Sunday, 18 September 2011

वह स्वयंभू ज्ञानी थे।

दम पुराण के अनुसार महामुनि कपिल को सांख्य योग का प्रणेता माना जाता है। श्रीमद्भगवत में भी इस आश्य का उल्लेख है। ऐसी मान्यता है कि स्वयं परमपिता ब्रह्म जी ने कहा था कि सांख्य ज्ञान का उपदेश देने के लिए परब्रह्म ने स्वयं भगवान के सत्व अंश से जन्म लिया था। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते है-
सिद्धानां कपिलो मुनि: अर्थात सिद्ध गणों के बीच प्रधान। श्वेताश्वर उपनिषद में भी कपिल का नाम मिलता है। श्वेताश्वर श्रुति में कपिल को वासुदेव का अवतार कहा गया है।
ग्रंथों में वर्णित है कि कपिल मुनि ने अपनी मां को अहं भाव अहंकार त्याग करने की दीक्षा दी। साथ ही भक्तिमार्ग पर अनुगमन करने को कहा और मंत्र प्रदान किया। भक्ति से शरीर और ज्ञान से मन की शुद्धि होती है। इससे आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। जब आत्मज्ञान प्राप्त हो जाए तो लक्ष्य यानी मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। ऐसा कपिल मुनि का मानना है। उन्होंने अपनी माता को सिद्धपुर में सांख्ययोग की शिक्षा दी। यह स्थान गुजरात में पाटन के नज़दीक है। संसार की सृष्टि व जीवात्मा के गूढ़ रहस्य का तत्व सांख्य दर्शन में दिया गया है। इस प्रकार अपने महाज्ञानी पुत्र से ईश्वर प्राप्ति का बोध पाकर उनकी माता पूजा-पाठ, जप-तप, ध्यान योग में रम गईं। अपनी माता से योग, मीमांसा, तत्व आदि की व्याख्या करने के पश्चात कपिल मुनि ने आश्रम का त्याग कर दिया और एकाग्रचित होकर तपस्या करने के उद्देश्य से पाताललोक (सागरद्वीप) चले गए। वहां उन्होंने अपना आश्रम बनाया।
सांख्यवादियों का मानना है कि कपिल मुनि ही विश्व के आदि विद्धान और उपदेशक है। वह स्वयंभू ज्ञानी थे। उनका कोई गुरु अथवा उपदेशक नहीं था। सत्वज्ञान लेकर ही उनका आविर्भाव हुआ था। सुंतरा सांख्ययोग को विश्व का आदि उपदेश माना जाता है। प्राचीन सांख्यवादियों के बीच आसुरि पंचशिख आदि के नाम प्रसिद्ध हैं। रामायण में भी उल्लेख मिलता है कि कपिल मुनि पाताललोक के क्षेत्र में तपस्यारत थे। भगवान वाल्मीकि रचित रामायण से भी साक्ष्य मिलता है कि गंगासागर क्षेत्र में ही महर्षि कपिल का आश्रम था।
कपिल मुनि आजीवन ब्रह्मचारी रहे। ब्रह्म जी ने उनके पिता महर्षि कर्दम से कहा था- हे मुनि। स्वयं भगवान माया का रूप धारण कर कपिल के रूप में अवतरित हुए हैं । अत: कपिल मुनि एवं उनके प्रतिपादित सांख्यदर्शन की प्राचीनता के विषय में कोई संदेह नहीं रह जाता है। 
ज्ञान के प्रतीक : उत्तर मीमांसा के ज्ञान प्रकरण में मैत्रेप जी कहते हैं कि कपिल ब्रह्मज्ञान के स्वरूप हैं। उनके पिता कर्दम अर्थात इन्द्रियों का दमन करने वाला, अर्थात जितेन्द्रीय। उनके तप से भगवान प्रसन्न हुए और ऋषि कर्दम के घर पधारे। भगवान ने कर्दम ऋषि से कहा- दो दिन बाद मनु महाराज तुम्हारे पास आएंगे। वह अपनी पुत्री देवहुति तुम्हें देंगे और मैं पुत्र रूप में तुम्हारे यहां जन्म लूंगा। जगत को सांख्य शास्त्र का उपदेश करना है। भगवान के कथनानुसार मनु-शतरूपा अपनी पुत्री देवहुति को लेकर आए तथा महर्षि कर्दम से विवाह का प्रस्ताव रखा। जिसे कर्दम ऋषि ने स्वीकार कर लिया। मनु महाराज ने विधिपूर्वक कन्या दान किया। देवहुति का अर्थ होता है जिसकी बुद्धि देव अर्थात भगवान में लगी हो। इस प्रकार महर्षि कर्दम तथा देवहुति से महामुनि कपिल का जन्म हुआ। कपिल मुनि ज्ञान का सागर व विद्धता के शिरोमणि थे। उन्हें भारतीय दर्शन का महान तत्ववेता माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने कपिल को चिंतको में सर्वोपरि बताया है। कपिल मुनि को भगवान विष्णु के चौबीसवें अवतार भी माना जाता है। श्रीमद्भगवत में भगवान श्रीकृष्ण ईश्वर तत्व की व्याख्या करते हुए कहते हैं-

अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणां देवर्पीणां च नारद।   गन्धर्वाणां चित्ररथ: सिद्धानां कपिलों मुनि।। भावार्थ: मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देवर्षियों में नारद, गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि हूं।

कपिल और गंगावतरण : इक्ष्वाकु वंश में सागर नामक एक बहुत प्रतापी राजा हुए। उनके वैदर्भी और शैब्या नामक दो रानियां थीं। राजा सागर ने कैलाश पर्वत जाकर पुत्र प्राप्ति की कामना से भगवान शंकर की आराधना की। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने कहा- हे राजन! तुमने पुत्र प्राप्ति की कामना से मेरी तपस्या की है। अत: मैैं तुम्हें वरदान देता हूं कि तुम्हारी एक रानी के साठ हज़ार पुत्र होंगे। किन्तु दूसरी रानी से तुम्हारा वंश चलाने वाला एक ही पुत्र उत्पन्न होगा। इतना कहकर भगवान शिव अन्तर्धान हो गए। भगवान शंकर के वरदान स्वरूप शैब्या के गर्भ से असभंज नामक रूपवान पुत्र को जन्म दिया तथा वैदर्भी के गर्भ से एक तुम्बी उत्पन्न हुई। जिसे फोडऩे पर साठ हज़ार पुत्र निकले। एक बार राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ की दीक्षा ली। यश का श्यामवर्ण अभूत छोड़ दिया गया। उसके पीछे राजा सगर के साठ हज़ार पुत्र अपनी विशाल सेना लेकर विजय के लिए निकल पड़े। सगर के अश्वमेध यज्ञ से भयभीत होकर इन्द्र ने अवसर पाकर उस घोड़े को चुरा लिया तथा ले जाकर कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। उस समय कपिल मुनि ध्यान में लीन थे। अत: उन्हें इन्द्र के इस कृत्य का ज्ञान नहीं हुआ।
इधर, सगर पुत्र घोड़े के पद चिन्हों का पीछा करते-करते पाताल-लोक महर्षि कपिल के आश्रम जा पहुंचे। यह समझकर कि घोड़ा कपिल मुनि चुरा लाए है, वे मुनि श्रष्ठ से बुरा-भला कहन लगे। उनके कटुवचनों को सुनकर कपिल मुनि की तपस्या भंग हो गई। उन्होंने अपने निरादर से कुपित होकर साठ हज़ार सगर पुत्रों को अपनी क्रोधाग्नि से भस्म कर दिया। जब राजा सगर को यह समाचार नारद से मिला तो उन्होंने अंशुमान को कपिल मुनि के पास घोड़ा लेने भेजा। अंशुमान ने मुनि के पास जाकर क्षमाप्रार्थना की, स्तुति करके प्रसन्न किया तथा यज्ञ का घोड़ा ले लिया। तब कपिल मुनि ने कहा- अंशुमान। केवल स्वर्गवासिनी गंगा के जल से तर्पण करने पर तुम्हारे पूर्वजों को मुक्ति मिल सकेगी।कपिल मुनि के वचन सुनकर अंशुमान वापस आ गए। सारी धरना ज्ञात होने पर राजा सागर तपस्या के लिए उत्तराखंड चले गए। 

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