Thursday, 10 November 2011

दुख में विस्मृति मदद करती है लेकिन मन तर्क देता है

दुख में विस्मृति मदद करती है लेकिन मन तर्क देता है 

कहा जाता है कि परेशानी हो तो थोड़ा भूलने की आदत डाल लें। दुख में विस्मृति भी मदद करती है, लेकिन फिर मन तर्क देता है कि क्यों और कैसे भुला दें? खासतौर पर जब घटना हमारे साथ ही हुई हो। अपनी हानि हो गई, किसी ने अपमान कर दिया, कुछ छूट गया, किसी की मृत्यु हो गई। इसे कैसे भुला दिया जाए? यह प्रश्न मुसीबत में फंसे लगभग हर इंसान के मन में उठेगा। इसीलिए व्यक्ति मुसीबत से अपने को अलग नहीं कर पाता। यदि शरीर में कोई बहुत बड़ा कष्ट है और वह सहन के बाहर हो रहा है तो उसे भुलाना अवश्य ही कठिन होगा। फिर भी मन को किसी न किसी प्रकार से समझाना ही होगा।मन बहुत ही चंचल होता है ,  यदि मन नहीं सुलझेगा तो वह कष्ट और भयंकर बनकर सामने आएगा। वैसे तो इस प्रकार के किसी शारीरिक कष्ट को मुसीबत नहीं कहते, मुसीबत मानसिक ही होती है। मन का अधैर्य हो जाना, अत्यधिक उलझ जाना, बौखला जाना, अधिक चिंता बढ़ जाना आदि जैसी मानसिक स्थितियों को ही आदमी मुसीबत का समय मानता है। मन प्रफुल्लित हो तो शरीर में कितनी भी वेदना हो, आदमी उसे कुछ नहीं समझता, मामूली-सी बात समझकर झेल जाता है। जब हम मानसिक रूप से विचलित होते हैं, तब हम पहचान भी नहीं पाते कि मामला आखिर है क्या? उस समय जीवन में गुरु या किसी डोक्टर  की जरूरत नही होती है। सनातन धर्म और इसकी पवित्र पुस्तकें  हमें बतातीं  हैं कि खुद से थोड़ा अलग हटो। जब भी मुसीबत आए, अपने आप को दुनिया में से बाहर निकाल लो और एकांत में खुद को सनातन धर्म के नियमों में बाँध लो फिर देखो आप एकांत में जो भी होंगे, वही आपका होना है। अपने होने को जान लेना ही मुसीबत से मुक्ति है।

कर्म का लेख मिटे ना भाई, चाहे कोई लाख करे चतुराई

किताबें ऐसी शिक्षक हैं जो बिना कष्ट दिए, बिना आलोचना किए और बिना परीक्षा लिए हमें शिक्षा देती हैं।ढोंगी गुरु होते हैं ग्रन्थ नही

जिस काम की तुम कल्पना करते हो उसमें जुट जाओ। साहस में प्रतिभा, शक्ति और जादू है। साहस से काम शुरु करो पूरा अवश्य होगा। 
वृक्ष अपने सिर पर गरमी सहता है पर अपनी छाया में दूसरों का ताप दूर करता है।
प्रत्येक कार्य अपने समय से होता है उसमें उतावली ठीक नहीं, जैसे पेड़ में कितना ही पानी डाला जाय पर फल वह अपने समय से ही देता है।
चापलूसी का ज़हरीला प्याला आपको तब तक नुकसान नहीं पहुँचा सकता जब तक कि आपके कान उसे अमृत समझ कर पी न जाएँ।
धैर्यवान मनुष्य आत्मविश्वास की नौका पर सवार होकर आपत्ति की नदियों को सफलतापूर्वक पार कर जाते हैं।
कलियुग में रहना है या सतयुग में यह तुम स्वयं चुनो, तुम्हारा युग तुम्हारे पास है।

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