Tuesday, 8 November 2011

जीवन में परमात्मा की अनुभूति से हमारे कर्म शुद्ध हो जाएंगे



इस वहम से जल्दी ही बाहर आना चाहिए कि यदि मैंने यह काम नहीं किया तो काम बिगड़ जाएगा या बड़ा भारी नुकसान हो जाएगा। जब हमें लगने लगता है कि हम ही करने वाले हैं, बस यहीं से अहंकार का प्रवेश होता है। अहंकार हमें यह भुला देता है कि संसार हम नहीं चला रहे, इसके पीछे कुछ स्थायी नियम हैं, जिससे संसार चल रहा है, लेकिन आदमी की आदत होती है खुद को खास बनाने की और जैसे ही यह भाव आता है, हम अपने कर्तव्य से हटकर खुद ही के बारे में चिंता पालने लगते हैं। चिंता अपने साथ ढेरों विचार लाती है और इसी में हम उलझ जाते हैं। संसार में रहना है तो काम तो करना ही पड़ेगा, जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ेंगी, लेकिन इनमें हमारी जो भूमिका है, उसको अहंकारमुक्त रखना होगा, क्योंकि अहंकार हमारी इस समझ को समाप्त कर देता है कि हम जो भी गलत करेंगे, उसका नुकसान हम ही उठाएंगे। अहंकार को दूसरे में दोष ढूंढऩे की आदत होती है। बस यहीं से हम फिर दूसरों के जीवन में आक्रमण शुरू करते हैं। हम भूल जाते हैं कि यह सब पलटकर हमारे ऊपर ही आएगा। अध्यात्म कहता है कि दूसरा कोई होता ही नहीं है, सारी स्थितियां हमारा ही विस्तार हैं। बात गहरी और समझने लायक है। हमें दूरी दिखती है खुद में और दूसरे में, लेकिन ऐसा होता नहीं है। परमात्मा ने संसार को सार्वभौम नियम से बनाया है। हर आदमी का कर्म उसी के लिए प्रभावशाली होगा, दिखेगा जरूर कि दूसरे प्रभावित हो रहे हैं, इसलिए जितना हम अपने जीवन में परमात्मा के होने की अनुभूति करेंगे, उतना ही हमारे कर्म शुद्ध हो जाएंगे और इसी में शांति बसी है।

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