Friday, 7 October 2011

गुरु बिन ज्ञान नही कितना सच !


इंसान के जन्म के बाद ही वह बहुत कुछ सीखता है। अच्छी आदतें या बुरी आदतें व्यक्ति उसके आसपास के वातावरण और लोगों के व्यवहार को देखकर ही सीखता है। जीवन की कई बातें वह गुरु या शिक्षा के माध्यम से सीखता है। कुछ आदतें व्यक्ति के स्वभाव में ही शामिल होती हैं जिन्हें बदलना किसी अन्य व्यक्ति के लिए काफी मुश्किल कार्य है।

कुछ बातें ऐसी हैं जो व्यक्ति के जन्म के साथ ही स्वभाव में शामिल रहती हैं इन बातों को कोई भी किसी को नहीं सीखा सकता। आचार्य चाणक्य ने चार बातें बताई हैं, इन बातों को कोई भी व्यक्ति किसी को नहीं सीखा सकता। ये चार बातें हैं व्यक्ति की दानशक्ति, मीठा बोलना, धैर्य धारण करना, समय पर उचित या अनुचित निर्णय लेना।

चाणक्य के अनुसार कोई भी व्यक्ति कितना दानवीर है वह उसके स्वभाव में ही रहता है। किसी भी इंसान की दानशक्ति को कम करना या बढ़ाना बहुत ही मुश्किल कार्य है। यह आदत व्यक्ति के जन्म के साथ ही आती है।

दूसरी बात, मीठा बोलना। यदि कोई व्यक्ति कड़वा बोलने वाला है तो उसे लाख समझा लो कि वह मीठा बोलें लेकिन वह अपना स्वभाव लंबे समय तक नहीं बदल सकता है। जो व्यक्ति जन्म से ही कड़वा बोलने वाला है उसे कोई मीठा बोलना नहीं सिखाया जा सकता। यह आदत भी व्यक्ति के जन्म के साथ ही उसके स्वभाव में शामिल रहती है।

तीसरी बात, धैर्य धारण करना। धैर्य एक ऐसा गुण है जो व्यक्ति को हर विषम परिस्थिति से बचाने में सक्षम है। विपरित परिस्थितियों में धैर्य धारण करके ही बुरे समय को दूर किया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति हर कार्य जल्दबाजी में करता है, त्वरित निर्णय कर लेता है और बाद में हानि उठाता है। ऐसे लोगों को धैर्य की शिक्षा देना भी समय की बर्बादी ही है क्योंकि यह गुण भी व्यक्ति के जन्म के साथ ही उसके स्वभाव में रहता है।

चौथी बात है समय पर उचित या अनुचित निर्णय लेने क्षमता। किसी भी व्यक्ति को यह नहीं सिखाया जा सकता कि वह किस समय कैसे निर्णय लें। जीवन में हर पल अलग-अलग परिस्थितियां निर्मित होती हैं। ऐसे में सही या गलत का निर्णय व्यक्ति को स्वयं ही करना पड़ता है। जो भी व्यक्ति समय पर उचित और अनुचित निर्णय समझ लेता है वह जीवन में काफी उपलब्धियां प्राप्त करता है। यह गुण भी व्यक्ति के जन्म के साथ ही आता है और स्वभाव में ही शामिल रहता है।

सम्पूर्ण रमायण

आदि राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं कांचनम्।

वैदीहीहरणं जटायुमरणं, सुग्रीवसंभाषणम्।।

बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं, लंकापुरीदाहनम्।

पश्चाद् रावण कुम्भकर्ण हननम्, एतद्धि रामायणम्।।


रामायण भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। इसे पढऩे या सुनने मात्र से जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं। वर्तमान की भागदौड़ भरी जिंदगी में किसी के पास इतना समय नहीं होता कि वह संपूर्ण रामायण का पाठ या श्रवण कर सके। ऐसे में नीचे लिखे इस एक श्लोक का विधि-विधान पूर्वक जप करने से संपूर्ण रामायण पढऩे या सुनने का फल मिलता है। इसीलिए इस श्लोक को एक श्लोकी रामायण भी कहते हैं। 

Monday, 3 October 2011

ज्‍योतिष सीखें

Mach Making


 
 

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