Monday, 1 October 2012

ध्रुव बने तारा

गीता   | वेद-पुराण पढो या सुनो | परिचय  |श्री राम |  

  अपना भविष्य खुद जाने |


स्वयंभुव मनु और शतरुपा के दो पुत्र थे-प्रियवत और उत्तानपाद। उत्तानपाद की सुनीति और सुरुचि नामक दो पत्नियां थीं। राजा उत्तानपाद को सुनीति से ध्रुव और सुरुचि से उत्तम नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए। यद्पि सुनीति बड़ी रानी थी परन्तु उत्तानपाद का प्रेम सुरुचि के प्रति अधिक था। एक बार सुनीति का पुत्र ध्रुव अपने पिता की गोद में बैठा खेल रहा था। इतने में सुरुचि वहां आ पहुंची।

ध्रुव को उत्तानपाद की गोद में खेलते देख उसका पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। सौतन के पुत्र को अपने पति की गोद में वह बर्दाश्त न कर सकी। उसका मन ईष्र्या से जल उठा। उसने झपट कर बालक ध्रुव को राजा की गोद से खींच लिया और अपने पुत्र उत्तम को उसकी गोद में बिठा दिया तथा बालक ध्रुव से बोली, अरे मूर्ख! राजा की गोद में वही बालक बैठ सकता है जो मेरी कोख से उत्पन्न हुआ हो।

तू मेरी कोख से उत्पन्न नहीं हुआ है। इसलिए तुझे इनकी गोद में या राजसिंहासन पर बैठने का कोई अधिकार नहीं है। पांच वर्ष के ध्रुव को अपनी सौतेली मां के व्यवहार पर क्रोध आया। वह भागते हुए अपनी मां सुनीति के पास आए तथा सारी बात बताई। सुनीति बोली, बेटा! तेरी सौतेली माता सुरुचि से अधिक प्रेम के कारण तुम्हारे पिता हम लोगों से दूर हो गए हैं।

तुम भगवान को अपना सहारा बनाओ। माता के वचन सुनकर ध्रुव को कुछ ज्ञान उत्पन्न हुआ और वह भगवान की भक्ति करने के लिए पिता के घर को छोड़ कर चल पड़े। मार्ग में उनकी भेंट देवार्षि नारद से हुई।  देवार्षि ने बालक ध्रुव को समझाया, किन्तु ध्रुव नहीं माना। नारद ने उसके दृढ़ संकल्प को देखते हुए ध्रुव को मंत्र की दीक्षा दी। इसके बाद  देवार्षि राजा उत्तानपाद के पास गए।

राजा उत्तानपाद को ध्रुव के चले जाने से बड़ा पछतावा हो रहा था। देवार्षि नारद को वहां पाकर उन्होंने उनका सत्कार किया। देवॢष ने राजा को ढांढस बंधाया कि भगवान उनके रक्षक हैं। भविष्य में वह अपने यश को सम्पूर्ण पृथ्वी पर फैलाएंगे। उनके प्रभाव से आपकी कीॢत इस संसार में फैलेगी। नारद जी के इन शब्दों से राजा उत्तानपाद को कुछ तसल्ली हुई।

उधर बालक ध्रुव यमुना के तट पर जा पहुंचे तथा महॢष नारद से मिले मंत्र से भगवान नारायण की तपस्या आरम्भ कर दी। तपस्या करते हुए ध्रुव को अनेक प्रकार की समस्याएं आईं परन्तु वह अपने संकल्प पर अडिग रहे। उनका मनोबल विचलित नहीं हुआ। उनके तप का तेज तीनों लोकों में फैलने लगा। ओम नमो भगवते वासुदेवाय की ध्वनि वैकुंठ में भी गूंज उठी।

तब भगवान नारायण भी योग निद्रा से उठ बैठे। ध्रुव को इस अवस्था में तप करते देख नारायण प्रसन्न हो गए तथा उन्हें दर्शन देने के लिए प्रकट हुए। नारायण बोले, हे राजकुमार! तुम्हारी समस्त इच्छाएं पूर्ण होंगी। तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें वह लोक प्रदान कर रहा हूं, जिसके चारों ओर ज्योतिष चक्र घूमता है तथा जिसके आधार पर सब ग्रह नक्षत्र घूमते हैं।

प्रलयकाल में भी जिसका कभी नाश नहीं होता। सप्तऋषि भी नक्षत्रों के साथ जिस की प्रदक्षिणा करते हैं। तुम्हारे नाम पर वह लोक ध्रुव लोक कहलाएगा। इस लोक में छत्तीस सहस्र वर्ष तक तुम पृथ्वी पर शासन करोगे। समस्त प्रकार के सर्वोत्तम ऐश्वर्य भोग कर अंत समय में तुम मेरे लोक को प्राप्त करोगे। बालक ध्रुव को ऐसा वरदान देकर नारायण अपने लोक लौट गए। नारायण के वरदान स्वरूप ध्रुव समय पाकर ध्रुव तारा बन गए।

माता पिता ऋण, पितृलोक,तर्पण

गीता   | वेद-पुराण पढो या सुनो | परिचय  |श्री राम |  

  अपना भविष्य खुद जाने 



इस संसार में अगर भगवान से भी अधिक ऋण किसी का हम पर होता है तो वह है हमारे माता-पिता का ऋण। माता-पिता ही बच्चों के लिए पूरा संसार होते हैं। गणेश जी ने अपने माता-पिता के चारों तरफ चक्कर लगाकर यह सिद्ध किया था कि माता-पिता के ईर्द-गिर्द ही हमारी पूरी दुनिया है। माता-पिता के कदमों में ही हमारी पूरी दुनिया बसती है। आज भी लोग अपने माता-पिता और पूर्वजों को अपनी यादों में बसा कर रखते हैं। भारतीय संस्कृति में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन की परम्परा है। श्रद्धापूर्वक मृतकों के निमित्त किए जाने वाले इस कर्म को श्राद्ध कहा जाता है और इस श्राद्ध को करने का सबसे सही समय पितृपक्ष माना जाता है।


अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक तर्पण देने का पर्व पितृ पक्ष कहलाता है। पितरों से तात्पर्य मृत पूर्वजों से है यानी लौकिक संसार से जा चुके माता, पिता, दादा, दादी, नाना, नानी आदि। शास्त्रों में इस पर्व का विशेष महत्व बताया गया है जिसमें संतानों से मिला तर्पण सीधे पुरखों को मिल जाता है।

पितृलोक की प्राप्ति

व्यक्ति जब देह छोड़ता है तो तीन दिन के भीतर वह पितृलोक चला जाता है। इसीलिए ‘तीज’ मनाई जाती है। कुछ आत्माएं 13 दिन में पितृलोक चली जाती हैं, इसीलिए त्रयोदशाकर्म (13वां) किया जाता है और कुछ सवा माह अर्थात् 37वें या 40वें दिन। फिर एक वर्ष पश्चात तर्पण किया जाता है।

पितृलोक के बाद उन्हें पुन: धरती पर कर्मानुसार जन्म मिलता है या वे ध्यानमार्गी रही हैं तो वे चक्र से मुक्त हो जाती हैं। हमारे जो पूर्वज पितृलोक नहीं जा सके या जिन्हें दोबारा जन्म नहीं मिला, ऐसी अतृप्त और आसक्त भाव में लिप्त आत्माओं के लिए अंतिम बार एक वर्ष पश्चात ‘गया’ में मुक्ति-तृप्ति का कर्म तर्पण और पिंडदान किया जाता है। गया के अतिरिक्त और कहीं भी यह कर्म नहीं होता है। उक्त स्थान का विशेष वैज्ञानिक महत्व है।


 
क्या कहते हैं वेद

यजुर्वेद में कहा गया है कि शरीर छोडऩे के पश्चात्य, जिन्होंने तप-ध्यान किया है वे ब्रह्मलोक चले जाते हैं अर्थात् ब्रह्मलीन हो जाते हैं। कुछ सतकर्म करने वाले भक्तजन स्वर्ग चले जाते हैं। स्वर्ग अर्थात् वे देव बन जाते हैं। राक्षसी कर्म करने वाले कुछ प्रेत योनि में अनंतकाल तक भटकते रहते हैं और कुछ पुन: धरती पर जन्म ले लेते हैं। जन्म लेने वालों में भी जरूरी नहीं कि वे मनुष्य योनि में ही जन्म लें। इससे पूर्व ये सभी पितृलोक में रहते हैं वहीं उनका न्याय होता है। 
ये हैं हमारे पितर

उक्त सभी हमारे पितर हैं। इस तरह जिन्हें हम जानते हैं और जिन्हें हम नहीं भी जानते हैं, सभी के लिए हम अन्न-जल को अग्नि को दान करते हैं। अग्नि उक्त अन्न-जल को हमारे पितरों तक पहुंचा कर उन्हें तृप्त करती है। श्राद्ध और तर्पण के जल और अग्नि के माध्यम से यह सुगंध रूप में गया भोजन उन पितरों तक पहुंच कर उन्हें तृप्त करता है।

श्राद्ध कर्म : पितृदोष से मुक्ति
वेदानुसार यज्ञ पांच प्रकार के होते हैं - 

(1) ब्रह्म यज्ञ (2) देव यज्ञ (3) पितृ यज्ञ (4) वैश्वदेव यज्ञ 

 (5) अतिथि यज्ञ। 

उक्त पांच यज्ञों को पुराणों और अन्य ग्रंथों में विस्तार से दिया गया है। उक्त पांच यज्ञ में से ही एक यज्ञ है पितृ यज्ञ। इसे पुराण में श्राद्ध कर्म की संज्ञा दी गई है।

पूर्वजों के कार्यों के फलस्वरूप आने वाली पीढ़ी पर पडऩे वाले अशुभ प्रभाव को पितृ दोष कहते हैं। पितृ दोष का अर्थ यह नहीं कि कोई पितृ अतृप्त होकर आपको कष्ट दे रहा है। पितृ दोष का अर्थ वंशानुगत, मानसिक और शारीरिक रोग और शोक भी होते हैं। घर और बाहर जो वायु है वह सभी पितरों को धूप, दीप और तर्पण देने से शुद्ध और सकारात्मक प्रभाव देने वाली बन जाती है।

Sunday, 23 September 2012

श्राद्ध में

गीता   | वेद-पुराण पढो या सुनो | परिचय  |श्री राम   |  अपना भविष्य खुद जाने 

पितृपक्ष में सूर्य कन्या राशि के दशवें अंश पर आता है और वहां से तुला राशि की ओर बढ़ता है। इसे कन्यागत सूर्य कहते हैं। जब सूर्य कन्यागत हो तो उस समय पितरों का श्राद्ध करना अति महत्वपूर्ण कहा गया है। प्रतिवर्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक श्राद्ध पक्ष मान्य रहता है। इस वर्ष यह 29 सितम्बर से 15 अक्तूबर तक रहेगा। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध पक्ष में दिवंगत पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान यज्ञ और भोजन का विशेष प्रावधान बताया गया है।

साल में जिस भी तिथि को वे  दिवंगत होते हैं, पितृपक्ष की उसी तिथि को उनके निमित्त विधि-विधान पूर्वक श्राद्ध कार्य सम्पन्न किया जाता है। दिवंगत पूर्वजों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किए दान को ही श्राद्ध कहा जाता है। ‘सुसंस्कृत व्यन्जनाद्यं च पयोदधिघृतान्वितम्, श्रद्धया दीयते यस्मात श्राद्धं तेन प्रकीर्तितम।।  अर्थात पकाए हुए शुद्ध पकवान व दूध, दही, घी आदि को श्रद्धापूर्वक पितरों के निमित्त दान करने का नाम ही श्राद्ध है। ‘ब्रह्मपुराण’ में कहा गया है ‘आयु: प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च।

प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितर:
श्राद्ध तर्पिता।।’अर्थात श्राद्ध के द्वारा प्रसन्न हुए पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष और स्वर्ग आदि प्रदान करते हैं। पितृश्वरों के आशीर्वाद से ही जन्म कुंडली में निर्मित पितृदोषों के दुष्परिणामों से बचा जा सकता है। आश्विन कृष्ण पक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाते हैं जबकि वार्षिक श्राद्ध एकोदिष्ट होते हैं। वसु, रुद्र और आदित्य श्राद्ध के देवता हैं। ये तीनों हमारे द्वारा किए गए श्राद्ध कर्म से तृप्त होकर मनुष्यों के पितरों को भी तृप्त करते हैं। याज्ञवल्क्य का कथन है कि श्राद्ध देवता श्राद्ध कत्र्ता को दीर्घ जीवन, आज्ञाकारी संतान, धन विद्या, संसार के सुख भोग, स्वर्ग तथा दुर्लभ मोक्ष भी प्रदान करते हैं।


पितरों की मनुहार:
‘विष्णु पुराण’ में कहा गया है कि श्राद्ध और तर्पण से तृप्त होकर पितृगण समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हैं। श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों के द्वारा ही होती है अत: श्राद्ध के अवसर पर दिवंगत पूर्वजों की मृत्यु तिथि को निमंत्रण देकर ब्राह्मण को भोजन, वस्त्र और दक्षिणा सहित दान देकर श्राद्ध कर्म करना चाहिए। इस दिन पांच पत्तों पर अलग-अलग भोजन सामग्री रखकर पंचबलि करें। इसके बाद अग्नि में भोजन सामग्री, सूखे आंवले और मुनक्का का भोग लगाएं। श्राद्ध में एक हाथ से पिंड और आहूति दें लेकिन तर्पण में दोनों हाथों से जल दें।


तर्पण (तिलांजलि):
श्राद्ध तिथि को स्नान करके पितरों के लिए दिया हुआ तिल मिश्रित जल भी उनके लिए अक्षय तृप्ति का साधक होता है। पितरों का तर्पण करने के पूर्व ओम आगच्छन्तु में पितर इमं गृश्न्तु जलान्जलिम।।’ मंत्र से उनका आह्वान करें। अब तिल के साथ पिता, पितामह, प्रपितामह और माता, मातामह, प्रमातामह के निमित्त तीन-तीन तिलांजलियां दें। तर्पण में दक्षिण की ओर मुख करके अंजली में कुश के साथ तिल मिश्रित जल लेकर पितृ तीर्थ मुद्रा (दाहिने अंगूठे के सहारे) से उसे जल में डाल दें और पुन: आकाश की तरफ गिराएं। पितरों का निवास आकाश और दक्षिण दिशा होता है।


श्राद्ध में क्या करें:
श्राद्ध अपने ही घर में करना चाहिए, दूसरे के घर में करना निषेध है। श्राद्ध केवल अपराह्न काल में ही करें। श्राद्ध में तीन वस्तुएं पवित्र हैं-दुहिता पुत्र, कुतपकाल (दिन का आठवां भाग) और काले तिल। श्राद्ध में तीन प्रशंसनीय बातें हैं-बाहर भीतर की शुद्धि,  क्रोध और जल्दबाजी नहीं करना। श्राद्ध काल में गीताजी, श्रीमद्भागवत पुराण, पितृसूक्त, पितृ संहिता, रुद्र सूक्त, ऐन्द्र मधुमति सूक्त का पाठ करना मन, बुद्धि और कर्म तीनों की शुद्धि के लिए बेहद फलप्रद है।


श्राद्ध काल में जपनीय मंत्र:
1.ओम क्रीं क्लीं ऐं सर्वपितृभ्यो स्वात्म सिद्धये ओम फट।। 
2. ओम सर्व पितृ प्रं प्रसन्नो भव ओम । 
3. ओम पितृभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधानम: पितामहेभ्य स्वधायिभ्य: स्वधा नम:। प्रपितामहेभ्य स्वधायिभ्य: स्वधा नम: अक्षन्न पितरो मीमदंत पितरोतीतृपंत पितर: पितर: शुन्दध्वम।। ओम पितृभ्यो नम: पितराय नम:।। 
इसके अलावा जिनकी जन्म पत्रिका में पितृदोष  हो तो वे पितृ पक्ष में नित्य ओम ऐं पितृदोष शमनं ह्नीं ओम स्वधा।।  नित्य मंत्र जाप के पश्चात तिलांजलि से अघ्र्य दें व किसी निर्धन को तिल दान अवश्य करें।


श्राद्ध में क्या नहीं करें:
‘पद्म पुराण’ और ‘मनुस्मृति’ के अनुसार श्राद्ध का दिखावा नहीं करें, उसे गुप्त रूप से एकांत में करें। धनी होने पर भी इसका विस्तार न करें और भोजन के माध्यम से मित्रता, सामाजिक या व्यापारिक संबंध स्थापित न करें। श्राद्ध के दिन घर में दही नहीं बिलोएं, चक्की नहीं चलाएं तथा बाल न कटवाएं। महाभारत के अनुसार बैंगन, गाजर, मसूर, अरहर, गोल लौकी, शलजम, हींग, प्याज, लहसुन, काला नमक, कालाजीरा, सिंघाड़ा, जामुन, पिपली, सुपारी, कुलपी, महुआ, अलसी, पीली सरसों और चना का प्रयोग श्राद्ध में निषिद्ध है।

पितृ पक्ष में कूप निर्माण, बावड़ी, बाग, वन का प्रारम्भ और देव प्रतिष्ठा व किसी भी प्रयोजन के निमित्त व्रत, उत्सव, उद्यापन, वधू प्रवेश आदि कार्य करना वर्जित है। घर में पेंट करना, नए वस्त्र खरीदना, मकान, विवाह और विवाह की बात चलाना भी वर्जित है। किसी भी नए काम की शुरूआत इन दिनों नहीं करनी चाहिए।


श्राद्ध कब न करें:
पूर्वजों की मृत्यु के प्रथम वर्ष में श्राद्ध नहीं करें। पूर्वाह्न में, शुक्ल पक्ष में, रात्रि में और अपने जन्म दिन में श्राद्ध नहीं करना चाहिए। कूर्म पुराण के अनुसार जो व्यक्ति अग्नि, विष आदि के द्वारा आत्महत्या करता है उसके निमित्त श्राद्ध तर्पण करने का विधान नहीं है। इसी प्रकार चतुर्दशी तिथि को श्राद्ध नहीं करना चाहिए। इस तिथि को मृत्यु प्राप्त पितरों का श्राद्ध दूसरे दिन अमावस्या को करने का विधान है।  चतुर्दशी को श्राद्ध करने  से अनिष्ट हो सकता है परंतु जिनके पितृ युद्ध में श से मारे गए हों उनका श्राद्ध चतुर्दशी को करने से वे प्रसन्न होते हैं और परिवारजनों पर आशीर्वाद बनाए रखते हैं।

भगवान शिव की प्रतिमा




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 ब्रिटेन के एक चर्च में भगवान शिव की प्रतिमा भी स्थापित है। यह चर्च वेल्स के उत्तर-पश्चिम में स्थित पेन्नल नामक गांव में है। शिव की प्रतिमा यहां कुछ वर्ष पहले लगाई गई थी जिसके बाद यह यहां का स्थायी अंग बन गई।

चर्च में से इस प्रतिमा की दो बार चोरी भी हो चुकी है। चर्च के 40 सदस्यों ने पैसा इकटठा कर नई प्रतिमा की स्थापना कर दी। हिंदू धार्मिक नेता राजन जैद ने इसे लेकर सेंट पीटर एड विंकुला चर्च की सराहना करते हुए कहा कि यह हमें सभी धर्मों के लोगों के मिलजुल कर रहने की सीख देता है।

Monday, 10 September 2012

13 ही 13

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नाधि सिंधु हाटक पुर जारा ।
निसिचर गन बधि बिपिन उजारा ।।
सो सब तब प्रताप रघुराई ।
नाथ न कछु मोरी प्रभुताई ।।


Sunday, 9 September 2012

प्रेम

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ऊर्जा प्रेम का महत्व उपनिषदों के अनुसार समस्त विश्व एक आत्मा का ही विस्तार है। एक ही आत्मा जो हममें है वही दूसरों में भी है। उसके अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है, परंतु हम एक दूसरे को पृथक-पृथक देखते हैं और तद्नुसार मित्रता-वैर, सहयोग-असहयोग, प्रेम-घृणा, द्वेष आदि का व्यवहार करते हैं। यह अविद्या या अज्ञान के कारण है, परंतु जब मनुष्य अपने संयम, तप और ईश्वर की कृपा से इस अज्ञान या अविद्या को दूर का पाता है तब उसे सबमें उसी आत्मा का अनुभव होता है। फिर वह किसी को पराया नहीं समझता, किसी से द्वेष नहीं करता। वह सबको आत्मवत् ही समझता है अर्थात् दूसरे के सुख-दु:ख उसे अपने लगते हैं। उसे सभी जीव, वह स्वयं उसी एक आत्मा के ही रूप में या भगवद्रूप में दिखाई देते हैं। तब वह आनंद से विभोर हो जाता है और सबसे उपस्थित परमात्मा को वंदन एवं नमन करने लगता है। वह सबसे प्रेम करता है और सबके प्रति समर्पण भाव का आ जाता है, परंतु यह स्थिति सबके लिए संभव नहीं है। फिर भी ऋषियों एवं दूसरों के अनुभव से और शास्त्र प्रमाण से हम सब जीवों में ईश्वर को उपस्थित मान सकते हैं और उसी तरह उनसे प्रेम व्यवहार कर सकते हैं। व्यवहार में भी प्रेम का परिणाम दिखाई पड़ता है। प्रेम ही सत्य है, शाश्वत है। प्रेम से ही सर्वत्र सुख शांति और आनंद संभव है। सभी संतों ने भी प्रेम को सर्वश्रेष्ठ साधना माना है। प्रेम उत्पन्न होते ही हृदय के क्रोध, ईष्र्या, मद, मान, मत्सर आदि नकारात्मक तत्व नष्ट हो जाते हैं। प्रेम में मनुष्य अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देता है। प्रेम में साधक जल बिन मछली के समान व्याकुल रहता है। प्रेमी से दूरी और देरी अहसनीय होती है। वह अपना-पराया भूल जाता है। उसे स्वयं अपना बोध नहीं रहता, जैसे रास नृत्य के लिए गोपिकाएं अधूरे श्रृंगार में कृष्ण के पास आ जाती हैं। शबरी जूठे बेर एकत्र करती है। प्रभु से प्रेम होने पर ज्ञान, विज्ञान, तप, ध्यान आदि फीके पड़ जाते हैं। प्रेम होने पर साधक सभी जीवों, सारी सृष्टि से प्रेम करने लगता है। सबमें केवल वही प्रमास्पद दिखाई पड़ता है। 

Monday, 20 August 2012

धर्म ग्रंथों में अधिक मास

गीता   | वेद-पुराण पढो या सुनो | परिचय  |श्री राम   


हिंदू पंचांग के अनुसार साल 2012 में अधिक मास का योग बन रहा है। ये अधिक मास 18 अगस्त, शनिवार से शुरु होगा। ज्योतिषियों के अनुसार इस बार भादौ का अधिक मास रहेगा। इसके पहले साल 1993 में भादौ का अधिक मास आया था। 18 साल बाद ये संयोग दोबारा बन रहा है। अधिक मास के कारण इस बार चातुर्मास पांच महीनों का रहेगा वहीं गणेश चतुर्थी तथा इसके बाद आने वाले त्योहार एक महीने बाद आएंगे।

धर्म ग्रंथों में अधिक मास को पुरुषोत्तम मास भी कहा गया है, जिसका अर्थ है इस महीने के स्वामी स्वयं भगवान विष्णु हैं। वहीं भादौ मास के स्वामी भी भगवान विष्णु को ही माना जाता है। इस कारण इस बार अधिक मास का महत्व और भी बढ़ गया है। धर्म ग्रंथों के अनुसार देवताओं का शयन काल आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकदाशी तक 4 महीने का होता है। लेकिन इस बार 18 अगस्त से 16 सितंबर तक अधिक मास होने से चातुर्मास 5 माह का होगा। भादौ का अधिक मास होने से इस बार दो भादौ होंगे। ज्योतिषियों के अनुसार 1993 के बाद अब भादौ में अधिक मास के योग बने हैं। इसके बाद 2031 के भादौ में अधिक मास आएगा।

शादियों में होगी देरी

अधिक मास होने से पर्व, त्योहारों की तिथियां आगे बढ़ेंगी। शादी-ब्याह, मांगलिक कार्य देर से शुरु होंगे क्योंकि 24 नवंबर को देव उठने के बाद ही शुभ कार्य प्रारंभ होंगे।

ऐसे लगता है अधिक मास

32 महीने, 16 दिन, 1 घंटा 36 मिनट के अंतराल से हर तीसरे साल अधिक मास आता है। ज्योतिष में चंद्रमास 354 दिन व सौरमास 365 दिन का होता है। इस कारण हर साल 11 दिन का अंतर आता है जो 3 साल में एक माह से कुछ ज्यादा होता है। चंद्र और सौर मास के अंतर को पूरा करने के लिए धर्मशास्त्रों में अधिक मास की व्यवस्था की है।

जानिए अधिक मास में क्या करें, क्या नहीं

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 हमारे धर्म ग्रंथों में अधिक मास से संबंधित कई नियम बताए गए हैं। यह नियम हमारे खान-पान से लेकर व्यवहार को भी प्रभावित करते हैं। महर्षि वाल्मीकि ने अधिक मास के नियमों के संबंध में कहा है कि इस महीने में गेहूं, चावल, सफेद धान, मूंग, जौ, तिल, मटर, बथुआ, शहतूत, सामक, ककड़ी, केला, घी, कटहल, आम, हर्रे, पीपल, जीरा, सौंठ, इमली, सुपारी, आंवला, सेंधा नमक आदि भोजन पदार्थों का सेवन करना चाहिए।

इसके अतिरिक्त मांस, शहद, चावल का मांड, चौलाई, उरद, प्याज, लहसुन, नागरमोथा, छत्री, गाजर, मूली, राई, नशे की चीजें, दाल, तिल का तेल और दूषित अन्न का त्याग करना चाहिए। तांबे के बर्तन में गाय का दूध, चमड़े में रखा हुआ पानी और केवल अपने लिए ही पकाया हुआ अन्न दूषित माना गया है। अतएव इनका भी त्याग करना चाहिए। 

पुरुषोत्तम मास में जमीन पर सोना, पत्तल पर भोजन करना, शाम को एक वक्त खाना, रजस्वला स्त्री से दूर रहना और धर्मभ्रष्ट संस्कारहीन लोगों से संपर्क नहीं रखना चाहिए। किसी प्राणी से द्रोह नहीं करना चाहिए। परस्त्री का भूल करके भी सेवना नहीं करना चाहिए। देवता, वेद, ब्राह्मण, गुरु, गाय, साधु-सन्यांसी, स्त्री और बड़े लोगों की निंदा नहीं करना चाहिए।

Sunday, 19 August 2012

तीन वर्षों में एक बार आने वाला मलमास

गीता   | वेद-पुराण पढो या सुनो | परिचय  |श्री राम   |  अपना भविष्य खुद जाने    
 हिंदू मान्यताओं के मुताबिक वैसे तो मलमास (अधिमास) में कोई शुभ कार्य नहीं होता है, लेकिन बिहार 

के नालंदा जिले के राजगीर में विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा की अनोखी परम्परा है। तीन वर्षों 

में एक बार आने वाला मलमास 18 अगस्त से प्रारम्भ होकर 16 सितंबर 2012 तक चलेगा इस दौरान 

राजगीर 

में विश्व प्रसिद्ध मेला लगता है और देश के साधु-संत यहां पहुंचते हैं। राजगीर पंडा समिति के सदस्य 

रामेश्वर पंडित कहते हैं कि इस एक महीने में राजगीर में काला काग को छोड़कर हिंदुओं के सभी 33 

करोड़ देवता राजगीर में प्रवास करते हैं। प्राचीन मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान 

ब्रह्मा के मानस पुत्र राजा बसु ने राजगीर के ब्रह्मकुंड परिसर में एक यज्ञ का आयोजन कराया था जिसमें 

33 करोड़ देवी-देवताओं को निमंत्रण दिया गया था और वह यहां पधारे भी थे परंतु काला काग (कौआ) 

को निमंत्रण नहीं दिया गया था।

जनश्रुतियों के मुताबिक इस एक माह के दौरान राजगीर में काला कौआ कहीं नहीं दिखता। इस क्रम में 

आए सभी देवी देवताओं को एक ही कुंड में स्नानादि करने में परेशानी हुई थी तभी ब्रह्मा ने यहां 22 कुंड 

और 52 जलधाराओं का निर्माण किया था। इस ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी में कई युगपुरुष, संत और 

महात्माओं ने अपनी तपस्थली और ज्ञानस्थली बनाई है। इस कारण मलमास के दौरान यहां लाखों साधु-

संत पधारते हैं। शनिवार को मलमास के पहले दिन हजारों श्रद्धालुओं ने राजगीर के गर्म कुंड में डुबकी 

लगाई और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की। पंडित जयकुमार पाठक के मुताबिक अधिमास के दौरान 

जो मनुष्य राजगीर में स्नान, दान और भगवान विष्णु की पूजा करता है उसके सभी पाप कट जाते हैं 

और वह स्वर्ग में वास का भागी बनता है। वे कहते हैं कि इस महीने में राजगीर में पिंडदान की परंपरा 

है। किसी भी महीने में मौत होने पर मात्र राजगीर में पिंडदान से ही उनकी मुक्ति मिल जाती है।


अधिमास के विषय में उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म के अनुसार दो प्रकार के वर्ष प्रचलित हैं एक सौर वर्ष 

जो 365 दिन का होता है जबकि एक चंद्र वर्ष होता है जो आम तौर पर 354 दिन का होता है। इन 

दोनों वर्षों के प्रकार में करीब 10 दिन के अंतर होता है। 32 महीने के बाद इन दोनों प्रकार के वर्ष में 

एक चंद्र महीने का अंतर आ जाता है, यही कारण है कि तीन वर्ष के बाद एक वर्ष में एक ही नाम के दो 

चंद्र मास आ जाते हैं जिसे अधिमास या मलमास कहा जाता है। पाठक कहते हैं कि इस वर्ष 18 अगस्त 

से 16 सितंबर तक सूर्य संक्रांति का अभाव है जिस कारण भादो चंद्र मास अधिमास हुआ है।


पाठक के अनुसार इस महीने में विवाह, मुंडन, नववधू प्रवेश सहित सभी शुभ कार्य वर्जित होते हैं परंतु 

विष्णु की पूजा को सर्वोत्तम माना गया है। इधर, राजगीर में मलमास मेले का शुभारंभ प्रसिद्ध संत 

फलाहारी बाबा चिदात्मन जी महाराज के द्वारा धार्मिक अनुष्ठान और ध्वजारोहण के साथ हो गया है। 

उल्लेखनीय है कि राजगीर न केवल हिंदुओं के लिए धार्मिक स्थली है, बल्कि बौद्ध और जैन धर्म के 

श्रद्धालुओं के लिए भी पावन स्थल है।
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अधिक मास का प्रारंभ 18 अगस्त,2012 . शनिवार से हो चुका है। धर्मग्रंथों के अनुसार अधिक मास को भगवान पुरुषोत्तम ने अपना नाम दिया है इसलिए इस मास को पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं। इस मास में भगवान की आराधना करने का विशेष महत्व है।

धर्मग्रंथों के अनुसार इस महीने में सुबह सूर्योदय से पहले उठकर शौच, स्नान, संध्या आदि अपने-अपने अधिकार के अनुसार नित्यकर्म करके भगवान का स्मरण करना चाहिए और पुरुषोत्तम मास के नियम ग्रहण करने चाहिए। पुरुषोत्तम मास में श्रीमद्भागवत का पाठ करना महान पुण्यदायक है। इस मास में तीर्थों, घरों व मंदिरों में जगह-जगह भगवान की कथा होनी चाहिए। भगवान का विशेष रूप से पूजन होना चाहिए और भगवान की कृपा से देश तथा विश्व का मंगल हो एवं गो-ब्राह्मण तथा धर्म की रक्षा हो, इसके लिए व्रत-नियमादि का आचरण करते हुए दान, पुण्य और भगवान का पूजन करना चाहिए। पुरुषोत्तम मास के संबंध में धर्मग्रंथों में वर्णित है -

येनाहमर्चितो भक्त्या मासेस्मिन् पुरुषोत्तमे। 

धनपुत्रसुखं भुकत्वा पश्चाद् गोलोकवासभाक्।।


अर्थात- पुरुषोत्तम मास में नियम से रहकर भगवान की विधिपूर्वक पूजा करने से भगवान अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्तिपूर्वक उन भगवान की पूजा करने वाला यहां सब प्रकार के सुख भोगकर मृत्यु के बाद भगवान के दिव्य गोलोक में निवास करता है।

Saturday, 18 August 2012

भगवान शंकराचार्य


योग सिद्ध भगवान शंकराचार्य

गीता   | वेद-पुराण पढो या सुनो | परिचय  |श्री राम   |  अपना भविष्य खुद जाने   


भगवान शंकराचार्य के पिता श्री शिवगुरु को बहुत दिनों तक कोई संतान नहीं हुई। अत: उन्होंने अपनी पत्नी श्रीमती सुभद्रा जी के साथ भगवान  शंकर की कठोर तपस्या की। उनकी सच्ची आराधना से प्रसन्न होकर आशुतोष भगवान शंकर प्रकट हुए और उन्हें अपने ही समान सर्वगुण सम्पन्न पुत्र होने का वरदान दिया। इस प्रकार वैशाख शुक्ल पञ्चमी को सुभद्रा माता के गर्भ से साक्षात भगवान शंकर का ही श्री शिवगुरु के यहां प्राकट्य हुआ। केरल में कालडी नामक गांव इस महान विभूति के जन्म से प्रकाशित हो उठा।

भगवान शंकर के आशीर्वाद के फलस्वरूप उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शंकर रखा गया। वर्ष की अवस्था में पहुंचते-पहुंचते ही इनके पिता परलोकवासी हो गए। 5 वर्ष की अवस्था में इन्हें पढऩे के लिए गुरुकुल भेजा गया।  भगवान शंकराचार्य की विलक्षण प्रतिभा और महानता का परिचय इनके बचपन से ही मिलने लगा। 7 वर्ष की आयु में ये सम्पूर्ण वेद-शास्त्रों में पारंगत होकर घर वापस आ गए। विद्याध्ययन समाप्त करने के बाद भगवान शंकराचार्य ने संन्यास लेना चाहा किंतु इनकी माता ने अनुमति नहीं दी। एक दिन अपनी माता के साथ नदी में स्नान करने गए। स्नान करते समय इन्हें एक मगर ने पकड़ लिया।

इन्होंने अपनी माता से कहा कि यदि आप मुझे संन्यास लेने की आज्ञा दे देंगी तो मगर छोड़ देगा। विवश होकर माता को संन्यास की अनुमति प्रदान करनी पड़ी। जाते समय माता की मृत्यु के समय उपस्थित रहने का वचन देकर यह संन्यास लेने के लिए चल दिए। भगवान शंकराचार्य ने गोविंद भगवत्पाद से संन्यास की दीक्षा ली और अल्पकाल में ही योगसिद्ध महात्मा हो गए। गुरु ने इन्हें काशी जाकर ब्रह्म सूत्र पर भाष्य लिखने की आज्ञा दी। काशी में भगवान शंकर तथा भगवान व्यास के भी दर्शन हुए और उनकी कृपा से इनकी 16 वर्ष की आयु 32 वर्ष हो गई। भगवान व्यास ने इनको अद्वैतवाद का प्रचार करने की आज्ञा दी।

तदन्तर भगवान शंकराचार्य ने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया और शास्त्रार्थ में विभिन्न मतवादियों को परास्त करके अद्वैतवाद की स्थापना की। यद्यपि इन्होंने अनेक मंदिर बनवाए किंतु चारों धामों में इनके 4 मठ विशेष प्रसिद्ध हैं। आज भी इनके द्वारा स्थापित मठों के प्रधान आचार्य शंकराचार्य के नाम से ही जाने जाते हैं। भगवान शंकराचार्य द्वारा बनाए ग्रंथों में ब्रह्मसूत्र-भाष्य, उपनिषद्-भाष्य, गीता-भाष्य, पञ्चदशी आदि प्रमुख हैं। इस प्रकार 32 वर्ष के अल्पकाल में अपने अभूतपूर्व ज्ञान से संसार को वेदांत का अभिनव प्रकाश प्रदान करके भगवान शंकराचार्य ने सम्पूर्ण मानव जाति का अनुपम कल्याण किया।

श्रीराम

गीता   | वेद-पुराण पढो या सुनो | परिचय  |श्री राम   |  अपना भविष्य खुद जाने  
गुण निधि श्रीराम
आपदामपहरतारं दातारं सर्व सम्पदम्।


लोकाभिरामं श्री रामं भूयो-भूयो नमाम्यहम्।


रामाय, रामभद्राय, राम चंद्राय मानसे।


रघुनाथाय, नाथाय, सीताया: पतये नम:।। 


प्रभु श्रीराम सभी आपत्तियों को हरने वाले तथा सब प्रकार के ऐश्वर्य 

प्रदान करने वाले हैं। वह सब को मनमोहक छवि से आनंद प्रदान 

करने वाले हैं। उनको बार-बार नमस्कार है। ऐसे रामभद्र, रामचंद्र 

सबके स्वामी, रघुनाथ जी, सीतापति जी को नमस्कार है।


ये प्रकट कृपाला, दीन दयाला कौशल्या हितकारी  चैत्र मास शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन कौशल्या माता के गर्भ से प्रभु श्रीराम प्रकट हुए। जब इस धरा पर असुर प्रवृत्ति वालों का बोलबाला बढ़ गया, तब देवताओं की विनती पर प्रभुधरती पर आसुरी शक्तियों के नाश हेतु तथा भक्तों का कल्याण करने हेतु पधारे। उनके आने से संपूर्ण मानव जाति धन्य हो गई।

सनातन मर्यादा के मापदंड  के जो आदर्श उन्होंने स्थापित किए आज भी सम्पूर्ण मानव जाति उनसे प्रेरणा ले रही है इसलिए वह मर्यादा पुरुषोत्तम भी कहलाए। स्वयं सनातन परब्रह्म होते हुए भी उन्होंने साधारण मानव की भांति व्यवहार किया लेकिन जिन्होंने उन्हें परमपिता परमेश्वर के रूप में पहचाना उन्होंने उनकी अविरल एवं शुद्ध हृदयचित से भक्ति कर परमधाम को प्राप्त किया। प्रभु श्रीराम शत्रुओं को भी अभय देने वाले, शरणागत वत्सल हैं।

जब विभीषण जी उनकी शरण में अपने भाई रावण की लंका को त्याग कर आए, तब उनकी निष्ठा पर वानर सेना ने शंका जताई। तब प्रभु श्री राम बोले कि अगर कोई दुराचारी भी मेरी शरण में आता है, मैं तो उसका भी परित्याग नहीं करता। विभीषण तो पूर्णतया निष्पाप हैं। भगवान श्री राम ने बाली से किष्किन्धा तथा रावण से लंका जीतकर इन्हें अपने साम्राज्य में नहीं मिलाया अपितु किष्किन्धा का राज्य सुग्रीव को तथा लंका का राज्य विभीषण को दे दिया तथा वहां आर्य विधान स्थापित किया। प्रभु श्रीराम त्रेतायुग में आए।

आज भी उनकी यशोकीर्ति का गुणगान कर भक्त आनंदित होते हैं। उनके भक्तों में भरत जी, हनुमान जी, लक्ष्मण जी, जटायु, शबरी आदि भक्ति के विलक्षण उदाहरण हैं। प्रभु श्रीराम आदि पुरुष नारायण हैं। उनकी भार्या सीता जी प्रभु संग वैकुंठ से पधारीं। प्रभु श्री राम ने शस्त्र एवं शास्त्रों का ज्ञान महॢष वशिष्ठ, विश्वामित्र जी एवं अगस्तय मुनि जी से प्राप्त किया। भगवान श्रीराम गुणनिधि हैं एवं संपूर्ण ब्रह्मांड के अधिपति हैं, वह मायापति हैं। ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया, रोम -रोम प्रति वेद कहैं। प्रभु श्रीराम की योगमाया के अंश मात्र से अनेकानेक ब्रह्मांडों की रचना हुई है, ऐसा वेद कहते हैं। प्रभु श्रीराम धर्म के साक्षात् विग्रह हैं।

रघुकुल रीति सदा चली आई। प्राण जाई पर वचन न जाई। अपने रघुवंश में चली आई परम्परा का निर्वहन करते हुए प्रभु श्रीराम जी ने चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया तथा अपने पिता दशरथ के द्वारा माता कैकेयी को दिए वचनों की रक्षा की। भगवान श्री राम ने अयोध्या में ग्यारह हजार वर्षों तक राज किया। उनके राज्य में प्रजा अत्यंत सुखी थी। सबके मन निर्मल एवं शुद्ध थे। किसी के प्रति भी किसी के मन में ईष्र्या-द्वेष की भावना नहीं थी। सब लोग कत्र्तव्य पालन करते थे जिस प्रकार सूर्य, पृथ्वी से जल खींचकर, पुन: वर्षा के रूप में जल को पृथ्वी पर बरसा देता है, उसी प्रकार प्रजा से प्राप्त कर को, प्रजा के हित में लगाया जाता था।

इसी कारण आज भी हर राष्ट्र राम राज्य की कामना करता है। भगवान श्री राम जी ने समाज के हर वर्ग, हर जाति, समुदाय के लोगों को गले लगाया। चाहे वह पक्षीराज जटायु हो, चाहे केवट अथवा शबरी। भगवान श्री राम सम्पूर्ण मानव जाति के महानायक हैं। जब तक इस धरती पर जीवन रहेगा, सूर्य का प्रकाश रहेगा, तब तक प्राणी समुदाय भगवान श्री राम द्वारा स्थापित सनातन आर्य मर्यादा के मापदंडों से शिक्षा लेता रहेगा। भगवान श्री राम समस्त जगत के परम आश्रय हैं। वह सनातन धर्म के रक्षक हैं। जीव के अंतिम क्षणों में मुख से राम का नाम निकलना, मुक्ति प्रदाय है एवं मोक्ष प्रदायक है। प्रभु श्रीराम का नाम भव, भय एवं समस्त दुखों को हरने वाला है। 

आपदामपहरतारं दातारं सर्व सम्पदम्।
लोकाभिरामं श्री रामं भूयो-भूयो नमाम्यहम्।
रामाय, रामभद्राय, राम चंद्राय मानसे।
रघुनाथाय, नाथाय, सीताया: पतये नम:।।
प्रभु श्रीराम सभी आपत्तियों को हरने वाले तथा सब प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं। वह सब को मनमोहक छवि से आनंद प्रदान करने वाले हैं। उनको बार-बार नमस्कार है। ऐसे रामभद्र, रामचंद्र सबके स्वामी, रघुनाथ जी, सीतापति जी को नमस्कार है।

Wednesday, 25 July 2012

सूर्य के अवतार नाग देवता

गीता   | वेद-पुराण पढो या सुनो | परिचय  |श्री राम   |  अपना भविष्य खुद जाने 

हिन्दू धर्म में मान्यता है कि पृथ्वी शेष नाग के सिर पर टिकी हुई है तथा श्रावण मास में नाग पंचमी के पर्व का विशेष महत्व है। इस दिन नाग देवता की पूजा करने से नाग देवता की कृपा प्राप्त होती है तथा सभी प्रकार के कष्टों से छुटकारा भी मिलता है। भगवान आशुतोष भोलेनाथ ने नागों को गले में धारण करके इनके महत्व को और भी बढ़ा दिया है।






गरुड़ पुराण में वर्णन आता है कि नाग पंचमी के दिन घर के दोनों बगल में नाग की मूर्ति बनाकर अनंत प्रमुख महानागों का पूजन करना चाहिए। वर्षा ऋतु ही सर्पों के निकलने का समय होता है। महाशिवरात्रि वाले दिन भगवान भोले नाथ अपनी झोली से विषैले जीवों को भूमि पर विचरण हेतु छोड़ देते हैं और जन्माष्टमी वाले दिन पुन: अपनी झोली में समेट लेते हैं। वर्षा ऋतु में नाग बिलों में पानी भर जाने के कारण बाहर आ जाते हैं। इसी कारण प्रत्यक्ष नाग पूजन का समय नागपंचमी वाला दिन विशेष महत्व रखता है।


http://youtu.be/EGHwtIj6voM

नागपंचमी के दिन नागों का दर्शन करना शुभ माना जाता है। मानव सभ्यता में इन्हें शक्ति तथा सूर्य का अवतार माना जाता है। पंचमी तिथि के स्वामी नाग देवता हैं। श्रावण मास में नाग पंचमी होने के कारण धरती खोदने का कार्य नहीं किया जाता। इस माह में भूमि पर हल नहीं चलाना चाहिए। मकान बनाने हेतु नींव भी नहीं खोदनी चाहिए। पुराणों में वर्णन आता है कि समुद्र मंथन में वासुकि नाग को मंदराचल पर्वत के इर्द-गिर्द लपेट कर रस्सी की भांति उपयोग किया गया। भोले नाथ नागों के देवता हैं। उनके सम्पूर्ण शरीर पर नागों का वास माना जाता है।





गले में नागों का हार, कानों में नाग कुंडल, सिर पर नाग मुकुट एवं छाती पर भी नाग ही शोभा बढ़ाते हैं। शिव की स्तुति में शिवाष्टक में भी वर्णन है कि शिव शंकर का पूरा शरीर सांपों के जाल से ढका हुआ है। इसी प्रकार भगवान विष्णु शेष नाग द्वारा बनाई गई शैय्या पर शयन करते हैं। रामायण में विष्णु भगवान के अवतार श्री राम के छोटे भाई लक्ष्मण एवं महाभारत के श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम को शेषनाग का अवतार बताया गया है। नाग सदैव पूजनीय हैं। वे आदि काल से अपने भक्तों एवं मानव जाति पर कृपा करते रहे हैं।





दधीचि ऋषि की अस्थियों से बने अस्त्र से इंद्र के हाथों मारा गया वृत्तासुर भी नागराज ही था। श्री कृष्ण व कालिय नाग की कथा तो हम बचपन से ही सुनते आए हैं। बाबा बालक नाथ जी के साथ भी सर्प रहते थे। भगवान बुद्ध तथा जैन मुनि पाŸरवनाथ के रक्षक नाग देवता माने जाते हैं। कश्मीर के जाने माने संस्कृत कवि कल्हण ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘राजतरंगिणी’ में कश्मीर की सम्पूर्ण भूमि को नागों का स्थान माना है। वहां के प्रसिद्ध नगर अनंतनाग का नामकरण इसका ऐतिहासिक प्रमाण है।




अमरनाथ यात्रा के समय रास्ते में शेष नाग झील में एक विशाल नाग के दुर्लभ दर्शन कई भक्तों को होते हैं। गौरी पूजन प्रसंग में हिन्दू महिलाएं बांझपन दूर करने के लिए नाग पूजा करती हैं। ज्योतिष के अनुसार पंचमी तिथि के स्वामी नाग हैं। अग्रि पुराण में तो स्पष्ट लिखा है कि शेष आदि सर्पराजों का पूजन पंचमी को होना चाहिए। सुगंधित पुष्प तथा दूध नागों को अतिप्रिय हैं। दूध, चावल, जल, फूल, नारियल आदि सकल सामग्री नाग पूजन में प्रयुक्त होती है। केवल कच्चा दूध ही नागों को चढ़ाया जाता है।





कुछ लोग 5 नागों की आकृतियां बनाकर नाग पूजा करते हैं तथा शाम को किसी बगीचे या पेड़ के नीचे घी तथा दूध रखकर प्रार्थना की जाती है कि हे प्रभु जहां हो वहीं रहियो हमारी रक्षा करियो। न आंखो दिखयो, न कानो सुनाइयो। सेवियों का प्रसाद भी नागों को अर्पित किया जाता है। आटे से प्रतीक स्वरूप नाग बनाकर उनका पूजन किया जाता है। ज्योतिष शास्त्रों में राहु व केतु को सर्प माना जाता है। राहु को सर्प का सिर तथा केतु को पूंछ माना जाता है। ज्योतिष गणनाओं के अनुसार जब सौरमंडल के समस्त ग्रह राहु व केतु की परिधि में आ जाते हैं, तब जन्म कुंडली में कालसर्प दोष योग का निर्माण होता है।





इस काल सर्प दोष योग को कृष्टकारी माना जाता है। नागपंचमी के दिन मंदिर जाकर कच्ची लस्सी से उनका अभिषेक करें, घी का दीपक जला धूप जलाकर नागस्तोत्र का जाप करें । नाग देवता प्रसन्न होकर सौभाग्य का आशीर्वाद देते हैं। नाग पंचमी के दिन चांदी के सर्प-सॢपणी के जोड़े के ऊपर नवग्रह पूजन, काल सर्प पूजन व राहु-केतु का पूजन करने से काल सर्प दोष का भय समाप्त हो जाता है। इस दिन किसी सपेरे से नाग खरीदकर उसे खुले जंगल में भी छोडऩे से शांति मिलती है। धन के पहरेदार के रूप में भी नागदेवता को देखा जाता है। नागपंचमी के दिन दूध, कुशा, गंध, फूल, लड्डुओं से निम्र मंत्र पढ़कर स्तुति करें : ‘ओम कुरूकुल्ये हुं फट् स्वाहा।’

नाग पूजन में चंदन की लकड़ी का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। उन्हें चंदन की लकड़ी की सुगंध अति प्रिय है। नाग पूजा से कभी सर्प के काटने का भय नहीं रहता। कुल में कभी किसी की सर्पदंश से मृत्यु नहीं होती। भगवान भोले नाथ की असीम कृपा से घर में सुख, शांति बढ़ती है।


Sunday, 22 July 2012

मनुष्य के शरीर में है आत्मा

गीता   | वेद-पुराण पढो या सुनो | परिचय  |श्री राम   |  अपना भविष्य खुद जाने

मनुष्य के शरीर में है आत्मा
पुष्पे गंध तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।
इक्षौ गुडं तथा देहे पश्याऽऽत्मान विवेकत:।।

व्याख्या : जिस प्रकार फूल में गंध, तिलों में तेल, लकड़ी में आग, दूध में घी, गन्ने में मिठास आदि दिखाई न देने पर भी वे विद्यमान रहते हैं, उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में दिखाई न देने वाली आत्मा निवास करती है। यह रहस्य ऐसा है कि इसे विवेक से ही समझा जा सकता है। अत: मनुष्य को चाहिए कि वह इस रहस्य को समझने का प्रयास करे कि वह शरीर न होकर आत्मा है।

Sunday, 8 July 2012

हाथ से भोजन ग्रहण क्यों करना चाहिए ?


हाथ से भोजन ग्रहण क्यों करना चाहिए ?


हमारे शरीर से सर्वाधिक मात्रा में शक्ति का प्रवाह हमारे पैरों की उँगलियों से होता है, उसके पश्चात हाथों की उंगलियों के पोरों से| हाथ से भोजन ग्रहण करते समय, उँगलियों से निकलने वाली शक्ति भोजन में आवेशित हो जाती है और यह शक्ति भोजन को सुपाच्य बनाने में सहायता करती है|

हाथों मे नो ग्रह विराज मान हैं ,जो हमारे भाग्य की भविष्यवाणी कर ते हैं , अन धन सुख सम्पदा सभी कुछ इन्ही से प्राप्त होजाता है |पर आधुनिकता की आंधी हमें इन के साथ भोजन करने से रोकती है |यह कितना सही है ?जो देने वाला दाता हो उसके साथ बैठ कर खाना खाने में परहेज क्यों ???? 

चम्मच से जब तक हम भोजन लेकर उसे मुख में डालते हैं तब तक वह शक्ति चम्मच से प्रवाहित हो भोजन में नहीं जा पाती| अब आप बताएं कौन सा संस्कार अधिक उपयोगी, सभ्य एवं योग्य है ? ध्याम रहे वैदिक संस्कृति के प्रत्येक कृति उच्च कोटिके शास्त्र अध्यात्मशस्त्र आधारित है और सभ्यता का भी प्रतीक है !