Wednesday, 13 July 2011

सनातन धर्मं..

 वैसे हमारे किसी भी वैदिक ग्रन्थ या उपनिषद मे हिन्दू धर्मं या हिंदुस्तान का वर्णन नहीं है. वेदों क अनुसार इस देश को भारतवर्ष या आर्यावर्त भूमि कहा गया है और धर्मं को सनातन धर्मं.. ये हमारे ग्रंथो की एक बड़ी विशेषता है की हमारे ग्रंथो ने कभी किसी एकल समुदाय या मनुष्य को नहीं बल्कि इस संपूर्ण संसार के प्राणी,जीव जंतु, पर्यावरण सबके के लिए एक ही नियम रखा और नाम दिया सनातन धर्मं..सनातन (मतलब जो हमारे जनम लेते ही हमारे साथ होता है) और धर्मं ( सेवा ), मतलब सेवा ही वो धर्मं है जो हमारे साथ आया है और यही धर्म सदा हमारे साथ रहेगा और हमारे बाद भी रहेगा.. हिन्दू ,मुस्लिम,सिक्ख,इशाई,यहूदी,बौद्​ध,जैन,ये सब मत या सम्प्रदाय हैं जो एक समुदाय का निर्माण करते हैं और जो लोग जिस नियम या सम्प्रद्द्य का पालन करते है उनके अनुसार उनको हिन्दू या मुस्लिम,सिक्ख,इशाई,यहूदी,बौद्ध​,जैन कहा जाता है, लेकिन सनातन धर्मं मे ऐसा नहीं है केवल एक ही नियम है सभी प्राणियों से प्रेम, सभी प्राणियों के लिए सम्मान और सुरक्षा और सेवा और यही सभी धर्मों का मूल भी है .. यही तो हम करते है..सेवा , सुरक्षा, सम्मान और प्रेम.. लेकिन आज कल हम और मैं रहकर ही ये सब करते है और देख भी सकते है मैं और मेरा का परिणाम, आज आवश्कता है समझने की, की किसी भी धर्मं की महानता इससे नही की कितने लोग उसको मानते है बल्कि इससे है की कितने लोग उस धर्मं के कारण आपने और औरों के जीवन को सुखी और खुशहाल बना सकते हैं...अगर यह मंत्र हम अपने जीवन में अपना लें तो निश्चय ही हमारे धार्मिक, बौद्धिक,सामाजिक,और संस्कारिक तथा वैज्ञानिक विकास को कोई अवरुद्ध नहीं कर सकेगा....मेरे कहने का भावार्थ यह है की सकल ब्रह्मांड में धर्मं एक ही है और वो है ...सत्य -सनातन -धर्मं .... बाकी सब तो सम्प्रदाय और मानव की अपनी मान्यताएं हैं ..... मान्यताएं परिवर्तित हो सकती है लेकिन सत्य नहीं .... मित्रों आप लोगों की क्या राय है...

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