Wednesday, 13 July 2011

भगवान ब्रह्मा जी

भगवान ब्रह्मा जी हिन्दू धर्म में एक प्रमुख देवता के रूप में विराजमान हैं. ब्रह्मा जी को सृष्टि का निर्माता कहा जाता है वही संसार के रचियता कहे गए हैं. ब्रह्मा जी को हिन्दुओं के तीन प्रमुख देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, महेश में एक हैं, इन्हें चतुर्मुख नाम से भी पुकारा जाता है वेद, पुराणों के अनुसार इनके चार मुख हैं,
पुराणों के अनुसार ब्रह्माजी के मानस पुत्रों में से पुलस्त्य, पुलह, कृतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष, कंदर्भ, नारद, सनक, सनन्दन, सनातन, सनतकुमार, मनु, चित्रगुप्त, मारिचि, अत्रि, अंगिरस, आदि की उत्पत्ति हुई.
त्रिदेवों में ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव की गणना होती है जिसमें ब्रह्मा जी का नाम सर्वप्रथम रूप लिया जाता है ब्रह्मा जी आद्य सृष्टा, प्रजापति हिरण्यगर्भ, पितामह हैं धार्मिक ग्रंथों में ब्रह्मा का रूप वर्णन वैदिक प्रजापति के रूप के विकास में प्राप्त होता है. धर्म ग्रंथों के अनुसार क्षीरसागर में शेषशायी विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई, तथा वह स्वयंभू कहलाए. इन्होंने ही ब्रह्माण्ड की सृष्टि की तथा सृष्टि निर्माण एवं विकास ही ब्रह्मा जी का मुख्य कार्य है.
पुराणों में ब्रह्मा जी को ज्ञानस्वरूप परमेश्वर, सम्पूर्ण प्राणियों के जन्मदाता माना गया है कार्य, कारण और चल, अचल सभी इनके अंतर्गत होते हैं, समस्त कलाओं को तथा ज्ञान विद्या को ब्रह्मा जी ने प्रकट किया त्रिगुणात्मिका माया से युक्त हिरण्यगर्भ हैं पुराणानुसार इनका निवास ब्रह्मलोक है.
त्रिमूर्ति के अंतर्गत ये अग्रगण्य व प्रथम माने गए परंतु धार्मिक दृष्टि से इनका स्थान विष्णु, शिव, शक्ति ,गणेश, आदि देवों से कम हो गया, तथा इनकी पूजा भी भारत में बहुत ही कम होती है प्रमुख देवता होने पर भी इनकी पूजा कम होती है इनका एक मात्र प्रमुख मंदिर भारत में राजस्थान के पुष्कर नामक स्थान पर है. मंदिर में चतुर्मुख ब्रह्मा के दायें ओर सावित्री देवी और दायीं ओर गायत्री देवी का मंदिर है पास ही एक ओर सनकादि मुनियों की मूर्तियां हैं स्थापित  हैं यहां पर ब्रह्म सरोवर भी है.
पुराणों के अनुसार भगवान रुद्र भी ब्रह्मा जी के ललाट से उत्पन्न हुए मानव-सृष्टि के मूल महाराज मनु उनके दक्षिण भाग से उत्पन्न हुए सभी देवता ब्रह्मा जी के पौत्र माने गये हैं. ब्रह्मा जी देवता, दानव तथा सभी जीवों के पितामह हैं. ब्रह्मा जी के चार मुख हैं अपने चार हाथों में वरमुद्रा, अक्षरसूत्र, वेद तथा कमण्डल धारण किये हुए हैं तथा उनका वाहन हंस है.
पुराणों के अनुसार ब्रह्मा ने अपने यज्ञ के लिए एक उचित स्थान चुनने की इच्छा से यहाँ एक कमल गिराया था पुष्कर उसी से बना. ऐसा कहा जाता है कि एक बार क्रोधित सरस्वती जी ने क्रोधित हो ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि सृष्टि की रचना करने वाले आप सृष्टि के लोगों द्वारा भुला दिए जाएंगे उनकी कहीं पूजा नहीं होगी किंतु बाद में देवों की विनती पर देवी सरस्वती ने कहा कि पुष्कर स्थान में उनकी पूजा होती रहेगी अत: विश्व में ब्रह्मा का केवल एक ही मंदिर है जो यहाँ स्थित है.
पौराणिक कथा अनुसार सृष्टि के आरम्भ में पुष्कर में वज्रभान नामक राक्षस ने आतंक मचा रखा था जिसे मारने के लिए ब्रह्मा जी अपने हाथ के कमल को यहां पर फेंक कर उस राक्षस का अंत कर देते हैं.
ब्रह्मा जी के हाथ से जहां कमल गिरा था उस स्थान पर सरोवर का निर्माण होता है जो पुष्कर सरोवर कहलाता है  कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक यहां पर मेले का आयोजन किया जाता है कार्तिक पूर्णिमा पर पुष्कर स्नान काफी पुण्यदायक माना गया है.

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