Saturday, 30 July 2011

शिव जी न हँस कर कहा, “इस संसार में न तो कोई ज्ञानी है और न मूर्ख।



जब शिव जी ने पार्वती जी को बताया कि देवर्षि नारद ने श्री हरि (विष्णु) को शाप दिया था तो वे बड़ी चकित हुईं। और बोलीं, “नारद जी तो विष्णुभक्त और अत्यन्त ज्ञानी हैं। फिर उन्होंने भगवान को शाप किस कारण से दिया?”
शिव जी न हँस कर कहा, “इस संसार में न तो कोई ज्ञानी है और न मूर्ख। श्री रघुनाथ जी जब जिसको जैसा करते हैं, वह उसी क्षण वैसा ही हो जाता है। मैं तुम्हें नारद जी की कथा सुनाता हूँ। हिमालय पर्वत में एक बड़ी पवित्र गुफा थी। उस गुफा के निकट ही गंगा जी बहती थीं। वह परम पवित्र गुफा नारद जी को अत्यन्त सुहावनी लगी। वहाँ पर के पर्वत, नदी और वन को देख कर उनके हृदय में लक्ष्मीकान्त विष्णु जी की भक्ति अत्यन्त बलवती हो उठी और वे वहीं बैठ कर तपस्या में लीन हो गये। नारद मुनि की इस तपस्या से देवराज इन्द्र भयभीत हो उठे कि कहीं देवर्षि नारद अपने तप के बल से इन्द्रपुरी को अपने अधिकार में न ले लें। इन्द्र ने नारद की तपस्या भंग करने के लिये कामदेव को उनके पास भेज दिया। वहाँ पहुँच कर कामदेव ने अपनी माया से वसन्त ऋतु को उत्पन्न कर दिया। वृक्षों और लताओं में रंग-बिरंगे फूल खिल गये, कोयलें कूकने लगीं और भौंरे गुंजार करने लगे। कामाग्नि को भड़काने वाली शीतल-मन्द-सुगन्ध सुहावनी हवा चलने लगी। रम्भा आदि नवयुवती अप्सराएँ नृत्य व गान करने लगीं।
किन्तु कामदेव की किसी भी कला का नारद मुनि पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा। तब कामदेव को भय सताने लगा कि कहीं देवर्षि मुझे शाप न दे दें। हारकर वे देवर्षि के चरणों में गिर कर क्षमा माँगने लगे। नारद मुनि को थोड़ा भी क्रोध नहीं आया और उन्होंने कामदेव को क्षमा कर दिया। कामदेव वापस अपने लोक में चले गये।
कामदेव के चले जाने पर नारद मुनि के मन में अहंकार हो गया कि हमने कामदेव को जीत लिया। वहाँ से वे शिव जी के पास चले गये और उन्हें अपने द्वारा कामदेव को जीतने का विवरण कह सुनाया। भगवान शिव समझ गये कि इन्हें अहंकार हो गया है। शंकर जी ने सोचा कि यदि इनके अहंकार की बात विष्णु जी जान गये तो देवर्षि का अहित ही होगा। अतः उन्होंने नारद से कहा कि तुमने जो कथा मुझे बताई है उसे श्री हरि को मत बताना।
नारद जी को शिव जी की यह बात अच्छी नहीं लगी। श्री राम की इच्छा ही बलवती होती है अतः नारद जी क्षीरसागर में पहुँच गये और शिव जी के मना करने के बाद भी सारी कथा उन्हें सुना दी। भगवान विष्णु तत्काल समझ गये कि इनके मन को अहंकार ने घेर लिया है। अपने भक्त के अहंकार को वे सह नहीं पाते इसलिये उन्होंने अपने मन में सोचा कि मैं ऐसा उपाय करूँगा कि नारद का अहंकार भी दूर हो जाये और मेरी लीला भी चलती रहे।
नारद जी जब श्री विष्णु से विदा होकर चले तो उनका अभिमान और भी बढ़ गया।
इधर श्री हरि ने अपनी माया से नारद जी के रास्ते में सौ योजन का एक अत्यन्त सुन्दर नगर रच दिया। उस नगर में शीलनिधि अत्यन्त वैभवशाली राजा रहता था। उस राजा की विश्वमोहिनी नाम की ऐसी रूपवती कन्या थी जिसके रूप को देख कर साक्षात् लक्ष्मी भी मोहित हो जायें। विश्वमोहिनी स्वयंवर करना चाहती थी इसलिये अनगिनत राजा उस नगर में आये हुए थे।
नारद जी उस नगर के राजा के यहाँ पहुँचे तो राजा ने उनका पूजन कर के उन्हें आसन पर बैठाया। फिर उनसे अपनी कन्या की हस्तरेखा देख कर उसके गुण-दोष बताने के लिया कहा। उस कन्या के रूप को देख कर नारद मुनि वैराग्य भूल गये और उसे देखते ही रह गये। उस कन्या की हस्तरेखा बता रही थी कि उसके साथ जो ब्याह करेगा वह अमर हो जायेगा, उसे संसार में कोई भी जीत नहीं सकेगा और संसार के समस्त चर-अचर जीव उसकी सेवा करेंगे। इन लक्षणों को नारद मुनि ने अपने तक ही सीमित रखा और राजा को उन्होंने अपनी ओर से बना कर कुछ अन्य अच्छे लक्षणों को कह दिया।
अब नारद जी ने सोचा कि कुछ ऐसा उपाय करना चाहिये कि यह कन्या मुझे ही वरे। इस मामले में जप-तप से से तो काम चलना नहीं है, जो कुछ होना है वह सुन्दर रूप से ही होना है ऐसा विचार कर के नारद जी ने श्री हरि को स्मरण किया और भगवान विष्णु उनके समक्ष प्रकट हो गये। नारद जी ने उन्हें सारा विवरण बता कर कहा, “हे नाथ आप मुझे अपना सुन्दर रूप दे दीजिये। जिस प्रकार से भी मेरा हित हो आप शीघ्र वही कीजिये।”
भगवान हरि ने कहा, “हे नारद! हम वही करेंगे जिससे तुम्हारा परम हित होगा। तुम्हारा हित करने के लिये हम तुम्हें हरि हरि शब्द का एक अर्थ बन्दर भी होता है का रूप देते हैं।” यह कह कर प्रभु अन्तर्धान हो गये साथ ही उन्होंने नारद जी बन्दर जैसा मुँह और भयंकर शरीर दे दिया। माया के वशीभूत हुए नारद जी को इस बात का ज्ञान नहीं हुआ। वहाँ पर छिपे हुए शिव जी के दो गणों ने भी इस घटना को देख लिया।
ऋषिराज नारद तत्काल विश्वमोहिनी के स्वयंवर में पहुँच गये और साथ ही शिव जी के वे दोनों गण भी ब्राह्मण का वेश बना कर वहाँ पहुँच गये। वे दोनों गण नारद जी को सुना कर कहने लगे कि भगवान ने इन्हें इतना सुन्दर रूप दिया है कि राजकुमारी सिर्फ इन पर ही रीझेगी। उनकी बातों से नारद जी अत्यन्त प्रसन्न हुए। स्वयं भगवान विष्णु भी उस स्वयंवर में एक राजा का रूप धारण कर आ गये। विश्वमोहिनी ने कुरूप नारद की तरफ देखा भी नहीं और राजारूपी विष्णु के गले में वरमाला डाल दी।
मोह के कारण नारद मुनि की बुद्धि नष्ट हो गई थी अतः राजकुमारी द्वारा अन्य राजा को वरते देख वे विकल हो उठे। उसी समय शिव जी के गणों ने व्यंग करते हुए नारद जी से कहा जरा दर्पन में अपना मुँह तो देखये! मुनि ने जल में झाँक कर अपना मुँह देखा और अपनी कुरूपता देख कर अत्यन्त क्रोधित हो उठे। क्रोध में आकर उन्होंने शिव जी के उन दोनों गणों को राक्षस हो जाने का शाप दे दिया। उन दोनों को शाप देने के बाद जब मुनि ने एक बार फिर से जल में अपना मुँह देखा तो उन्हें अपना असली रूप फिर से प्राप्त हो चुका था।
यद्यपि नारद जी को अपना असली रूप वापस मिल गया था किन्तु भगवान विष्णु पर उन्हें अत्यन्त क्रोध आ रहा था क्योंकि विष्णु के कारण ही उनकी बहुत ही हँसी हुई थी। वे तुरन्त विष्णु जी से मिलने के लिये चल पड़े। रास्ते में ही उनकी मुलाकात विष्णु जी, जिनके साथ लक्ष्मी जी और विश्वमोहिनी भी थीं, से हो गई। उन्हें देखते ही नारद जी ने कहा, “तुम दूसरों की सम्पदा देख ही नहीं सकते। तुम्हारे भीतर तो ईर्ष्या और कपट ही भरा हुआ है। समुद्र-मंथन के समय तुमने शिव को बावला बना कर विष और असुरों को मदिरा पिला दिया और स्वयं लक्ष्मी जी और कौस्तुभ मणि को ले लिया। तुम बड़े धोखेबाज और मतलबी हो। हमेशा कपट का व्यवहार करते हो। हमारे साथ तुमने जो किया है उसका फल तुम अवश्य पाओगे। तुमने मनुष्य रूप धारण करके विश्वमोहिनी को प्राप्त किया है इसलिये मैं तुम्हें शाप देता हूँ कि तुम्हें मनुष्य जन्म लेना पड़ेगा, तुमने हमें स्त्री वियोग दिया इसलिये तुम्हें भी स्त्री वियोग सह कर दुःखी होना पड़ेगा और तुमने हमें बन्दर का रूप दिया इसलिये तुम्हें बन्दरों से ही सहायता लेना पड़ेगा।”
नारद के शाप को श्री विष्णु ने सहर्ष स्वीकार कर लिया और उन पर से अपनी माया को हटा लिया। माया के हट जाने से अपने द्वारा दिये शाप को याद कर के नारद जी को अत्यन्त दुःख हुआ किन्तु दिया गया शाप वापस नहीं हो सकता था। इसीलिये श्री विष्णु को श्री राम के रूप में मनुष्य बन कर अवतरित होना पड़ा।
शिव जी के उन दोनों गणों ने जब देखा कि देवर्षि नारद अब मोहरहित हो चुके हैं तो उन्होंने नारद जी के पास आकर तथा उनके चरणों में गिर कर दीन वचन में कहा, “हे मुनिराज! हम दोनों शिव जी के गण हैं। हमने बहुत बड़ा अपराध किया है जिसके कारण हमें आपसे शाप मिल चुका है। अब हमें अपने शाप से मुक्त करने की कृपा कीजिये।”
नारद जी बोले, “मेरा शाप मिथ्या नहीं हो सकता इसलिये तुम दोनों रावण और कुम्भकर्ण के रूप में महान ऐश्वर्यशाली, बलवान तथा तेजवान राक्षस बनोगे और अपनी भुजाओं के बल से सम्पूर्ण विश्व पर विजय प्राप्त करोगे। उसी समय भगवान विष्णु राम के रूप में मनुष्य शरीर धारण करेंगे। युद्ध में तुम दोनों उनके हाथों से मारे जाओगे और तुम्हारी मुक्ति हो जायेगी।”
इस प्रकार से श्री तुलसीदास जी रामचरितमानस में कहते हैं कि श्री हरि अनन्त हैं और उनकी कथा भी अनन्त है। उनकी कथा को संतजन अनेक प्रकार से कहते और सुनते हैं।

Thursday, 28 July 2011

गर्व से कहों हम हिन्दू हैं |

हिन्दू  

हिन्दुत्व को प्राचीन काल में सनातन धर्म कहा जाता था। हिन्दुओं के धर्म के मूल तत्त्व सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, दान आदि हैं जिनका शाश्वत महत्त्व है। अन्य प्रमुख धर्मों के उदय के पूर्व इन सिद्धान्तों को प्रतिपादित कर दिया गया था। इस प्रकार हिन्दुत्व सनातन धर्म के रूप में सभी धर्मों का मूलाधार है क्योंकि सभी धर्म-सिद्धान्तों के सार्वभौम आध्यात्मिक सत्य के विभिन्न पहलुओं का इसमें पहले से ही समावेश कर लिया गया था। मान्य ज्ञान जिसे विज्ञान कहा जाता है प्रत्येक वस्तु या विचार का गहन मूल्यांकन कर रहा है और इस प्रक्रिया में अनेक विश्वास, मत, आस्था और सिद्धान्त धराशायी हो रहे हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आघातों से हिन्दुत्व को भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसके मौलिक सिद्धान्तों का तार्किक आधार तथा शाश्वत प्रभाव है।
आर्य समाज जैसे कुछ संगठनों ने हिन्दुत्व को आर्य धर्म कहा है और वे चाहते हैं कि हिन्दुओं को आर्य कहा जाय। वस्तुत: 'आर्य' शब्द किसी प्रजाति का द्योतक नहीं है। इसका अर्थ केवल श्रेष्ठ है और बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य की व्याख्या करते समय भी यही अर्थ ग्रहण किया गया है। इस प्रकार आर्य धर्म का अर्थ उदात्त अथवा श्रेष्ठ समाज का धर्म ही होता है। प्राचीन भारत को आर्यावर्त भी कहा जाता था जिसका तात्पर्य श्रेष्ठ जनों के निवास की भूमि था। वस्तुत: प्राचीन संस्कृत और पालि ग्रन्थों में हिन्दू नाम कहीं भी नहीं मिलता। यह माना जाता है कि परस्य (ईरान) देश के निवासी 'सिन्धु' नदी को 'हिन्दु' कहते थे क्योंकि वे 'स' का उच्चारण 'ह' करते थे। धीरे-धीरे वे सिन्धु पार के निवासियों को हिन्दू कहने लगे। भारत से बाहर 'हिन्दू' शब्द का उल्लेख 'अवेस्ता' में मिलता है। विनोबा जी के अनुसार हिन्दू का मुख्य लक्षण उसकी अहिंसा-प्रियता है |
हिंसया दूयते चित्तं तेन हिन्दुरितीरित:।
एक अन्य श्लोक में कहा गया है
ॐकार मूलमंत्राढ्य: पुनर्जन्म दृढ़ाशय:
गोभक्तो भारतगुरु: हिन्दुर्हिंसनदूषक:।
ॐकार जिसका मूलमंत्र है, पुनर्जन्म में जिसकी दृढ़ आस्था है, भारत ने जिसका प्रवर्तन किया है, तथा हिंसा की जो निन्दा करता है, वह हिन्दू है।
हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन है जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को परम लक्ष्य मानकर व्यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के अवसर प्रदान करता है। हिन्दू समाज किसी एक भगवान की पूजा नहीं करता, किसी एक मत का अनुयायी नहीं हैं, किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित या किसी एक पुस्तक में संकलित विचारों या मान्यताओं से बँधा हुआ नहीं है। वह किसी एक दार्शनिक विचारधारा को नहीं मानता, किसी एक प्रकार की मजहबी पूजा पद्धति या रीति-रिवाज को नहीं मानता। वह किसी मजहब या सम्प्रदाय की परम्पराओं की संतुष्टि नहीं करता है। आज हम जिस संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय या भारतीय मूल के लोग सनातन धर्म या शाश्वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धान्त है जिसे पश्चिम के लोग समझते हैं । कोई किसी भगवान में विश्वास करे या किसी ईश्वर में विश्वास नहीं करे फिर भी वह हिन्दू है। यह एक जीवन पद्धति है; यह मस्तिष्क की एक दशा है। हिन्दुत्व एक दर्शन है जो मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त उसकी मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक आवश्यकता की भी पूर्ति करता है।
चीनी यात्री हुएनसाग् के समय में हिन्दू शब्द प्रचलित था। यह माना जा सकता है कि हिन्दू' शब्द इन्दु' जो चन्द्रमा का पर्यायवाची है से बना है। चीन में भी इन्दु' को इन्तु' कहा जाता है। भारतीय ज्योतिष में चन्द्रमा को बहुत महत्त्व देते हैं। राशि का निर्धारण चन्द्रमा के आधार पर ही होता है। चन्द्रमास के आधार पर तिथियों और पर्वों की गणना होती है। अत: चीन के लोग भारतीयों को 'इन्तु' या 'हिन्दु' कहने लगे। मुस्लिम आक्रमण के पूर्व ही 'हिन्दू' शब्द के प्रचलित होने से यह स्पष्ट है कि यह नाम मुसलमानों की देन नहीं है।
हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन है जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को परम लक्ष्य मानकर व्यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के अवसर प्रदान करता है। हिन्दू समाज किसी एक भगवान की पूजा नहीं करता, किसी एक मत का अनुयायी नहीं हैं, किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित या किसी एक पुस्तक में संकलित विचारों या मान्यताओं से बँधा हुआ नहीं है। वह किसी एक दार्शनिक विचारधारा को नहीं मानता, किसी एक प्रकार की मजहबी पूजा पद्धति या रीति-रिवाज को नहीं मानता। वह किसी मजहब या सम्प्रदाय की परम्पराओं की संतुष्टि नहीं करता है। आज हम जिस संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय या भारतीय मूल के लोग सनातन धर्म या शाश्वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धान्त है जिसे पश्चिम के लोग समझते हैं । कोई किसी भगवान में विश्वास करे या किसी ईश्वर में विश्वास नहीं करे फिर भी वह हिन्दू है। यह एक जीवन पद्धति है; यह मस्तिष्क की एक दशा है। हिन्दुत्व एक दर्शन है जो मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त उसकी मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक आवश्यकता की भी पूर्ति करता है।

 

भारत भूमि में अनेक ऋषि, सन्त और द्रष्टा उत्पन्न हुए हैं। उनके द्वारा प्रकट किये गये विचार जीवन के सभी पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। कभी उनके विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं और कभी परस्पर विरोधी। हिन्दुत्व एक उद्विकासी व्यवस्था है जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रही है। इसे समझने के लिए हम किसी एक ऋषि या द्रष्टा अथवा किसी एक पुस्तक पर निर्भर नहीं रह सकते। यहाँ विचारों, दृष्टिकोणों और मार्गों में विविधता है किन्तु नदियों की गति की तरह इनमें निरन्तरता है तथा समुद्र में मिलने की उत्कण्ठा की तरह आनन्द और मोक्ष का परम लक्ष्य है।अर्थात हर सीके के दो पहलू होते हैं ,पर होता वह सिका ही है ,जिसका परम लक्ष क्रय-विक्रय हे इसी प्रकार हिन्दू सनातन धर्म का परम लक्ष मोक्ष है और मोक्ष का दाता ईश्वर को माना गया है अतः हिन्दू सनातन या सनातन हिन्दू वही होगा जो मोक्ष के दाता की शरण ग्रहण कर ,
सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, दान आदि सिधान्तों का अनुसरण करता हो , 
अब जरा चिन्तन - मनन करें क्या आप हिन्दू हैं ?या यूँ ही कहते हैं कि गर्व से कहों हम हिन्दू हैं |


“खाता न बही जो कही वो सही”


धर्मान्तरण एक प्रकार का सांस्कृतिक और वैचारिक आतंकवाद है. सनातन जितनी वैज्ञानिक और प्रामाणिक जीवन पद्धति कोई नहीं है. इसकी प्रमुख विशेषता है कि मानव जीवन के सर्व-भौमिक तथ्यों का सार और देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार उसकी व्याख्या. तथ्यगत समीक्षाएं स्पष्ट करती हैं कि समस्त विश्व कि सभ्यताओं का उदय इन्ही सार्वभौमिक तथ्यों को मूल में रख के ही हुआ. लोकमान्य तिलक (1905), पंडित कोटा वेंकटचेल्लम (1953 ) , श्रीनिवास किदाम्बी इंडियन हेरिटेज रिसर्च फौन्डेशन, ओंटारियो कनाडा. (2005). जैसी आधा दर्जन से अधिक वैज्ञानिक विवेचनाएँ इसी तथ्य को सिद्ध करती हैं…कि वैदिक काल की वैज्ञानिक विवेचना के अनुसार अन्टार्क्टिका महाद्वीप से हिंद महासागर तक सनातन सभ्यता का विस्तार रहा है. इसीलिए विश्बंधुत्व जैसे सिद्धांतों का उद्भव भी इसी व्यवस्था में हुआ. इसका अर्थ यह हुआ कि जब सभी सभ्यताओं के मूल में सनातन जीवन पद्धति है तो फिर धर्मान्तरण कि आवश्यकता ही क्या है? हाँ वर्तमान धार्मिक व्यवस्थाएं धर्म के स्वतंत्र और वैज्ञानिक सिद्धांतों कि बजाये धार्मिक ठेकेदारों के पूर्वाग्रहों, आर्थिक सामरिक कारकों और जनमानस के अल्पज्ञान के सन्दर्भ में ही फलीभूत होती हैं इसलिए इन सभी में व्याप्त विसंगतियां चिंतनीय हैं. इन्ही विसंगतियों कि वजह से वैश्विक सन्दर्भों में राजनैतिक उठापटक होती रहती हैं. धर्मान्तरण एक हथियार बन चुका है. धर्मान्तरण जैसे सांस्कृतिक और वैचारिक आतंकवाद की वजह विश्व राजनैतिक सन्दर्भों में आर्थिक-सामरिक ही होती हैं.
सत्य साईं बाबा ने दुनिया के १०० से ज्यादा देशों में सनातन संस्कृति का कम अपना डंका ज्यादा  बजाया. संगठित तरीके से स्थापित करने में सत्य साईं बाबा, भक्ति वेदांत प्रभुपाद, स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती जैसे महापुरुषों भी सचाई से पीछे हट कर आलोचनाओं के पात्र बने रहे . बाबा रामदेव और दीपक चोपड़ा ने भी योग जैसे सांस्कृतिक विरासत और आयुर्वेद के लिए विश्व पटल पर हस्ताक्षर जरुर किये. यद्यपि इन महापुरुषों के किसी भी प्रकार के कार्य सनातन के पक्ष में कम इन्ही के पक्ष में ज्यादा रहे  किसी का हित हो या कदापि नहीं रहे लेकिन यह सत्य है कि शर्म-निरपेक्ष क्षमा कीजियेगा धर्म निरपेक्ष सरकारों ने इसके लिए इन ढोंगियों को सनातन धर्म के रूप में  प्रोत्साहन दिया.
सरकारें तो सरकारें हैं… अभिव्यक्ति की आज़ादी का बोझ लिए मीडिया भी विदेशी मीडिया का पिछलग्गू हो चला, आँखे बंद करके “खाता न बही जो कही वो सही” की तर्ज़ पर चर्च समर्थित विदेशी मीडिया ने भारतीय पाखंडी  धर्मगुरुओं को उजागर करने की जो चाल चली उसको ज्यों का त्यों प्रसाद स्वरुप अपनाया और उसी पूर्वाग्रह को जनमानस के लिए ब्रेकिंग न्यूज़ बना के पेश किया. ये मीडिया महाधिपति पता नहीं किस अभिदृष्टि से देखते हैं, इस तथ्य को नगण्य मानते हुए जीते हैं की मीडिया और फिल्म जनमानस नियंत्रित करने या विचार देने के यन्त्र की तरह भी प्रयोग किया जा सकता है. विश्व राजनैतिक परिदृश्य में इसके अनगिनत उदहारण देखने को मिल जायेंगे. कुल मिला के मीडिया का वैश्वीकरण धर्म और उन धर्म गुरुओं के लिए निहायत ही खतरनाक साबित हुआ है, जो सार्वभौमिक तथ्यों पर आधारित जीवन पद्धति के लिए प्रयासरत रहे हैं.और सनातन के विरोधी की भाँती एक दुसरे से आगे बडने को बिना सनातन के मूल सिधान्तो की चर्चा किये अपना - अपना स्वार्थ पूरा करने में लग गये.
अब जनमानस को यह तय करना होगा कि धर्म और जीवन पद्धति के निर्धारण के लिए तार्किक और सार्वभौमिक तथ्यपरक सिद्धांतों का वरण करके आत्मसात करना बेहतर है या मीडिया और धर्म के तथाकथित ठेकेदारों का बंधुआ वैचारिक मजदूर बनना.

Saturday, 23 July 2011

naad

आप लोग भी मंदिर जाते हैं पर क्या आपको पता है मंदिर में घंटा-घंडियाल क्यो बजाए जाते हैं।
आपने कुछ लोगों को मंदिर में प्रवेश करते समय प्रवेश द्वार पर लगी घंटी को बजाते हुए देखा होगा। ऎसा क्यो किया जाता है।
इसके पीछे ऋषियों का नाद विज्ञान हैं। जिस मंदिर में नियमित रूप से घंटा-घंडियाल बजाए जाते हैं, उसे जाग्रत देव मंदिर कहते हैं। इसी कारण से मंदिर के प्रवेश द्वार पर भी घंटियां लगाई जाती हैं, जो कि दर्शनार्थियों के आने की सूचना देती हैं।
ऎसी मान्यता है कि घंटाध्वनि से प्रतिष्ठित मूर्ति के देवता जाग्रत हो जाते हैं।
आरती के समय बजाए जाने वाले घंटे-घडियाल मंदिर के आसपास के लोगों को पूजा-आरती का समय बताते है।
पूजाव आरती के समय बजाए जाने वाली छोटी घंटियों और घंटे-घडियालों में एक विशेष ताल और गति होती है।
इन लय युक्त तरंगौं का प्रभाव व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी पडता है।

संस्कार - परिक्रमा


परिक्रमा भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है। हम प्राय: सभी मंदिरों, यज्ञों, पूजनीय वृक्षों, उपासना कक्षों की परिक्रमा करते हैं। भारत में अधिकांश मंदिरों के बाहर परिक्रमा पथ बना होता है और भक्तगण अपने इष्टदेव के दर्शनोपरांत उनकी परिक्रमा करते हैं। शास्त्रीय दृष्टिकोण से परिक्रमा को "प्रदक्षिणा" भी कहा जाता है। प्रदक्षिणा के समय भारतवर्ष में निमलिखित मंत्र का उच्चारण किया जाता है :
""यानि कानि च पापानि, जन्मांतर कृतानि च। तानि तानि विनश्यन्ति, प्रदक्षिणा पदे-पदे।।
"" अर्थात् जो पापकर्म मेरे द्वारा पिछले जन्मों या इस जन्म में किए गए हैं,
उनका इस परिक्रमा के कदम-कदम पर नाश हो जाये। इस श्लोक से यह आशय है कि परिक्रमामें जन्म-जन्मांतर अर्थात् पूर्वजन्मों में किए गए पापों एवं अशुभ कर्मो का क्षय करने की क्षमता विद्यमान है। परिक्रमासे जु़डे आध्यात्म क्षेत्र में श्रीगणेश जी द्वारा अपने माता-पिता की परिक्रमाकरके प्रथम पूज्य होने के उदाहरण से सभी परिचित हैं। माता-पिता और गुरू को देवतुल्य माना गया है, यही कारण है कि उनके लिए कहा जाता है 
"मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव।" रामचरितमानस में यह चौपाई आती है कि "मात पिता गुरू प्रभु कै बानी, बिनहिं विचार करिअ शुभ जानी।।
" अर्थात् माता-पिता और गुरू की आज्ञा को हितकारी समझकर उसकी पालना करनी चाहिए। ये सदैव हितकर वचन बोलते हैं इसीलिए उन्हें देवतुल्य माना गया है और उनकी परिक्रमाका विधान है। श्री गणेशजी ने अपने माता-पिता की परिक्रमाको संपूर्ण पृथ्वी माता की परिक्रमा से भी ब़डा माना और वे विजयी हुए। प्रश्न उठता है कि हम परिक्रमाक्यों करते हैंक् सहज सा उत्तर है कि केंद्र बिंदु के बिना किसी परिधि या गोले का निर्माण हो ही नहीं सकता। हमारे जीवनचक्र, अस्तित्व और स्रोत का केंद्र बिंदु ईश्वर हंै। हम ईश्वर का अंश हंै, पुन: पुन: जन्म लेते हैं, फिर मृत्यु को प्राप्त होते हैं और फिर जन्म लेते हैं परंतु ईश्वर हमारा केन्द्र बना रहता है। हमारा जन्मचक्र भी परिक्रमाके समान ही है। यही कारण है कि ईश्वर को अपने जीवन का केन्द्र बिंदु मानते हुए, हम अपने नित्य कार्यो को संपादित करते हैं। किसी भी वृत्त का केन्द्र बिन्दु परिक्रमा पथ पर स्थित किसी भी बिन्दु से समान दूरी पर होता है। इसका तात्पर्य यह है कि हम जहाँ कहीं भी हों या जो कुछ भी हों, सदैव ईश्वर के समीप रहते हैं, वह हमारा केन्द्र बिन्दु होता है, उसमें गुरूत्वाकर्षण शक्ति निहित होती है और हम इसी गुरूत्वाकर्षण शक्ति से बंधकर अपने परिक्रमावथ पर प्रदक्षिणारत रहते हैं अर्थात् जीवनचक्र को भोगते हैं। परिक्रमाका भी यही आशय है, यही महत्व है। हम किसी मंदिर में स्थापित मूर्ति के दर्शन के बाद उसकी परिक्रमा करके अपने जीवन चक्र (पुनर्जन्म) और ईश्वर से बंधे रहने के संकल्प को स्मरण करते हैं। 
किसी वृक्ष, उपासना स्थल, समाधि, यज्ञ, हवन आदि का परिक्रमा करके हम उनके प्रति अपनी श्रद्धा एवं हमारे जीवन में उनके केन्द्रीय भाव के प्रति अपना संकल्प प्रदर्शित करते हैं। सूर्य को अƒर्य आदि देकर हम निज परिक्रमा कर लेते हैं जिसका अर्थ होता है कि सूर्य की दैवीय शक्ति हममें समाविष्ट हो गई और अब हम निज परिक्रमा कर सूर्य के प्रति अपनी आस्था और श्रद्धा प्रकट करते हैं कि वह इस जगत की आत्मा है और हमें शक्ति प्रदान करते हैं। जब हम कहते हैं कि "ईश्वर अंश जीव अविनाशी" तो हम स्वयं को ईश्वर का अंश मानते हैं। 
हमारा यह भौतिक शरीर हमारे माता-पिता की अमानत होता है और इस शरीर को ज्ञान एवं विद्या से आचार्य (गुरू) भरते हैं, हमारे अंधकार को दूर करते हैं। 
इस संसार में हमें जो कुछ मिलता है, आरंभ में वह माता-पिता और गुरू से ही मिलता है इसलिए हमारा प्रथम कत्तüव्य बनता है कि हम इनके प्रति अपनी श्रद्धा, आस्था को प्रकट करें और उन्हें ही अपना केन्द्र मानकर अपनी परिक्रमा करें। जिस प्रकार आकाश मण्डल में ग्रह सूर्य की परिक्रमा में रहते हैं उसी प्रकार हम भी केन्द्र की परिक्रमा करते हैं। परिक्रमा कैसे करें क् : परिक्रमा सदैव दक्षिणावर्त (बायें से दायीं ओर) करते हैं। दायीं ओर घूमने को शुभ माना जाता है। यही कारण है कि वास्तुशास्त्र में मकानों की सीढि़याँ दायीं ओर घुमाते हुए निर्मित्त करते हैं तथा आरती भी दायीं ओर घुमाते हुए करते हैं। दायें हाथ को शक्ति का स्वरूप माना जाता है, मुहावरे में भी कहते हैं कि अमुक व्यक्ति अमुक व्यक्ति का दायां हाथ है अर्थात् शक्ति प्रदाता है, कार्य साधक है। उपासना कक्ष की परिक्रमा करते समय हम स्वयं को स्मरण दिलाते हैं कि ईश्वर हमारे दायें हाथ के समान सदैव हमारे साथ रहते हैं। 
परिक्रमा में हम हमारी नकारात्मक प्रवृत्तियों को पार कर अपने द्वारा किए गए दुष्कर्मो को भविष्य में नहीं दोहराने का संकल्प लेते हैं। साधक, भक्त या उपासक को ध्यान रखना चाहिए कि परिक्रमा सदैव दायीं ओर घूमते हुए करें। जब हम स्वयं की परिक्रमा भी करते हैं तो दायीं ओर घूमकर करनी चाहिए और परिक्रमा करते समय स्वयं के दिव्य तत्व और आत्म-विश्वास को पहचानना चाहिए अन्यथा परिक्रमा के पूर्णफल नहीं मिलते हैं। परिक्रमा भावना से बंधी है यदि भाव गंभीर नहीं होगा, श्रद्धा कम होगी तो परिक्रमा का लाभ मिल पाना संभव नहीं होगा। हमारे देश में "गोवर्धन पर्वत" की परिक्रमा आस्थावान निरंतर करते रहते हैं। कहते हैं कि वह पर्वत भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अंगुली में धारण किया था और स्वयं केंद्र बिंदु थे। 
हम जहां भी केंद्र पाते हैं उसकी परिक्रमा करने लगते हैं अर्थात् हमारी परिक्रमा का केन्द्र अवश्य ही आकर्षण और शक्तियुक्त होता है जो हमें परिक्रमा करने के लिए विवश कर देता है। भारतीय सनातन धर्म में चक्र पूजन (चाक पूजन) विवाह के पूर्व एक संस्कार होता है, इस चक्र पूजन का आशय भी यही होता है कि विवाह के लिए तैयार वर-वधू को अब चाक रूपी जीवनचक्र में परिक्रमारत रहना है और उस चक्र के केन्द्र में सृजनात्मक शक्ति छिपी हुई है जो ईश्वर है अत: परिक्रमा अधीन रहकर हमें ईश्वर का सदैव ध्यान रखना है तथा प्रदक्षिणारत भी रहना है, कर्म में निरत रहना है। परिक्रमा करते समय ऊपर वर्णित मंत्र का उच्चाारण अवश्य करना चाहिए। यदि कारणवश मंत्र याद नहीं रहें तो ईश्वर से अपने द्वारा किए गए अशुभ कर्मो के लिए क्षमा प्रार्थना कर लेनी चाहिए

Thursday, 14 July 2011

गुरु-गुर है -गुर के गुण ही [गुरु ]हे

इस जगत में माता हमारी प्रथम जन्मधात्री सांसारिक गुरु  


बनती है लेकिन हमारा जन्म अविनाशी गुरु के  द्वारा होता है


जो सम्पूर्ण जगत का जन्मदाता होता है |यही अविनाशी गुरु गर्भ से पहले भी हमारे लिए कुछ ना कुछ करता 
रहता है |गर्भ रुपी नर्क में भी जब कोई हमारे साथ नही होता यही अविनाशी गुरु हमारे साथ रहता है |जो गर्भ में हमारा पालन -पोषण करता है | इसी नाते से हम गुरु को माता -पिता- अपना भाई -बांधव के नामों से 
सम्बोधित भी करते हैं | कभी इस अविनाशी  तत्व रूपी गुरु को पुत्र रूप में देख ही नही पाते , अविनाशी गुरु 
तत्व राम -कृष्ण से बड़ा और उदाहरण हो भी नही सकता |यही अविनाशी गुरु  जो हमें ज्ञान और कौशल प्रदान करते हैं. आचार्य मात्र ज्ञानही देते हैं |यही कार्य हमारे धर्म की पवित्र पुस्तके भी करतीं हैं,अर्थात आचार्य 
रूपी यही गुरु हम सभी को  जागरूकता देते हैं|. गुरु  एक तत्व है, तुम्हारे भीतर पड़ा एक गुण. ये शरीर और रूप तक सीमित नहीं है. तुम्हारे प्रतिकार करने और द्रोह करने पर भी गुरु  तुम्हारे जीवन में आते हैं. गुरु तत्व प्रत्येक व्यक्ति में है. हमें हरेक के भीतर इस ज्ञान का आह्वान करना है. इसे जागृत करना है. हमारी चेतना में ज्ञान जीवित होता है, जब गुरु तत्वअविनाशी [जिसका किसी भी काल में नाश नही] होता . जब हम में अपनी कोई इच्छा-गुरु धारण की होती हे .यही हमारे जीवन में इसी अविनाशी  गुरु  तत्व का उदय होता है.तब  जागो और देखो, हमारा जीवन  हर एक क्षण बदल रहा है और तुम्हें जो भी मिला है उसके लिए कृतज्ञ महसूस करो. अपने मन का सब कूड़ा-करकटअपने इसी अविनाशी  गुरु  को दे दो और मुक्त हो जाओ. 
गुरु तो फलदार - ठंडी छाया से युक्त वृक्ष  जैसे होते हैं. गुरु वह नहीं है जो तुम्हारे ऊपर प्रभुत्व जताते हैं बल्कि गुरु तुम्हें अपने आप से जुड़ने के लिए  प्रोत्साहित करते हैं. वर्तमान क्षण में रहने की याद दिलाते हैं. तुम्हारा अपराध भाव, आवेश, दु:ख, मनोव्यथा ले लेते हैं. गुरु  का सही अर्थ यही है. हरेक परमाणु में ईश्वर का वास है. जब भी तुम प्रशंसा करते हो, वह प्रशंसा ईश्वर को जाती है और तुम्हारी चेतना विकसित होती है. यदि तुम इसी अविनाशी ईश्वर गुरु[ दुबारा जिसका किसी भी काल में अंत नही होता ]  की प्रशंसा करते हो, तो वह प्रशंसा इसी अविनाशी  ईश्वर गुरु   को पहुंचती है. इसीलिए हम गुरु पूर्णिमा का उत्सव मनाते हैं. 

गुरु पूर्णिमा वह दिवस है, जब भक्त सम्पूर्ण कृतज्ञता में उदित होता है. ये उस महान ज्ञान के लिए कृतज्ञ होने का दिन है जो तुम्हें अविनाशी ईश्वर गुरु से प्राप्त हुआ है. ये पुनरावलोकन का समय है कि तुमने अपने जीवन में कितना ज्ञान अपनी गहराई तक पहुंचाया है और ज्ञान में तुम कितने विकसित हुए हो. इससे तुम्हारी उन्नति में और कितना और अवकाश है उसकी समझ आएगी और इससे तुम में नम्रता आएगी. इस ज्ञान ने तुम्हें जिस प्रकार रूपांतरित किया है, उसके लिए कृतज्ञ  बनो. जरा सोचो, इसके बिना तुम कैसे होते. कृतज्ञता और विनम्रता से तुम्हारे भीतर विशुद्ध प्रार्थना खिलती है! गुरु  पूर्णिमा के दिन भूतकाल के उस अविनाशी ईश्वर  गुरु का स्मरण करो. जब जीवन में सम्पूर्णता होती है, तुममें कृतज्ञता की भावना उठती है , फिर तुम अविनाशी गुरु  से आरंभ करते हो और अंत में जीवन की सभी वस्तुओं का आदर सत्कार करने लगते हो.यही उस अविनाशी गुरु तत्व की पहिचान है .जिसका कहना है की में आदि -काल से हु और अंत-कालमें भी रहता हु .तुम जब नही थे .में तब भी था .इसी अविनाशी गुरु की पूजा का ही  विधान बनता है .जो हम को आज तक देता ही आरहा है .
परन्तु यहाँ अफ़सोस से कहने में कोई गिलानी भी  नही कि इस दिन पर दम्भी - घमंडी - मुर्ख - तत्व को प्राप्त नाशवान मनुष्य अपनी ही पूजा करवाने लगा है . जो सनातन पुरातन अविनाशी गुरु को अपमानित करना नही तो और क्या है . ऐसे गुरुओं क़ी भुत लम्बी लिस्ट है . जिनको अपमान जनक विपदाओं का सामना करना पड़ता है पर अविनाशी सनातन गुरु का तत्व ज्ञान नजर ही नही आता .


नाशवान  कलयुगी गुरु 
अविनाशी गुरु यहाँ क्लिक करें  

''यह पथ सनातन है।

  • ''यह पथ सनातन है। समस्त देवता और मनुष्य इसी मार्ग से पैदा हुए हैं तथा प्रगति की है। हे मनुष्यों आप अपने उत्पन्न होने की आधाररूपा अपनी माता को विनष्ट न करें।''- (ऋग्वेद-3-18-1)




  • वैदिक या हिंदू धर्म को इसलिए सनातन धर्म कहा जाता है, क्योंकि यही एकमात्र धर्म है जो ईश्वर, आत्मा और मोक्ष को तत्व और ध्यान से जानने का मार्ग बताता है। मोक्ष का कांसेप्ट इसी धर्म की देन है। एकनिष्ठता, ध्यान, मौन और तप सहित यम-नियम के अभ्यास और जागरण का मोक्ष मार्ग है अन्य कोई मोक्ष का मार्ग नहीं है। मोक्ष से ही आत्मज्ञान और ईश्वर का ज्ञान होता है। यही सनातन धर्म का सत्य है।

पसन्दीदा वाक्यअसतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योर्तिगमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय।।- वृहदारण्य उपनिषद
भावार्थ : अर्थात हे ईश्वर मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो।
अपने बारे मेंपरमात्मा को पुकारने के लिए शोर से अधिक शून्य की जरूरत होती है। इस शून्य को मौन भी कहा गया है। ईसा मसीह ने ईश्वर के लिए एक बड़ा आश्वासन यह दिया है कि जैसे ही हम उसे पुकारेंगे वह चला आएगा। उसका द्वार खटखटाएंगे वह दरवाजा खोल देगा। उसे याद करेंगे वह अपनी उपस्थिति दर्ज कराएगा। कुल मिलाकर इसका अर्थ यह है कि भरोसा रखो, ईश्वर क्रिया की प्रतिक्रिया जरूर करता है।

भक्तों के मामले में वह लापरवाह, निष्क्रिय और उदासीन बिल्कुल नहीं है। उसे बुलाने के लिए एक गहन आवाज लगाना पड़ती है। इसी का नाम संतों ने शक्ति कहा है। परमात्मा के सामने आप स्वयं को जितना निरीह, दीनहीन बनाएंगे आध्यात्मिक दुनिया में उतने ही शक्तिशाली माने जाएंगे। इसीलिए कहते हैं प्रार्थना करते समय यदि आंसू आ जाएं तो समझ लीजिए प्रार्थना शक्तिशाली हो गई।

तीन दरवाजे हैं जहां से शक्ति प्रवेश करती है-मन, वचन और शरीर। मन की चूंकि अनेक भागों में बंटने की रूचि होती है इसलिए वह शक्ति को भी तोड़ देता है। व्यर्थ और अनर्थ की बातचीत वचन की शक्ति को कमजोर करती है। और शरीर से तो हम स्वास्थ्य के मामले में लापरवाह होकर अपनी दैहिक शक्ति को खो बैठते हैं। यदि इन तीनों के मामले में सावधान रहा जाए और फिर परमात्मा को पुकारा जाए तो वह पुकार अपने परिणाम देगी। ज्यादातर लोग परमात्मा तक कैसे पहुंचे इसके तरीकों में उलझ जाते हैं और जीवन बीत जाता है।

सीधा सा तरीका है उसके सामने पहुंच जाओ और जैसे हम होते हैं वैसे ही हम बने रहें। उदाहरण के तौर पर कोई भीखारी हमारे सामने आकर खड़ा हो जाए और वह कुछ न कहे तो भी हम समझ जाएंगे ये क्यों खड़ा है? बस ऐसे ही परमात्मा के सामने अपने होने के साथ खड़े हो जाएं। बाकी जिम्मेदारी फिर उसकी है।

Wednesday, 13 July 2011

हम भारत वासियों के रीति-रिवाज

आत्म-तत्व कर्र्मोसे विमुख होकर तपस्या करने से नहीं मिलता |

आत्म-तत्व नित्य और शाश्वत है। यह पुष्प से निकल रही उस सुवासकी तरह है, जो पुष्प को तो सुगंधित बनाती ही है, आस-पास के वातावरण को भी खुशनुमा कर देती है। स्वयं की शक्तियों की पहचान करने का विवेक यदि आप में है, तो आप स्वयं को और अपनी साम‌र्थ्य को भली प्रकार समझ सकेंगे। यही आत्म-तत्व हमारे और लोक के विकास में उत्प्रेरक का काम करता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि हमारी ज्ञानेंद्रियोंका संबंध मन से होता है, मन का संबंध बुिद्धसे और बुद्धि का संबंध आत्मा से और आत्मा का संबंध परमात्मा से होता है। आत्म-तत्व के विकास से हम मन और बुद्धि में संतुलन बनाकर अपनी साम‌र्थ्य को बढा भी सकते हैं। आत्म-तत्व ही समय-समय पर अच्छे-बुरे का ज्ञान कराकर गलत कार्य करने से हमें रोकता है और अपनी शक्तियों को जन-कल्याण व लोकहित के काम करने को प्रेरित करता है। लोग कल्याण के कार्यो से ही हम परमात्मा की ओर बढते हैं।
एक कथा है। एक गृहस्थ ब्राह्मण थे, जो अपने शिष्यों के यहां पूजा-पाठ संपन्न कराते थे। एक बार किसी ने उनसे प्रश्न कर दिया कि क्या आपने आत्म-तत्व की तलाश कर ली है? बस, उसी दिन से वे आत्म-तत्व की तलाश में साधना पर बैठ गए। चूंकि वे गृहस्थ थे, इसलिए उनकी पत्‍‌नी ने उनसे राशन-पानी लाने को कहा, तो वे क्रोध से आग-बबूला हो गए कि मैं आत्म-तत्व की साधना कर रहा हूं, तुम मुझे फालतू के काम बता रही हो। जीवन में संतुलन न बैठने के कारण वे चिडचिडे हो गए और उनके परिवार की हालत बिगडने लगी..।
इस कथा में आगे चलकर उन ब्राह्मण को सीख मिलती है कि आत्म-तत्व खोजा नहीं जाता, वह तो भीतर ही होता है। आत्म-तत्व कर्र्मोसे विमुख होकर तपस्या करने से नहीं मिलता, बल्कि अपने क‌र्त्तव्य निभाने से हासिल होता है। आत्म-तत्व हम सबके भीतर है। हमें उसके द्वारा अपनी शक्तियों को पहचान कर उसे कल्याण के कार्यो में लगाना चाहिए।

क्या आप जानते हैं ?

1. गायत्री मंत्र किस वेद में है तथा किसको समर्पित है ?
उत्तर: ऋग्वेद में, सावित्री को
2. महावीर स्वामी का जन्म कुंडग्राम में हुआ था, इसका आधुनिक नाम क्या है ?
उत्तर: बासुकुंड 
3. खिज्र खाँ ने किस खिलजी शासक के सेनानायक के पद पर कार्य किया ?
उत्तर: अलाउद्दीन खिलजी
4. किस सुलतान ने अब्दुलर्रजाक के देवराय द्वितीय के दरबार में राजदूत के रूप में भेजा ?
उत्तर: खुरासान के सुल्तान शाहरुख ने
5. किस शासक के शासनकाल में अहमदनगर राज्य को मुग़ल साम्राज्य में मिलाया गया ?
उत्तर: शाहजहाँ के शासनकाल में
6. अवध के नवाब ने अंग्रेजों के साथ सहायक संधि (Subdiary Alliane) कि व्यवस्था स्वीकार की ?
उत्तर: शुजाउद्दौला
7. अकबर के जन्म के समय हुमायूँ किसकी शरण में था ?
उत्तर: अमरकोट के राजा की शरण में
8. हर्षवर्धन के शासनकाल में कौनसा यात्री भारत आया था ?
उत्तर: ह्वेनसांग
9. बाज़ार नियंत्रण प्रणाली किस शासक ने प्रारंभ की थी ?
उत्तर: अलाउद्दीन खिलजी ने
10. किस वेद में जादू टोना का अध्ययन किया गया है ?
उत्तर: अर्थवेद में
उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती में एक ऐसे बाबा हैं जिनकी उम्र 205 साल बतायी जा रही है और 105 साल से अन्न नहीं खाए हैं। इस तरह से इस बाबा ने अपने जीवन का 205 बंसत देख चुके हैं। अब उनका नाम गिनीज बुक ऑफ रिकार्ड में दर्ज होने जा रहा है। भारत-नेपाल के उत्तरप्रदेश की सीमा पर स्थित श्रावस्ती जिले के एक मंदिर में रह रहे बाबा का नाम स्वामी दयाल जी महाराज है। इस मंदिर का नाम जगपति नाथ मंदिर है। जिसके वे पुजारी हैं। बुजुर्ग बाबा आजादी की दोनों लड़ाई देख चुके हैं और गांधी-नेहरू के साथ जेल भी जा चुके हैं। सबसे ख़ास बात तो यह है कि बाबा को किसी के सहारे की जरूरत नहीं पड़ती है। खुद सामान्य रूप से चल फिर लेते हैं।

बाबा सिर्फ फल खाते हैं और पानी पीते हैं। पिछले करीब 100 साल से उन्होंने कोई अन्न नहीं खाया है। बाबा रोजाना सुबह साढ़े तीन बजे उठ जाते हैं योगा और पूजा पाठ करते हैं। इस बारे में बहराइच के सबसे बूढ़े व्यक्ति 102 साल के किशोरी लाल का कहना है कि बचपन में जब उनकी उम्र दस साल की थी तो उनके घरवालों ने बाबा की उम्र उस समय 95 साल से ऊपर बताई थी। बचपन से अब तक उन्होंने बाबा को जस का तस देखते आ रहे हैं। तब भी वे उतने ही एक्टिव थे, जितने आज हैं। रोजाना पूजन-योग साधना और मंत्रोच्चारण का काम बाबा नियमित रूप से कर रहे हैं।

परन्तु भारतीय ज्योतिष काल गणना विन्शोत्री के अनुसार 120 वर्ष ही कही गयी हे |    

भगवान ब्रह्मा जी

भगवान ब्रह्मा जी हिन्दू धर्म में एक प्रमुख देवता के रूप में विराजमान हैं. ब्रह्मा जी को सृष्टि का निर्माता कहा जाता है वही संसार के रचियता कहे गए हैं. ब्रह्मा जी को हिन्दुओं के तीन प्रमुख देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, महेश में एक हैं, इन्हें चतुर्मुख नाम से भी पुकारा जाता है वेद, पुराणों के अनुसार इनके चार मुख हैं,
पुराणों के अनुसार ब्रह्माजी के मानस पुत्रों में से पुलस्त्य, पुलह, कृतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष, कंदर्भ, नारद, सनक, सनन्दन, सनातन, सनतकुमार, मनु, चित्रगुप्त, मारिचि, अत्रि, अंगिरस, आदि की उत्पत्ति हुई.
त्रिदेवों में ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव की गणना होती है जिसमें ब्रह्मा जी का नाम सर्वप्रथम रूप लिया जाता है ब्रह्मा जी आद्य सृष्टा, प्रजापति हिरण्यगर्भ, पितामह हैं धार्मिक ग्रंथों में ब्रह्मा का रूप वर्णन वैदिक प्रजापति के रूप के विकास में प्राप्त होता है. धर्म ग्रंथों के अनुसार क्षीरसागर में शेषशायी विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई, तथा वह स्वयंभू कहलाए. इन्होंने ही ब्रह्माण्ड की सृष्टि की तथा सृष्टि निर्माण एवं विकास ही ब्रह्मा जी का मुख्य कार्य है.
पुराणों में ब्रह्मा जी को ज्ञानस्वरूप परमेश्वर, सम्पूर्ण प्राणियों के जन्मदाता माना गया है कार्य, कारण और चल, अचल सभी इनके अंतर्गत होते हैं, समस्त कलाओं को तथा ज्ञान विद्या को ब्रह्मा जी ने प्रकट किया त्रिगुणात्मिका माया से युक्त हिरण्यगर्भ हैं पुराणानुसार इनका निवास ब्रह्मलोक है.
त्रिमूर्ति के अंतर्गत ये अग्रगण्य व प्रथम माने गए परंतु धार्मिक दृष्टि से इनका स्थान विष्णु, शिव, शक्ति ,गणेश, आदि देवों से कम हो गया, तथा इनकी पूजा भी भारत में बहुत ही कम होती है प्रमुख देवता होने पर भी इनकी पूजा कम होती है इनका एक मात्र प्रमुख मंदिर भारत में राजस्थान के पुष्कर नामक स्थान पर है. मंदिर में चतुर्मुख ब्रह्मा के दायें ओर सावित्री देवी और दायीं ओर गायत्री देवी का मंदिर है पास ही एक ओर सनकादि मुनियों की मूर्तियां हैं स्थापित  हैं यहां पर ब्रह्म सरोवर भी है.
पुराणों के अनुसार भगवान रुद्र भी ब्रह्मा जी के ललाट से उत्पन्न हुए मानव-सृष्टि के मूल महाराज मनु उनके दक्षिण भाग से उत्पन्न हुए सभी देवता ब्रह्मा जी के पौत्र माने गये हैं. ब्रह्मा जी देवता, दानव तथा सभी जीवों के पितामह हैं. ब्रह्मा जी के चार मुख हैं अपने चार हाथों में वरमुद्रा, अक्षरसूत्र, वेद तथा कमण्डल धारण किये हुए हैं तथा उनका वाहन हंस है.
पुराणों के अनुसार ब्रह्मा ने अपने यज्ञ के लिए एक उचित स्थान चुनने की इच्छा से यहाँ एक कमल गिराया था पुष्कर उसी से बना. ऐसा कहा जाता है कि एक बार क्रोधित सरस्वती जी ने क्रोधित हो ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि सृष्टि की रचना करने वाले आप सृष्टि के लोगों द्वारा भुला दिए जाएंगे उनकी कहीं पूजा नहीं होगी किंतु बाद में देवों की विनती पर देवी सरस्वती ने कहा कि पुष्कर स्थान में उनकी पूजा होती रहेगी अत: विश्व में ब्रह्मा का केवल एक ही मंदिर है जो यहाँ स्थित है.
पौराणिक कथा अनुसार सृष्टि के आरम्भ में पुष्कर में वज्रभान नामक राक्षस ने आतंक मचा रखा था जिसे मारने के लिए ब्रह्मा जी अपने हाथ के कमल को यहां पर फेंक कर उस राक्षस का अंत कर देते हैं.
ब्रह्मा जी के हाथ से जहां कमल गिरा था उस स्थान पर सरोवर का निर्माण होता है जो पुष्कर सरोवर कहलाता है  कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक यहां पर मेले का आयोजन किया जाता है कार्तिक पूर्णिमा पर पुष्कर स्नान काफी पुण्यदायक माना गया है.

सनातन धर्मं..

 वैसे हमारे किसी भी वैदिक ग्रन्थ या उपनिषद मे हिन्दू धर्मं या हिंदुस्तान का वर्णन नहीं है. वेदों क अनुसार इस देश को भारतवर्ष या आर्यावर्त भूमि कहा गया है और धर्मं को सनातन धर्मं.. ये हमारे ग्रंथो की एक बड़ी विशेषता है की हमारे ग्रंथो ने कभी किसी एकल समुदाय या मनुष्य को नहीं बल्कि इस संपूर्ण संसार के प्राणी,जीव जंतु, पर्यावरण सबके के लिए एक ही नियम रखा और नाम दिया सनातन धर्मं..सनातन (मतलब जो हमारे जनम लेते ही हमारे साथ होता है) और धर्मं ( सेवा ), मतलब सेवा ही वो धर्मं है जो हमारे साथ आया है और यही धर्म सदा हमारे साथ रहेगा और हमारे बाद भी रहेगा.. हिन्दू ,मुस्लिम,सिक्ख,इशाई,यहूदी,बौद्​ध,जैन,ये सब मत या सम्प्रदाय हैं जो एक समुदाय का निर्माण करते हैं और जो लोग जिस नियम या सम्प्रद्द्य का पालन करते है उनके अनुसार उनको हिन्दू या मुस्लिम,सिक्ख,इशाई,यहूदी,बौद्ध​,जैन कहा जाता है, लेकिन सनातन धर्मं मे ऐसा नहीं है केवल एक ही नियम है सभी प्राणियों से प्रेम, सभी प्राणियों के लिए सम्मान और सुरक्षा और सेवा और यही सभी धर्मों का मूल भी है .. यही तो हम करते है..सेवा , सुरक्षा, सम्मान और प्रेम.. लेकिन आज कल हम और मैं रहकर ही ये सब करते है और देख भी सकते है मैं और मेरा का परिणाम, आज आवश्कता है समझने की, की किसी भी धर्मं की महानता इससे नही की कितने लोग उसको मानते है बल्कि इससे है की कितने लोग उस धर्मं के कारण आपने और औरों के जीवन को सुखी और खुशहाल बना सकते हैं...अगर यह मंत्र हम अपने जीवन में अपना लें तो निश्चय ही हमारे धार्मिक, बौद्धिक,सामाजिक,और संस्कारिक तथा वैज्ञानिक विकास को कोई अवरुद्ध नहीं कर सकेगा....मेरे कहने का भावार्थ यह है की सकल ब्रह्मांड में धर्मं एक ही है और वो है ...सत्य -सनातन -धर्मं .... बाकी सब तो सम्प्रदाय और मानव की अपनी मान्यताएं हैं ..... मान्यताएं परिवर्तित हो सकती है लेकिन सत्य नहीं .... मित्रों आप लोगों की क्या राय है...

गीतामें ज्योतिषीय उपचार

महा भारत के युद्ध के ठीक पहले
श्री कृष्ण भगवान ने जो ज्ञान दिया
उस ज्ञान में ढेरों ज्योतिषीय उपचार
छिपे हुए हैं ,गीता के नियमित -अध्ययन
से हम कई विकट समस्याओं से
सरल और सुगम मार्ग को अपना  कर
मुक्ति पा सकते हैं
मोक्ष की और ले जाने वाला गीता शास्त्र ऐसे कई ज्योतिषीय - उपचारों का संकेत देता है , जिस को हम अपने विवेक द्वारा अपने भीतर जगा कर विकट समस्याओं से मुक्त हो सकते हैं ||ऐसा गीता शर्मा का मानना है , इसी पर गीता शर्मा ने जो जानकारी दी | गीता के अठाराह अध्याय मात्र मुक्ति की और ले जा कर गम्भीर समस्याओं से मुक्त करवाते हैं ,मोक्ष तो भगवान शरणागत को ही देते हैं |
शनी का विषद प्रथम अध्याय ,गुरु कृष्ण की दृष्टि दुसरा अध्याय ,मंगल और गुरु का सहयोग [ शंका का समाधान ] तीसरा अध्याय , कमजोर लग्न को इष्ट साधना ,चोथा अद्याये कुंडली के नोवें दसवें भाव से उत्पन द्वंद का निराकरण करता है ,दशा महादशा बुरी दश के बाद समय  का बदलाव .सांसारिक समस्या कुंडली का आठवां भाव , मृत्यु भये महामृतुनज्ये आठ- बारह का भाव सभी  का योग है , दसवां अध्याय लग्नेश को ताकत देता है ,यह लाभ भाव के उपचार प्रारब्ध का बंधन पांचवें और नोवें भाव को , चन्द्र का बारहवें भाव से सम्बन्ध होने पर दूसरी दुनिया से सम्बन्ध [वेराग्य ]संसार में रह कर अपनी जीमे दारियों को पूरी कर बंधन मुक्त होना यही गीता सिखाती है \आठवें भाव का उच्च का ग्रह अकस्मात लाभ कीओर प्रारब्ध के आचे कर्मों का फल लेने का उपचार भी गीता ही कहती है |महा दशा या कारक खराब ग्रह जो भी हो यह गीता ज्योतिषी उपचार करवाती है जो सरल सादे और आसान और अचूक होते हैं ||जरूरत बार बार गीता के अद्ययन की ही है , इसके मार्ग पर चलने की

Sanatn Dhrm

''यह पथ सनातन है। समस्त देवता और मनुष्य इसी मार्ग से पैदा हुए हैं तथा प्रगति की है। हे मनुष्यों आप 
अपने उत्पन्न होने की आधाररूपा अपनी माता को विनष्ट न करें।''- (ऋग्वेद-3-18-1


वैदिक या हिंदू धर्म को इसलिए सनातन धर्म कहा जाता है, क्योंकि यही एकमात्र धर्म है जो ईश्वर, आत्मा और मोक्ष को तत्व और ध्यान से जानने का मार्ग बताता है। मोक्ष का कांसेप्ट इसी धर्म की देन है। एकनिष्ठता, ध्यान, मौन और तप सहित यम-नियम के अभ्यास और जागरण का मोक्ष मार्ग है अन्य कोई मोक्ष का मार्ग नहीं है। मोक्ष से ही आत्मज्ञान और ईश्वर का ज्ञान होता है। यही सनातन धर्म का सत्य है।
असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योर्तिगमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय।।- वृहदारण्य उपनिषद
भावार्थ : अर्थात हे ईश्वर मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो।