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव स:॥


अर्थात- ''विद्या, तप और ब्राह्मण-ब्राह्मणी से जन्म ये तीन बातें जिसमें पाई जायँ वही पक्का ब्राह्मण है, पर जो विद्या तथा तप से शून्य है वह जातिमात्र के लिए ब्राह्मण है, पूज्य नहीं हो सकता'' (पतंजलि भाष्य 51-115)।


-महर्षि मनु के अनुसार


विधाता शासिता वक्ता मो ब्राह्मण उच्यते।


तस्मै नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कां गिरमीरयेत्॥



अर्थात- शास्त्रो का रचयिता तथा सत्कर्मों का अनुष्ठान करने वाला, शिष्यादि की ताडनकर्ता, वेदादि का वक्ता और सर्व प्राणियों की हितकामना करने वाला ब्राह्मण कहलाता है। अत: उसके लिए गाली-गलौज या डाँट-डपट के शब्दों का प्रयोग उचित नहीं'' (मनु; 11-35)।

-महाभारत के कर्ता वेदव्यास और नारदमुनि के अनुसार
"जो जन्म से ब्राह्मण हे किन्तु कर्म से ब्राह्मण नहीं हे उसे शुद्र (मजदूरी) के काम में लगा दो"
(सन्दर्भ ग्रन्थ - महाभारत)

-महर्षि याज्ञवल्क्य व पराशर व वशिष्ठ के अनुसार
"जो निष्कारण (कुछ भी मिले एसी आसक्ति का त्याग कर के) वेदों के अध्ययन में व्यस्त हे और वैदिक विचार संरक्षण और संवर्धन हेतु सक्रीय हे वही ब्राह्मण हे."
(सन्दर्भ ग्रन्थ - शतपथ ब्राह्मण, ऋग्वेद मंडल १०., पराशर स्मृति)

-भगवद गीता में श्री कृष्ण के अनुसार
"शम, दम, करुणा, प्रेम, शील(चारित्र्यवान), निस्पृही जेसे गुणों का स्वामी ही ब्राह्मण हे" 

-जगद्गुरु शंकराचार्य के अनुसार
"ब्राह्मण वही हे जो "पुंस्त्व" से युक्त हे. जो "मुमुक्षु" हे. जिसका मुख्य ध्येय वैदिक विचारों का संवर्धन हे. जो सरल हे. जो नीतिवान हे, वेदों पर प्रेम रखता हे, जो तेजस्वी हे, ज्ञानी हे, जिसका मुख्य व्यवसाय वेदोका अध्ययन और अध्यापन कार्य हे, वेदों/उपनिषदों/दर्शन शास्त्रों  का संवर्धन करने वाला ही ब्राह्मण हे"
(सन्दर्भ ग्रन्थ - शंकराचार्य विरचित विवेक चूडामणि, सर्व वेदांत सिद्धांत सार संग्रह, आत्मा-अनात्मा विवेक)
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किन्तु जितना सत्य यह हे की केवल जन्म से  ब्राह्मण होना संभव नहीं हे. कर्म से कोई भी ब्राह्मण बन शकता हे यह भी उतना ही सत्य हे.
इसके कई प्रमाण वेदों और ग्रंथो में मिलते हे जेसे.....

(a) ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे | परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की| ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है|
(b) ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे | जुआरी और हीन चरित्र भी थे | परन्तु बाद मेंउन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये|ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया | (ऐतरेय ब्राह्मण २.१९)
(c) सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए |
(d) राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र होगए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.१.१४)
(e) राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए | पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.१.१३)
(f) धृष्ट नाभाग के पुत्र थे परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.२.२)
(g) आगे उन्हींके वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.२.२)
(h) भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य ब्राह्मण हुए |
(i) विष्णुपुराण और भागवत के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने |
(j) हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मणहुए | (विष्णु पुराण ४.३.५)
(k) क्षत्रियकुल में जन्में शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.८.१) वायु, विष्णु और हरिवंश पुराण कहते हैं कि शौनक ऋषि के पुत्र कर्म भेद से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए| इसी प्रकार गृत्समद, गृत्समति और वीतहव्यके उदाहरण हैं |
(l) मातंग चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने |
(m) ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपनेकर्मों से राक्षस बना |
(n) राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ |
(o) त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे |
(p) विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्रवर्ण अपनाया | विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया |
(q) विदुर दासी पुत्र थे | तथापि वे ब्राह्मण हुए और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया |
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मित्रों, ब्राह्मण की यह कल्पना व्यावहारिक हे के नहीं यह अलग विषय हे किन्तु भारतीय सनातन संस्कृति के हमारे पूर्वजो व ऋषियो ने ब्राह्मण की जो व्याख्या दी हे उसमे काल के अनुसार परिवर्तन करना हमारी मूर्खता मात्र होगी. वेदों-उपनिषदों से दूर रहने वाला और ऊपर दर्शाये गुणों से अलिप्त व्यक्ति चाहे जन्म से ब्राह्मण हों या ना हों लेकिन ऋषियों को व्याख्या में वह ब्राह्मण नहीं हे. अतः आओ हम हमारे कर्म और संस्कार तरफ वापस बढे.
"कृण्वन्तो विश्वम् आर्यम" साकारित करे.
सर्वं खल्विदं ब्रह्मं. ओम.
-समर्पण त्रिवेदी.



श्रीकृष्ण - आदर्श गृहस्थी


भगवान श्रीकृष्ण का जीवन आदर्श गृहस्थी का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। कहते हैं श्रीकृष्ण की 16 हजार से अधिक रानियां थीं। इनमें से तीन प्रमुख थीं। इसके बाद भी श्रीकृष्ण के दाम्पत्य में कभी आप अशांति नहीं पाएंगे क्योंकि श्रीकृष्ण सुखी गृहस्थ जीवन के गूढ़ रहस्यों को जानते थे। गृहस्थ जीवन के इन्हीं प्रमुख सात सूत्रों के बारे में श्रीमद्भागवत में विस्तृत वर्णन किया गया है जो श्रीकृष्ण ने संसार को दिए हैं।

सुखी गृहस्थ जीवन का पहला सूत्र है संयम। पति-पत्नी के बीच में संयम होना अति आवश्यक है। यदि पति-पत्नी के जीवन में संयम होगा तो जीवन आनंदमय कटेगा। दाम्पत्य का दूसरा सूत्र है संतुष्टि। संतोष के अभाव में दाम्पत्य का सुखमय होना मुश्किल है। इसी प्रकार सुखी गृहस्थ जीवन के अन्य सूत्र जो श्रीकृष्ण ने दिए हैं वे हैं संतान, संवेदनशीलता, संकल्प, सक्षम और अंतिम सूत्र है समर्पण।भागवत के अनुसार इन सभी सूत्रों का पालन करने पर भी यदि दाम्पत्य में प्रेम न पवित्रता नहीं है तो यह सब व्यर्थ है।

इन सात सूत्रों का पालन कर तथा जीवन में प्रेम व पवित्रता को लाकर हम भी हमारा गृहस्थ जीवन सुखमय बना सकते हैं।
हरे कृष्ण
यह ग्रहस्थी
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    • सनातन धर्म ‎,इन नियमों को अपनाना ही ग्रहस्थी का तप है | आसन मुद्रा वगेरा -वगेरा नही | इस रहस्यको जान्ने वाले भगत कबीर और लोई उदाहर्ण हैं |

ढोल,गँवार ,सूद्र ,पसु ,नारी।सकल ताड़ना के अधिकारी।।


रामचरितमानस का पारायण हम बचपन से ही करते आ रहे हैं। शुरुआत में तो अंत्याक्षरी में अपने जौहर दिखाने के लिये। उन दिनों हमारे गुरुजी कविताओं तथा रामचरितमानस की चौपाइयों के आधार पर अंत्याक्षरी कराते। कवितायें तो गिनी-चुनी याद थीं लेकिन चौपाइयों-दोहे की संपदा दिन-पर-दिन बढ़ती गई। बाद में देखा कि हर खुशी के मौके पर लोग ‘रामायण’ का अखंड पाठ कराते। पाठ दो दिन चलता। श्रद्धालु लोग कभी द्रुत, कभी विलम्बित लय में मानस का पाठ करते। तमाम हनुमान भक्त हर सोमवार को सुंदरकाण्ड का पाठ करते हैं।
बाद में मानस से और जुड़ाव होता गया। नीति संबंधी दोहे-चौपाइयों का रामचरितमानस में अद्भुत संकलन है। हमने भी तमाम प्रश्नों के उत्तर रामशलाका प्रश्नावली में खोजे। रामचरित मानस लोकमंगलकारी ग्रन्थ के रूप में जाना जाता है। लेकिन समय-समय पर इसके तमाम अंशो पर सवाल उठाये जाते रहते हैं। इसमें से एक चौपाई जिसका सबसे ज्यादा जिक्र होता है वह है:-

ढोल,गँवार ,सूद्र ,पसु ,नारी।सकल ताड़ना के अधिकारी।।


अक्सर इस चौपाई को लेकर दलित संगठन,महिला संगठन तथा कभी-कभी मानवाधिकार संगठन भी अपना आक्रोश जताते हैं। कुछ लोग इसे रामचरितमानस से निकालने की मांग करते हैं। कभी मानस की प्रतियां जलाते हैं। तुलसीदास को प्रतिगामी दलित,महिला विरोधी बताते हैं। अगर आज वे होते शायद तस्लीमा नसरीन की तरह या सलमान रस्दी की तरह देशबदर न सही तो जिलाबदर तो कर ही दिये जाते।
वैसे तुलसीदास जी के रचे तमाम प्रसंगों से ऐसा लगता है कि गोस्वामी जी आदतन स्त्री विरोधी थे। शायद अपने जीवन के कटु अनुभव हावी रहे हों उनपर। नहीं तो वे राम के साथ सीताजी की तरह लक्ष्मण के साथ उर्मिलाजी को भी वन भेज देते या फिर रामचन्द्रजी से सीता त्याग की बजाय सिंहासन त्याग करवाते तथा रामचन्द्रजी को और बड़ा मर्यादा पुरुषोत्तम दिखाते।
बहरहाल यह चौपाई बहुत दिन से मेरे मन में थी तथा मैं यह सोचता था कि क्यों लिखा ऐसा बाबाजी ने। मैं कोई मानस मर्मज्ञ तो हूं नहीं जो इसकी कोई अलौकिक व्याख्या कर सकूं। फिर भी मैं सोचता था कि ‘बंदउं संत असज्जन चरना’लिखकर मानस की शुरुआत करने वाला व्यक्ति कैसे समस्त ‘शूद्र’ तथा ‘स्त्री’ को पिटाई का पात्र मानता है।
कल फिर से मैंने यह चौपाई पढ़ी। अचानक मुझे स्व.आचार्य विष्णु कांत शास्त्री जी का एक व्याख्यान याद आया। दो साल पहले उन्होंने किसी रचना पर विचार व्यक्त करते हुये सारगर्भित व्याख्यान दिया था । तमाम उदाहरण देते हुये स्थापना की थी कि श्रेष्ठ रचनाकार अपने अनुकरणीय आदर्शों की स्थापना अपने आदर्श पात्र से करवाता है। अनुकरणीय आदर्श ,कथन अपने श्रेष्ठ पात्र के मुंह से कहलवाता है।

इस वक्तव्य की रोशनी में मैंने सारा प्रसंग नये सिरे से पढ़ा। यह प्रसंग उस समय का है जब हनुमानजी सीता की खबर लेकर वापस लौट आये थे। तथा राम सीता मुक्ति हेतु अयोध्या पर आक्रमण करने के लिये समुद्र से रास्ता देने की
विनती कर रहे थे। आगे पढ़ें:-

विनय न मानत जलधि जड़ गये तीन दिन बीत।

बोले राम सकोप तब भय बिनु होय न प्रीत ।। 

(इधर तीन दिन बीत गये,किंतु जड़ समुद्र विनय नहीं मानता। तब रामजी क्रोधसहित बोले- बिना भय के प्रीति नहीं होती)

लछिमन बान सरासन आनू।सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु।।
सठ सन बिनय कुटिल सम प्रीती।सहज कृपन सन सुंदर नीती।। 

(हे लक्ष्मण! लाओ तो धनुष-बाण। मैं अग्निबाण से समुद्र को सोख डालूं। मूर्ख से विनय, कुटिल के साथ प्रीति, कंजूस से उदारता की बात)


ममता रत सम ग्यान कहानी।अति लोभी सन बिरति बखानी ।।

क्रोधिहिं सम कामिहि हरि कथा।ऊसर बीज बएँ फल जथा ।।

(ममता में डूबे व्यक्ति से ज्ञान की कहानी,लोभी से वैराग्य का वर्णन,क्रोधी से शान्ति की बात और कामी से भगवान की कथा, इनका फल वैसा ही व्यर्थ होता है जैसा ऊसर में बीज बोने से होता है)

अस कहि रघुपति बान चढ़ावा।यह मत लछिमन के मन भावा ।।

संधानेउ प्रभु बिसिख कराला।उठी उदधि उर अंतर ज्वाला ।।

 (ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी ने धनुष चढ़ाया। यह मत लक्ष्मणजी के मन को बहुत अच्छा लगा। प्रभु ने भयानक अग्निबाण सन्धान किया,समुद्र के हृदय में अग्नि की ज्वाला उठी)


मकर उरग झष गन अकुलाने।जरत तुरंत जलनिधि जब जाने।।

कनक थार भरि मनि गन नाना।बिप्र रूप आयउ तजि माना।।

(मगर,सांप तथा मछलियों के संमूह व्याकुल हो गये। जब समुद्र ने जीवों को जलते जाना तब सोने के थाल में अनेक रत्नों को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मण के रूप में आया)

काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।

बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।। 

(चाहे कोई कितने ही उपाय कर ले पर केला तो काटने पर ही फलता है । नीच विनय से नहीं मानता वह डांटने पर ही रास्ते पर आता है।)

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे।छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।

गगन समीर अनल जल धरनी।इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।

 (समुद्र ने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़कर कहा-हे नाथ! मेरे सब अवगुण क्षमा कीजिये। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि ,जल और पृथ्वी- इन सब की करनी स्वभाव से ही जड़ है।)

तव प्रेरित माया उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।

प्रभु आयसु जेहिं कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।। 

(आपकी प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि के लिये उत्पन्न किया है,सब ग्रन्थों ने यही गाया है। जिसके लिये स्वामी की जैसी आज्ञा है,वह उसी प्रकार रहने में सुख पाता है।)

प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही।मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।

ढोल , गँवार ,सूद्र ,पसु नारी।सकल ताड़ना के अधिकारी।।

 (प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे दण्ड दिया। किंतु मर्यादा(जीवों का स्वभाव भी आपकी ही बनायी हुई है। ढोल,गँवार,शूद्र,पशु और स्त्री -ये सब दण्ड के अधिकारी हैं)

प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई।उतरिहि कटकु न मोरि बढ़ाई।।

प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई।करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई।।


 (प्रभु के प्रताप से मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जायेगी,इसमें मेरी मर्यादा नहीं नहीं रहेगी। तथापि आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं हो सकता । ऐसा वेद गाते हैं । अब आपको जो अच्छा लगे, मैं तुरंत वही करूँ।)
अंत में समुद्र ने विधि बताई कि नल-नील नामक दो भाई हैं जिनके स्पर्श से पत्थर तैरने लगते हैं। उनके हाथ से पुल बने जिसके ऊपर से वानर सेना लंका जा सकती है।
बहरहाल यह तय हुआ कि यह विवादास्पद चौपाई राम ने नहीं कही। अत: यह तुलसीदास जी का मंतव्य नहीं था। यह किसी भी तरह से उनका आदर्श नहीं था। यहां समुद्र अधम पात्र के रूप में चित्रित है। अधम माने आज के विलेन टाइप के। या फिर कैरेक्टर रोल की तरह जो शुरु में खराब रहते हैं तथा बाद में सुधर जाते हैं। तो ऐसे पात्र के मुंह से कही बात कवि का आदर्श नहीं हो सकती। अत: इस चौपाई के ऊपर लोगों का अपने कपड़े फाड़ना शायद जायज नहीं है।
शायद आप यह समझें कि मैं तुलसीदास के नकारात्मक मूल्यों को सही ठहराना चाहता हूं। लेकिन ऐसा कतई नहीं हैं। मैं तो चीजों को उनके संदर्भ में रखने की कोशिश कर रहा हूं। आप सहमत हों तो ठीक । न हों तो आपकी मर्जी।

Sunday, 27 November 2011

देश का दुश्मन कोन !

9041661207 ---? देश   का  दुश्मन  कोन !



राजा अपनी प्रजा के द्वारा किये पापों को भोगता है |


उसका फर्ज है की पाप कर्म को बड़ने ना दे ||


इसी तरहा राजाके पाप को पुरोहित भोगता है |


पति अपनी पत्नी के द्वारा किये पापको और गुरु अपने 


शिष्य के द्वारा किये पाप कर्म को भोगता है ||


इन सभी का सनातन धर्म है क़ि इन को पाप कर्म करने 


से रोकें अन्यथा दोनों क़ि ही बड़ी हानि होती है |


यह दोनों ही देश के दुश्मन कहलाते हैं |||||

Saturday, 26 November 2011

गीता श्री कृष्ण की वाणी


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19. 0702 KRISHNA STORY -- BHAGWAT GITA -- CONCENTRATION IN GOD -- DHYAN YOGA
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Gगीता श्री कृष्ण की वाणी
हे प्रभु आप खुद ही माया में क्यों फंसाते हैं ?आप से बड़ा ज्ञानि इस ब्रह्मांड  में नही मिलने वाला क्या आप हमारे गुरु बनने के योग्य नही ,जो सांसारिक गुरु तलाशा जाए ?
  संपूर्ण गोपनीयों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन। तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे कहूँगा॥64॥ हे प्रभु आप खुद ही माया में क्यों फंसाते हैं ?आप से बड़ा ज्ञानि इस ब्रह्मांड में नही मिलने वाला क्या आप हमारे गुरु बनने के योग्य नही ,जो सांसारिक गुरु तलाशा जाए ?
संपूर्ण धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण (इसी अध्याय के श्लोक 62 की टिप्पणी में शरण का भाव देखना चाहिए।) में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर॥66॥
जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा- इसमें कोई संदेह नहीं है॥68॥
उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है तथा पृथ्वीभर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं॥69॥
जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है-

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
भावार्थ : क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित्‌ मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाए क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं॥23॥
यदि उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्‌ ।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥
भावार्थ : इसलिए यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ और मैं संकरता का करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ॥24॥