Thursday, 1 December 2011

ढोल,गँवार ,सूद्र ,पसु ,नारी।सकल ताड़ना के अधिकारी।।


रामचरितमानस का पारायण हम बचपन से ही करते आ रहे हैं। शुरुआत में तो अंत्याक्षरी में अपने जौहर दिखाने के लिये। उन दिनों हमारे गुरुजी कविताओं तथा रामचरितमानस की चौपाइयों के आधार पर अंत्याक्षरी कराते। कवितायें तो गिनी-चुनी याद थीं लेकिन चौपाइयों-दोहे की संपदा दिन-पर-दिन बढ़ती गई। बाद में देखा कि हर खुशी के मौके पर लोग ‘रामायण’ का अखंड पाठ कराते। पाठ दो दिन चलता। श्रद्धालु लोग कभी द्रुत, कभी विलम्बित लय में मानस का पाठ करते। तमाम हनुमान भक्त हर सोमवार को सुंदरकाण्ड का पाठ करते हैं।
बाद में मानस से और जुड़ाव होता गया। नीति संबंधी दोहे-चौपाइयों का रामचरितमानस में अद्भुत संकलन है। हमने भी तमाम प्रश्नों के उत्तर रामशलाका प्रश्नावली में खोजे। रामचरित मानस लोकमंगलकारी ग्रन्थ के रूप में जाना जाता है। लेकिन समय-समय पर इसके तमाम अंशो पर सवाल उठाये जाते रहते हैं। इसमें से एक चौपाई जिसका सबसे ज्यादा जिक्र होता है वह है:-

ढोल,गँवार ,सूद्र ,पसु ,नारी।सकल ताड़ना के अधिकारी।।


अक्सर इस चौपाई को लेकर दलित संगठन,महिला संगठन तथा कभी-कभी मानवाधिकार संगठन भी अपना आक्रोश जताते हैं। कुछ लोग इसे रामचरितमानस से निकालने की मांग करते हैं। कभी मानस की प्रतियां जलाते हैं। तुलसीदास को प्रतिगामी दलित,महिला विरोधी बताते हैं। अगर आज वे होते शायद तस्लीमा नसरीन की तरह या सलमान रस्दी की तरह देशबदर न सही तो जिलाबदर तो कर ही दिये जाते।
वैसे तुलसीदास जी के रचे तमाम प्रसंगों से ऐसा लगता है कि गोस्वामी जी आदतन स्त्री विरोधी थे। शायद अपने जीवन के कटु अनुभव हावी रहे हों उनपर। नहीं तो वे राम के साथ सीताजी की तरह लक्ष्मण के साथ उर्मिलाजी को भी वन भेज देते या फिर रामचन्द्रजी से सीता त्याग की बजाय सिंहासन त्याग करवाते तथा रामचन्द्रजी को और बड़ा मर्यादा पुरुषोत्तम दिखाते।
बहरहाल यह चौपाई बहुत दिन से मेरे मन में थी तथा मैं यह सोचता था कि क्यों लिखा ऐसा बाबाजी ने। मैं कोई मानस मर्मज्ञ तो हूं नहीं जो इसकी कोई अलौकिक व्याख्या कर सकूं। फिर भी मैं सोचता था कि ‘बंदउं संत असज्जन चरना’लिखकर मानस की शुरुआत करने वाला व्यक्ति कैसे समस्त ‘शूद्र’ तथा ‘स्त्री’ को पिटाई का पात्र मानता है।
कल फिर से मैंने यह चौपाई पढ़ी। अचानक मुझे स्व.आचार्य विष्णु कांत शास्त्री जी का एक व्याख्यान याद आया। दो साल पहले उन्होंने किसी रचना पर विचार व्यक्त करते हुये सारगर्भित व्याख्यान दिया था । तमाम उदाहरण देते हुये स्थापना की थी कि श्रेष्ठ रचनाकार अपने अनुकरणीय आदर्शों की स्थापना अपने आदर्श पात्र से करवाता है। अनुकरणीय आदर्श ,कथन अपने श्रेष्ठ पात्र के मुंह से कहलवाता है।

इस वक्तव्य की रोशनी में मैंने सारा प्रसंग नये सिरे से पढ़ा। यह प्रसंग उस समय का है जब हनुमानजी सीता की खबर लेकर वापस लौट आये थे। तथा राम सीता मुक्ति हेतु अयोध्या पर आक्रमण करने के लिये समुद्र से रास्ता देने की
विनती कर रहे थे। आगे पढ़ें:-

विनय न मानत जलधि जड़ गये तीन दिन बीत।

बोले राम सकोप तब भय बिनु होय न प्रीत ।। 

(इधर तीन दिन बीत गये,किंतु जड़ समुद्र विनय नहीं मानता। तब रामजी क्रोधसहित बोले- बिना भय के प्रीति नहीं होती)

लछिमन बान सरासन आनू।सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु।।
सठ सन बिनय कुटिल सम प्रीती।सहज कृपन सन सुंदर नीती।। 

(हे लक्ष्मण! लाओ तो धनुष-बाण। मैं अग्निबाण से समुद्र को सोख डालूं। मूर्ख से विनय, कुटिल के साथ प्रीति, कंजूस से उदारता की बात)


ममता रत सम ग्यान कहानी।अति लोभी सन बिरति बखानी ।।

क्रोधिहिं सम कामिहि हरि कथा।ऊसर बीज बएँ फल जथा ।।

(ममता में डूबे व्यक्ति से ज्ञान की कहानी,लोभी से वैराग्य का वर्णन,क्रोधी से शान्ति की बात और कामी से भगवान की कथा, इनका फल वैसा ही व्यर्थ होता है जैसा ऊसर में बीज बोने से होता है)

अस कहि रघुपति बान चढ़ावा।यह मत लछिमन के मन भावा ।।

संधानेउ प्रभु बिसिख कराला।उठी उदधि उर अंतर ज्वाला ।।

 (ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी ने धनुष चढ़ाया। यह मत लक्ष्मणजी के मन को बहुत अच्छा लगा। प्रभु ने भयानक अग्निबाण सन्धान किया,समुद्र के हृदय में अग्नि की ज्वाला उठी)


मकर उरग झष गन अकुलाने।जरत तुरंत जलनिधि जब जाने।।

कनक थार भरि मनि गन नाना।बिप्र रूप आयउ तजि माना।।

(मगर,सांप तथा मछलियों के संमूह व्याकुल हो गये। जब समुद्र ने जीवों को जलते जाना तब सोने के थाल में अनेक रत्नों को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मण के रूप में आया)

काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।

बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।। 

(चाहे कोई कितने ही उपाय कर ले पर केला तो काटने पर ही फलता है । नीच विनय से नहीं मानता वह डांटने पर ही रास्ते पर आता है।)

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे।छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।

गगन समीर अनल जल धरनी।इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।

 (समुद्र ने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़कर कहा-हे नाथ! मेरे सब अवगुण क्षमा कीजिये। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि ,जल और पृथ्वी- इन सब की करनी स्वभाव से ही जड़ है।)

तव प्रेरित माया उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।

प्रभु आयसु जेहिं कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।। 

(आपकी प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि के लिये उत्पन्न किया है,सब ग्रन्थों ने यही गाया है। जिसके लिये स्वामी की जैसी आज्ञा है,वह उसी प्रकार रहने में सुख पाता है।)

प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही।मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।

ढोल , गँवार ,सूद्र ,पसु नारी।सकल ताड़ना के अधिकारी।।

 (प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे दण्ड दिया। किंतु मर्यादा(जीवों का स्वभाव भी आपकी ही बनायी हुई है। ढोल,गँवार,शूद्र,पशु और स्त्री -ये सब दण्ड के अधिकारी हैं)

प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई।उतरिहि कटकु न मोरि बढ़ाई।।

प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई।करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई।।


 (प्रभु के प्रताप से मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जायेगी,इसमें मेरी मर्यादा नहीं नहीं रहेगी। तथापि आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं हो सकता । ऐसा वेद गाते हैं । अब आपको जो अच्छा लगे, मैं तुरंत वही करूँ।)
अंत में समुद्र ने विधि बताई कि नल-नील नामक दो भाई हैं जिनके स्पर्श से पत्थर तैरने लगते हैं। उनके हाथ से पुल बने जिसके ऊपर से वानर सेना लंका जा सकती है।
बहरहाल यह तय हुआ कि यह विवादास्पद चौपाई राम ने नहीं कही। अत: यह तुलसीदास जी का मंतव्य नहीं था। यह किसी भी तरह से उनका आदर्श नहीं था। यहां समुद्र अधम पात्र के रूप में चित्रित है। अधम माने आज के विलेन टाइप के। या फिर कैरेक्टर रोल की तरह जो शुरु में खराब रहते हैं तथा बाद में सुधर जाते हैं। तो ऐसे पात्र के मुंह से कही बात कवि का आदर्श नहीं हो सकती। अत: इस चौपाई के ऊपर लोगों का अपने कपड़े फाड़ना शायद जायज नहीं है।
शायद आप यह समझें कि मैं तुलसीदास के नकारात्मक मूल्यों को सही ठहराना चाहता हूं। लेकिन ऐसा कतई नहीं हैं। मैं तो चीजों को उनके संदर्भ में रखने की कोशिश कर रहा हूं। आप सहमत हों तो ठीक । न हों तो आपकी मर्जी।

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