Wednesday, 13 July 2011

आत्म-तत्व कर्र्मोसे विमुख होकर तपस्या करने से नहीं मिलता |

आत्म-तत्व नित्य और शाश्वत है। यह पुष्प से निकल रही उस सुवासकी तरह है, जो पुष्प को तो सुगंधित बनाती ही है, आस-पास के वातावरण को भी खुशनुमा कर देती है। स्वयं की शक्तियों की पहचान करने का विवेक यदि आप में है, तो आप स्वयं को और अपनी साम‌र्थ्य को भली प्रकार समझ सकेंगे। यही आत्म-तत्व हमारे और लोक के विकास में उत्प्रेरक का काम करता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि हमारी ज्ञानेंद्रियोंका संबंध मन से होता है, मन का संबंध बुिद्धसे और बुद्धि का संबंध आत्मा से और आत्मा का संबंध परमात्मा से होता है। आत्म-तत्व के विकास से हम मन और बुद्धि में संतुलन बनाकर अपनी साम‌र्थ्य को बढा भी सकते हैं। आत्म-तत्व ही समय-समय पर अच्छे-बुरे का ज्ञान कराकर गलत कार्य करने से हमें रोकता है और अपनी शक्तियों को जन-कल्याण व लोकहित के काम करने को प्रेरित करता है। लोग कल्याण के कार्यो से ही हम परमात्मा की ओर बढते हैं।
एक कथा है। एक गृहस्थ ब्राह्मण थे, जो अपने शिष्यों के यहां पूजा-पाठ संपन्न कराते थे। एक बार किसी ने उनसे प्रश्न कर दिया कि क्या आपने आत्म-तत्व की तलाश कर ली है? बस, उसी दिन से वे आत्म-तत्व की तलाश में साधना पर बैठ गए। चूंकि वे गृहस्थ थे, इसलिए उनकी पत्‍‌नी ने उनसे राशन-पानी लाने को कहा, तो वे क्रोध से आग-बबूला हो गए कि मैं आत्म-तत्व की साधना कर रहा हूं, तुम मुझे फालतू के काम बता रही हो। जीवन में संतुलन न बैठने के कारण वे चिडचिडे हो गए और उनके परिवार की हालत बिगडने लगी..।
इस कथा में आगे चलकर उन ब्राह्मण को सीख मिलती है कि आत्म-तत्व खोजा नहीं जाता, वह तो भीतर ही होता है। आत्म-तत्व कर्र्मोसे विमुख होकर तपस्या करने से नहीं मिलता, बल्कि अपने क‌र्त्तव्य निभाने से हासिल होता है। आत्म-तत्व हम सबके भीतर है। हमें उसके द्वारा अपनी शक्तियों को पहचान कर उसे कल्याण के कार्यो में लगाना चाहिए।

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