Wednesday, 13 July 2011

गीतामें ज्योतिषीय उपचार

महा भारत के युद्ध के ठीक पहले
श्री कृष्ण भगवान ने जो ज्ञान दिया
उस ज्ञान में ढेरों ज्योतिषीय उपचार
छिपे हुए हैं ,गीता के नियमित -अध्ययन
से हम कई विकट समस्याओं से
सरल और सुगम मार्ग को अपना  कर
मुक्ति पा सकते हैं
मोक्ष की और ले जाने वाला गीता शास्त्र ऐसे कई ज्योतिषीय - उपचारों का संकेत देता है , जिस को हम अपने विवेक द्वारा अपने भीतर जगा कर विकट समस्याओं से मुक्त हो सकते हैं ||ऐसा गीता शर्मा का मानना है , इसी पर गीता शर्मा ने जो जानकारी दी | गीता के अठाराह अध्याय मात्र मुक्ति की और ले जा कर गम्भीर समस्याओं से मुक्त करवाते हैं ,मोक्ष तो भगवान शरणागत को ही देते हैं |
शनी का विषद प्रथम अध्याय ,गुरु कृष्ण की दृष्टि दुसरा अध्याय ,मंगल और गुरु का सहयोग [ शंका का समाधान ] तीसरा अध्याय , कमजोर लग्न को इष्ट साधना ,चोथा अद्याये कुंडली के नोवें दसवें भाव से उत्पन द्वंद का निराकरण करता है ,दशा महादशा बुरी दश के बाद समय  का बदलाव .सांसारिक समस्या कुंडली का आठवां भाव , मृत्यु भये महामृतुनज्ये आठ- बारह का भाव सभी  का योग है , दसवां अध्याय लग्नेश को ताकत देता है ,यह लाभ भाव के उपचार प्रारब्ध का बंधन पांचवें और नोवें भाव को , चन्द्र का बारहवें भाव से सम्बन्ध होने पर दूसरी दुनिया से सम्बन्ध [वेराग्य ]संसार में रह कर अपनी जीमे दारियों को पूरी कर बंधन मुक्त होना यही गीता सिखाती है \आठवें भाव का उच्च का ग्रह अकस्मात लाभ कीओर प्रारब्ध के आचे कर्मों का फल लेने का उपचार भी गीता ही कहती है |महा दशा या कारक खराब ग्रह जो भी हो यह गीता ज्योतिषी उपचार करवाती है जो सरल सादे और आसान और अचूक होते हैं ||जरूरत बार बार गीता के अद्ययन की ही है , इसके मार्ग पर चलने की

No comments:

Post a Comment