Sunday, 27 November 2011

देश का दुश्मन कोन !

9041661207 ---? देश   का  दुश्मन  कोन !



राजा अपनी प्रजा के द्वारा किये पापों को भोगता है |


उसका फर्ज है की पाप कर्म को बड़ने ना दे ||


इसी तरहा राजाके पाप को पुरोहित भोगता है |


पति अपनी पत्नी के द्वारा किये पापको और गुरु अपने 


शिष्य के द्वारा किये पाप कर्म को भोगता है ||


इन सभी का सनातन धर्म है क़ि इन को पाप कर्म करने 


से रोकें अन्यथा दोनों क़ि ही बड़ी हानि होती है |


यह दोनों ही देश के दुश्मन कहलाते हैं |||||

Saturday, 26 November 2011

गीता श्री कृष्ण की वाणी


1. 0689 KRISHNA STORY -- BHAGWAT GITA -- GYAN YOGA -- BEST YAGYA
7:04
2. 0731 KRISHNA STORY -- MAHABHARAT -- ARJUN'S CHARIOT HIT BY NASTY BLOW!
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3. 0687 KRISHNA STORY -- BHAGWAT GITA -- KARMA AS YAGYAS -- TYPES OF YAGYAS
7:12
4. 0567 KRISHNA STORY -- HANUMAN MEET KRISHNA -- DWIT KILLED!.
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5. 0693 KRISHNA STORY -- BHAGWAT GITA -- MAYA -- REASON & HOW TO CONQUER IT
5:12
6. 0704 KRISHNA STORY BHAGWAT GITA ULTIMATE TRUTH MOKSHA EXPLAINED
4:52
7. 0697 KRISHNA STORY -- BHAGWAT GITA -- DEVOTIONAL BHAKTI AND ARJUN CONVINCED
8:59
8. 0701 KRISHNA STORY -- BHAGWAT GITA -- WORSHIP IN DIFFERENT FORMS AND FORMLESS WORSHIP
14:28
9. 0686 KRISHNA STORY -- BHAGWAT GITA -- SANKHYA AND KARMA YOGA
5:09
10. 0680 KRISHNA STORY -- BHAGWAT GITA -- DESIRES NEVER FULFILLED
4:39
11. 0667 KRISHNA STORY -- BHAGWAT GITA -- REVIEW ON BHAGWAT GITA
14:34
12. 0677 KRISHNA STORY -- BHAGWAT GITA -- STITHPRAGYA
3:40
13. 070 BHAGWAT GITA - Gyan Yoga vs Karma Yoga
2:55
14. 0703 KRISHNA STORY -- BHAGWAT GITA -- REBIRTH EXPLAINED
15:44
15. 0649 KRISHNA STORY -- BHAGWAT GITA -- KRISHNA PROVES ATMA DOES NOT DIE
2:58
16. 0692 KRISHNA STORY -- BHAGWAT GITA -- SAMARPAN - AND HOW TO DO IT
6:04
17. 0675 KRISHNA STORY -- BHAGWAT GITA -- KARMAYOGI CHARACTERISTICS
11:48
18. 0678 KRISHNA STORY -- BHAGWAT GITA -- PRAVRUTTI AND TRIGUNATMATKA PRAKRUTI
4:21
19. 0702 KRISHNA STORY -- BHAGWAT GITA -- CONCENTRATION IN GOD -- DHYAN YOGA
8:25
20. 0650 KRISHNA STORY -- BHAGWAT GITA -- DHRUSTHARA REACTS
3:57

Gगीता श्री कृष्ण की वाणी
हे प्रभु आप खुद ही माया में क्यों फंसाते हैं ?आप से बड़ा ज्ञानि इस ब्रह्मांड  में नही मिलने वाला क्या आप हमारे गुरु बनने के योग्य नही ,जो सांसारिक गुरु तलाशा जाए ?
  संपूर्ण गोपनीयों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन। तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे कहूँगा॥64॥ हे प्रभु आप खुद ही माया में क्यों फंसाते हैं ?आप से बड़ा ज्ञानि इस ब्रह्मांड में नही मिलने वाला क्या आप हमारे गुरु बनने के योग्य नही ,जो सांसारिक गुरु तलाशा जाए ?
संपूर्ण धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण (इसी अध्याय के श्लोक 62 की टिप्पणी में शरण का भाव देखना चाहिए।) में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर॥66॥
जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा- इसमें कोई संदेह नहीं है॥68॥
उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है तथा पृथ्वीभर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं॥69॥
जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है-

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
भावार्थ : क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित्‌ मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाए क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं॥23॥
यदि उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्‌ ।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥
भावार्थ : इसलिए यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ और मैं संकरता का करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ॥24॥


Monday, 21 November 2011

शिव-सेना की नजर में शिव का स्थान

शिव -सेना जो खुद को हिन्दुओं का ठेकेदार समझती है उन की नजर में वो शिव से भी बड़े बनते हैं 


शिव-  सेना {पठानकोट }द्वारा जारी किये पोस्टर तो यही दर्शाते हैं 



शिव-सेना की नजर में शिव का स्थान उन के बराबर या उनसे उपर 

Sunday, 20 November 2011

सनातन सिद्धांत


जीव व्यर्थ ही {नाना प्रकार के - अछे- बुरे }कर्म करता है 


उसका फल भी स्वयं  ही भोगता है वह स्वयं ही 


सांसारिक मोह माया में फंसता है और स्वयं ही इसे 


त्यागता है || यही सनातन सिद्धांत है 

वस्तुतः मनुष्य के हाथ में कुछ भी नही है ऐसा भी नही


की मनुष्य खाली हाथ आता और खाली हाथ जाता हो


मनुष्य ग्रहों -नक्षत्रों की फोज के आधीन प्रकट हो


नाना प्रकार के कर्मों में फंस कर उन के अछे - बुरे


फलों को भोगता भोगता चतपताने लगता है ,तब मनुष्य


को परमात्मा की याद आती है और इस जंजाल से छुटने


का उपाए धुड़ता है परन्तु परमात्मा पर भरोसा ना कर


किसी यंत्र -मन्त्र -तन्त्र -योग- व्रत -तप देहधारी गुरु


या माया के जाल में फंस कर और कष्ट उठाता है वो


यह भूल ही जाता है की परमात्मा ने कहा है कि
श्री भगवान बोले- कितने ही पण्डितजन तो काम्य कर्मों के (स्त्री, पुत्र और धन आदि प्रिय वस्तुओं की प्राप्ति के लिए तथा रोग-संकटादि की निवृत्ति के लिए जो यज्ञ, दान, तप और उपासना आदि कर्म किए जाते हैं, उनका नाम काम्यकर्म है।) त्याग को संन्यास समझते हैं तथा दूसरे विचारकुशल पुरुष सब कर्मों के फल के त्याग को (ईश्वर की भक्ति, देवताओं का पूजन, माता-पितादि गुरुजनों की सेवा, यज्ञ, दान और तप तथा वर्णाश्रम के अनुसार आजीविका द्वारा गृहस्थ का निर्वाह एवं शरीर संबंधी खान-पान इत्यादि जितने कर्तव्यकर्म हैं, उन सबमें इस लोक और परलोक की सम्पूर्ण कामनाओं के त्याग का नाम सब कर्मों के फल का त्याग है) त्याग कहते हैं॥2॥
जब कि परमात्मा कहते हैं 
 हे भारत! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में (लज्जा, भय, मान, बड़ाई और आसक्ति को त्यागकर एवं शरीर और संसार में अहंता, ममता से रहित होकर एक परमात्मा को ही परम आश्रय, परम गति और सर्वस्व समझना तथा अनन्य भाव से अतिशय श्रद्धा, भक्ति और प्रेमपूर्वक निरंतर भगवान के नाम, गुण, प्रभाव और स्वरूप का चिंतन करते रहना एवं भगवान का भजन, स्मरण करते हुए ही उनके आज्ञा अनुसार कर्तव्य कर्मों का निःस्वार्थ भाव से केवल परमेश्वर के लिए आचरण करना यह 'सब प्रकार से परमात्मा के ही शरण' होना है) जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा सनातन परमधाम को प्राप्त होगा॥62॥
अतः मनुष्य का यह माना कि देह धारी गुरु  ही भवसागर पार करवाए गा बहुत बड़ी भूल होती है 
 इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कह दिया। अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञान को पूर्णतया भलीभाँति विचार कर, जैसे चाहता है वैसे ही कर॥
संजय ने अपना मत गुरु के प्रति गुरु केरूप में परमात्मा को ही कहा है 
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥
भावार्थ :  हे राजन! जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है॥


Saturday, 12 November 2011

क्या यह सनातन धर्म नही है?


आस्था और धर्मशास्त्र के मामलों में अज्ञानता के कौन सा व्यक्ति क्षमा के योग्य है? - हिन्दी
 
वे कौन से लोग हैं जो अज्ञानता के कारण क्षम्य (मा’ज़ूर) समझे जायेंगे ? और क्या आदमी धर्मशास्त्र के मामलों में अपनी अज्ञानता के कारण क्षम्य समझा जायेगा ? या
मूलरूप में सनातन धर्म ही हिन्दू, मुसलमान ,सिख ,इसाई ही है |फिर इस का धर्म ऊँचा उनका नीचा ऐसा क्यों ?
खुदा कोई मुर्ख प्राणी नही है ,जब भी कोई मनुष्य जन्म लेता है .वह हिन्दू की ही निशानी ले कर पैदा होता है |
फिर पारिवारिक संस्कारों द्वारा मुसलमान ,सिख या इसाई हुआ करता है |
                                                                                               कोंन ऊँचा -कोन नीचा कोंन धर्म विरोधी 
कोंन धर्म का/कैसे निर्धारण किया जावे गा या इसी को मुदा बना इन चारों को लडाया जाता रहे गा ?
खाना - पीना ,सोना - जागना साँस लेना और दुनिया छोड़ चल देना इतना ही नही कहीं अलग जगहा नही एक ही जगहा जाना है |
     तो एक से नियम जो चारों धर्मों को आपस में जोड़ते हैं का प्रचार प्रसार कर सनातन धर्म की हिफाजत का उपाय क्यों ना किया जावे                  जेसे
१   चोरी करना पाप
२   झूठ बोलना पाप
३   व्य्य्भिचार पाप
४    बड़ों का आदर
५    पड़ोसी से प्रेम
६    देश भगती
7      दुखियों की मदद
८  गरीब के मददगार होना
९  अबल की मदद और सन्मान
१०  अपाहिज और दरिद्री का भी सन्मान
प्रभु आज्ञा को आंखें और बुधी को खुली रख कर मानना
                             क्या यह सनातन धर्म नही है?