Sunday, 18 September 2011

अष्टावक्र

द्धालक ऋषि के पुत्र का नाम श्वेतकेतू था। उद्धालक ऋषि के एक शिष्य का नाम कहोड़ था। कहोड़ को सम्र्पूण वेदों का ज्ञान देने के पश्चात उद्धालक ने अपनी रूपवती एवं गुणवती कन्या सुजाता का विवाह उससे कर दिया।

सुजाता गर्भवती हुईं। एक दिन कहोड़ वेदपाठ कर रहे थे, तो गर्भ से बालक ने कहा कि पिता जी! आप वेद का पाठ गलत कर रहे हैं। यह सुनते ही कहोड़ क्रोधित होकर बोले कि तू गर्भ से ही मेरा अपमान कर रहा है। इसलिए तू आठ स्थानों से वक्र टेढ़ा हो जाएगा।

समय व्यतीत हुआ। एक दिन कहोड़ राजा जनक के दरबार में जा पहुंचे। वहां एक शास्त्रार्थ में उनकी हार हो गई। फलस्वरूप उन्हें जल में डुबो दिया गया। इस घटना के बाद अष्टावक्र का जन्म हुआ। पिता के न होने पर वह अपने नाना उद्धालक को अपना पिता तथा मामा श्वेतकेतू को भाई समझते थे।

एक दिन जब वह उद्धालक की गोद में बैठे थे, तो श्वेतकेतू ने उसे अपने पिता की गोद से हटा दिया। अष्टावक्र को यह बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने तत्काल अपने मामा के पास जाकर अपने पिता के विषय में पूछा। माता ने अष्टावक्र को सारी बात बता दी।

माता की बात सुनने के बाद अष्टावक्र अपने मामा श्वेतकेतू के साथ उसी वंदी से शास्त्रार्थ करने राजा जनक के यज्ञशाला में पहुंचे, जिसने उनके पिता को हराया था। वहां द्वारपालों ने उन्हें रोकते हुए कहा कि यज्ञशाला में बच्चों को जाने की आज्ञा नहीं है।

इस पर अष्टावक्र बोले- ‘अरे द्वारपाल, केवल बाल सफेद हो जाने या अवस्था अधिक हो जाने से कोई बड़ा नहीं होता। जिसे वेदों का ज्ञान हो और जो बुद्धि में तेज़ हो, वही वास्तव में बड़ा है।’

वे जनक की सभा में जा पहुंचे और वंदी को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा।

राजा जनक ने अष्टावक्र की परीक्षा लेने के लिए पूछा- ‘वह पुरूष कौन है, जो तीस अवयव, बारह अंश, चौबीस पर्व और तीन सौ साठ अक्षरों वाली वस्तु का ज्ञाता है?’

राजा जनक के प्रश्न को सुनते ही अष्टावक्र बोले- ‘हे राजन! चौबीस पक्षों वाला, छ: ऋतुओं वाला, बारह महीनों वाला तथा तीन सौ साठ दिनों वाला संवत्सर आपकी रक्षा करें।’ अष्टावक्र का सही जवाब सुनकर राजा जनक ने फिर प्रश्न किया- ‘वह कौन है, जो सुरतावस्था में भी आंखें बंद नहीं करता? जन्म लेने के उपरांत भी चलने में कौन असमर्थ रहता है? कौन हृदयविहिन है और शीघ्रता से बढऩे वाला कौन है?’

अष्टावक्र ने उत्तर दिया, ‘हे राजन! सुरतावस्था में मछली आंख बंद नहीं रखती। जन्म लेने के उपरान्त भी अंडा नहीं चल सकता। पत्थर हृदयविहीन होता है और वेग से बढऩे वाली नदी होती है।’ अष्टावक्र के उत्तरों को सुनकर राजा जनक प्रसन्न हुए तथा उन्हें वंदी से शास्त्रार्थ की आज्ञा प्रदान कर दी।

वंदी ने अष्टावक्र से पूछा- ‘एक सूर्य सारे संसार को प्रकाश करता है। देवराज इंद्र एक ही वीर हैं तथा यमराज भी एक ही हैं।’

अष्टावक्र बोले- ‘इंद्र और अग्निदेव दो देवता हैं। नारद तथा पर्वत दो देवर्षि हैं। अश्विनीकुमार भी दो ही हैं। रथ के दो पहिए होते हैं और पति-पत्नि दो सहचर होते हैं।’

बंदी ने कहा- ‘यज्ञ पांच प्रकार के होते हैं। यज्ञ की अग्नि पांच है। ज्ञानेन्द्रियां पांच हैं। पवित्र नदिया पांच हैं और पंिक्ंत छंद में पांच पद होते हैं।’

अष्टावक्र ने उत्तर दिया- ‘दक्षिणा में छ: गोएं देना उत्तम है। ऋतुएं छ: होती हैं। मन सहित इंद्रियां भी छ: हैं।’ इस प्रकार शास्त्रार्थ में बंदी की हार हो जाने पर अष्टावक्र ने कहा- ‘राजन! मैं वरूण का पुत्र हूं और मैंने हारे हुए सभी ब्रह्मणों को अपने पिता के पास भेज दिया है। मैं अभी उन सबको आपके समक्ष उपस्थित करता हूं।’ इतने में जल में डुबोए गए सारे ब्राह्मण जनक की सभा में आ गए। इनमें अष्टावक्र के पिता कहोड़ भी थे। अष्टावक्र ने पिता के चरण स्पर्श किए। कहोड़ ने प्रसन्न होकर कहा- ‘पुत्र, संमगा नदी में स्नान करने पर तुम मेरे शाप से मुक्त हो जाओगे।’ अष्टावक्र ने वैसा ही किया तथा उनके समस्त अंग सीधे हो गए।

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