Thursday, 14 July 2011

गुरु-गुर है -गुर के गुण ही [गुरु ]हे

इस जगत में माता हमारी प्रथम जन्मधात्री सांसारिक गुरु  


बनती है लेकिन हमारा जन्म अविनाशी गुरु के  द्वारा होता है


जो सम्पूर्ण जगत का जन्मदाता होता है |यही अविनाशी गुरु गर्भ से पहले भी हमारे लिए कुछ ना कुछ करता 
रहता है |गर्भ रुपी नर्क में भी जब कोई हमारे साथ नही होता यही अविनाशी गुरु हमारे साथ रहता है |जो गर्भ में हमारा पालन -पोषण करता है | इसी नाते से हम गुरु को माता -पिता- अपना भाई -बांधव के नामों से 
सम्बोधित भी करते हैं | कभी इस अविनाशी  तत्व रूपी गुरु को पुत्र रूप में देख ही नही पाते , अविनाशी गुरु 
तत्व राम -कृष्ण से बड़ा और उदाहरण हो भी नही सकता |यही अविनाशी गुरु  जो हमें ज्ञान और कौशल प्रदान करते हैं. आचार्य मात्र ज्ञानही देते हैं |यही कार्य हमारे धर्म की पवित्र पुस्तके भी करतीं हैं,अर्थात आचार्य 
रूपी यही गुरु हम सभी को  जागरूकता देते हैं|. गुरु  एक तत्व है, तुम्हारे भीतर पड़ा एक गुण. ये शरीर और रूप तक सीमित नहीं है. तुम्हारे प्रतिकार करने और द्रोह करने पर भी गुरु  तुम्हारे जीवन में आते हैं. गुरु तत्व प्रत्येक व्यक्ति में है. हमें हरेक के भीतर इस ज्ञान का आह्वान करना है. इसे जागृत करना है. हमारी चेतना में ज्ञान जीवित होता है, जब गुरु तत्वअविनाशी [जिसका किसी भी काल में नाश नही] होता . जब हम में अपनी कोई इच्छा-गुरु धारण की होती हे .यही हमारे जीवन में इसी अविनाशी  गुरु  तत्व का उदय होता है.तब  जागो और देखो, हमारा जीवन  हर एक क्षण बदल रहा है और तुम्हें जो भी मिला है उसके लिए कृतज्ञ महसूस करो. अपने मन का सब कूड़ा-करकटअपने इसी अविनाशी  गुरु  को दे दो और मुक्त हो जाओ. 
गुरु तो फलदार - ठंडी छाया से युक्त वृक्ष  जैसे होते हैं. गुरु वह नहीं है जो तुम्हारे ऊपर प्रभुत्व जताते हैं बल्कि गुरु तुम्हें अपने आप से जुड़ने के लिए  प्रोत्साहित करते हैं. वर्तमान क्षण में रहने की याद दिलाते हैं. तुम्हारा अपराध भाव, आवेश, दु:ख, मनोव्यथा ले लेते हैं. गुरु  का सही अर्थ यही है. हरेक परमाणु में ईश्वर का वास है. जब भी तुम प्रशंसा करते हो, वह प्रशंसा ईश्वर को जाती है और तुम्हारी चेतना विकसित होती है. यदि तुम इसी अविनाशी ईश्वर गुरु[ दुबारा जिसका किसी भी काल में अंत नही होता ]  की प्रशंसा करते हो, तो वह प्रशंसा इसी अविनाशी  ईश्वर गुरु   को पहुंचती है. इसीलिए हम गुरु पूर्णिमा का उत्सव मनाते हैं. 

गुरु पूर्णिमा वह दिवस है, जब भक्त सम्पूर्ण कृतज्ञता में उदित होता है. ये उस महान ज्ञान के लिए कृतज्ञ होने का दिन है जो तुम्हें अविनाशी ईश्वर गुरु से प्राप्त हुआ है. ये पुनरावलोकन का समय है कि तुमने अपने जीवन में कितना ज्ञान अपनी गहराई तक पहुंचाया है और ज्ञान में तुम कितने विकसित हुए हो. इससे तुम्हारी उन्नति में और कितना और अवकाश है उसकी समझ आएगी और इससे तुम में नम्रता आएगी. इस ज्ञान ने तुम्हें जिस प्रकार रूपांतरित किया है, उसके लिए कृतज्ञ  बनो. जरा सोचो, इसके बिना तुम कैसे होते. कृतज्ञता और विनम्रता से तुम्हारे भीतर विशुद्ध प्रार्थना खिलती है! गुरु  पूर्णिमा के दिन भूतकाल के उस अविनाशी ईश्वर  गुरु का स्मरण करो. जब जीवन में सम्पूर्णता होती है, तुममें कृतज्ञता की भावना उठती है , फिर तुम अविनाशी गुरु  से आरंभ करते हो और अंत में जीवन की सभी वस्तुओं का आदर सत्कार करने लगते हो.यही उस अविनाशी गुरु तत्व की पहिचान है .जिसका कहना है की में आदि -काल से हु और अंत-कालमें भी रहता हु .तुम जब नही थे .में तब भी था .इसी अविनाशी गुरु की पूजा का ही  विधान बनता है .जो हम को आज तक देता ही आरहा है .
परन्तु यहाँ अफ़सोस से कहने में कोई गिलानी भी  नही कि इस दिन पर दम्भी - घमंडी - मुर्ख - तत्व को प्राप्त नाशवान मनुष्य अपनी ही पूजा करवाने लगा है . जो सनातन पुरातन अविनाशी गुरु को अपमानित करना नही तो और क्या है . ऐसे गुरुओं क़ी भुत लम्बी लिस्ट है . जिनको अपमान जनक विपदाओं का सामना करना पड़ता है पर अविनाशी सनातन गुरु का तत्व ज्ञान नजर ही नही आता .


नाशवान  कलयुगी गुरु 
अविनाशी गुरु यहाँ क्लिक करें  

1 comment:

  1. ये गुरुजन क्यों नहीं स्वीकारते ?
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    ये तथाकथित गुरु- सद्गुरू या जगद्गुरु-जन तथा ये बनतू भगवान जी लोग अपने पीछे प्रचुर धन सम्पदा एवं विशाल शिष्य समाज को देखकर और उनसे पुजवाई पाते रहकर मिथ्याज्ञानाभिमानवश अपने को सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोत्तम घोषित कर देते हैं। मान-सम्मान, प्रतिष्ठा-वैभव, यश-कीर्ति और पूजा-प्रार्थना पाते रहने से ये इतना फूल जाते हैं कि मिथ्याहँकारवश अपने को ही ‘खुदा-गॉड-भगवान जा अवतार’ या सद्गुरू-जगद्गुरु भी घोषित करने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते। ऐसे में जब ‘परमसत्य एवं परमश्रेष्ठ’ इन तथाकथितों एवं बनतुओं के समक्ष आकर खड़ा हो जाता है तब ये एक तरफ तो आश्चर्य में डूबने लगते हैं और दूसरी तरफ अपनी प्रभुताई के दीपक को बुझता देख और अपने मिथ्यात्व और आडंबर-पाखण्ड का भंडाफोड़ होते देख ये तथाकथित सद्गुरू-जगद्गुरु एवं बनतू भगवान जी लोग विक्षुब्ध हो बौखलाने लगते हैं। यहाँ तक कि ये अपने शिष्य-समाज को भी ‘परमसत्य एवं परमश्रेष्ठ’ वाले के प्रति अप्रमाणित आधार पर अनर्गल प्रलापों से बलगलाने एवं उन्हे अपना ही बनाए रखने का हर प्रयास जारी रखते हैं। भला ये तथाकथित गुरु-सद्गुरू-जगद्गुरु एवं बनतू भगवान जी लोग अपने पीछे प्रचुर धन-सम्पदा व विशाल शिष्यों-अनुयायियों-पूजकों और जन-समूह को देखकर उनसे कैसे कह दें कि ‘भाई ! मैं अभी तक भ्रम और भटकाव में था – वास्तव में मैं वास्तविकता को समझ नहीं सका। आप सभी मेरे पीछे अपना जीवन, धन-सम्पदा और समय-सामर्थ्य तो जरूर लगाए किन्तु अब मुझे मिथ्याभाषी एवं स्वार्थी समझ कर मेरा साथ छोड़ सकते हो, सत्यत्व एवं श्रेष्ठत्व मेरे पास नहीं, अमुक (सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस) के पास है’। ऐसा कहने पर उनका शिष्य समाज क्या उन्हे सीधे चैन से बैठने देगा ? नहीं ! कदापि नहीं ! इसलिए भरमाना-भटकाना हर प्रकार से ही त्याज्य होता है – त्याग देने में ही कल्याण है चाहे वो अनुयायी या शिष्य जी हों अथवा गुरु जी, तथाकथित सद्गुरू जी या तथाकथित भगवान जी या जगद्गुरु जी ही क्यों न हों। बात तो सभी के लिए ही है। सब भगवद् कृपा
    ---------- महात्मा जगदीश्वरानन्द जी
    (सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद)aek pryaas aap bhi kren

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