Monday, 20 February 2012

शिव रात्रि

हेश्वर शिव सृष्टि के स्रोत हैं। सभी प्राणियों के आराध्य हैं। वह सर्वेश्वर और देवादिदेव है  । पहनने के लिए वस्त्र की जगह बाघम्बर अथवा मृगशाला, आभूषण के नाम पर विषधर सर्प तथा मुंडमाल शृंगार की जगह मात्र भस्म का लेपन, उन के स्वरूप की पहचान है। वे बैल की सवारी करते हैं। श्मशान वासी हैं। कंठ में धारित विष से नीलकंठ कहलाते हैं। उन के साथ भूत-प्रेत निशाचर और पिशाचों का झुण्ड रहता है। वे महाकाल भैरव के रूप में भी जाने जाते हैं। तांत्रिक कलाओं के साधक उन्हें काल भैरव अथवा महाकाल के रूप में भी पूजते हैं। इन्हें दिगम्बर यानी अम्बर के समान वस्त्र धारण करने वाला भी कहा जाता है।

महाशिवरात्रि का पर्व परमात्मा शिव से मिलन का दिवस कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इसी दिन मां पार्वती ने कठोर व्रत के उपरांत शिव जी को प्राप्त किया था। शिवरात्रि पर शिवार्चन और जागरण का विशेष महत्व है। अत: रात्रि भर जागरण के साथ शिवाभिषेक का विधान है। शिवरात्रि व्रत की कथा में कहा गया है एक बार कैलाश पर्वत पर माता पार्वती ने शिव से प्रश्न किया- भगवान। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चारों के आप ही हेतु हैं। साधना से संतुष्ट होकर मनुष्य को आप ही ये सब प्रदान करते हैं। अत: यह बतलाइए कि किस कर्म, व्रत या तपस्या से आप प्रसन्न होते हैं।

'कर्मणा केन भगवन व्रतेन तपसापि वा। 

धर्मार्थकाममोक्षाणां हेतुस्त्वं परितुष्यति।।'

यह सुन कर भगवान शिव कहने लगे कि फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को जिस अंधकारमय रजनी का उदय होता है, उसमें जो उपवास करता है तथा देवपूजा करता है, उससे मैं प्रसन्न होता हूं तथा स्नान, वस्त्र, धूप, पुष्प आदि के अर्पण से कहीं अधिक प्रसन्नता शिव को समर्पित रात्रि में उपवास से मिलती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चंद्रमा सूर्य के समीप होता है। यह समय जीवन रूपी चंद्रमा का शिव रूपी सूर्य के साथ मिलन का भी होता है। अत: इस चतुर्दशी को शिव पूजा करने से मनुष्य को अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। यही शिवरात्रि का रहस्य है, शिवरात्रि पर चार प्रहर की पूजा का विधान है। चार प्रहर में चार बार पूजा की जाती है। इसमें शिव को पंचामृत से स्नान करवा कर चन्दन पुष्प अक्षत वस्त्रादि से श्रृंगार कर आरती करनी चाहिए। रात्रि भर जागरण तथा पंचाक्षर मंत्र का जाप करना चाहिए। रुद्राभिषेक, रुद्रष्टाध्याई तथा रुद्रपाठ करना चाहिए।

शिवरात्रि को शिवलिंग में प्रवेश करते हैं शिव

ऐसी भी मान्यता है कि इस रात्रि में भगवान सदाशिव सृष्टि के शिवलिंगों में स्वयं प्रवेश करते हैं। एक कथा के अनुसार, एक बार शिव भक्तों में घिर गए। उनसे पीछा छुड़ाने के लिए शिव जी ने भक्तों को वर मांगने को कहा। भक्तों द्वारा मृत्युलोक में उनके दर्शनों के बारे में शिव जी ने कहा- शिवरात्रि की रात्रि मेरा संसार के सभी शिवलिंगों में प्रवेश होगा, जिससे सभी भक्त सहजता से मेरे दर्शन कर सकेंगे। इसकी जानकारी एक म्लेच्छ को हो गई। उसने शिवरात्रि को व्रत रखा, पर जंगल में भटक जाने के कारण पूजन नहीं कर सका। रात हुई तो जंगली जानवरों से बचने के लिए वह एक वृक्ष पर चढ़ गया। जिस वृक्ष पर वह चढ़ा है, वह विल्व का था, तथा वृक्ष के नीचे प्राचीन शिवलिंग भी था। वृक्ष पर चढ़ते समय अनजाने में कुछ विल्व पत्र उस शिवलिंग पर गिर गए। वृक्ष पर बैठा म्लेच्छ मन में सोचने लगा कि आज व्रत तो कर लिया पर पूजन नहीं कर पाया। वह ऐसा बार-बार सोचता रहा। उधर भगवान शिव समझे कि म्लेच्छ मेरा नाम लेकर विल्व पत्र चढ़ा रहा है। अत: प्रसन्न भगवान शिव ने उसे मोक्ष प्रदान कर दिया।

शिव पूजन रात्रि में क्यों ?


पुराणों के अनुसार, भगवान शंकर संहार शक्ति और तमोगुण के अधिष्ठाता हंै। इसलिए तमोमयी रात्रि से उन का स्नेह या लगाव होना स्वाभाविक है। रात्रि, संहार काल का भी प्रतिनिधि है। उसका आगमन होते ही सर्वप्रथम प्रकाश का संहार और फिर निद्रा द्वारा चेतना का संहार होता है, जिससे सम्पूर्ण विश्व संहारनी रात्रि की गोद में अचेतन हो जाता है। यही कारण है भगवान शिव की आराधना केवल इस रात्रि में की जाती है। 

 या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:।। 
  आत्मा के अज्ञान रूप अंधकार से जिनकी बुद्धि आवृत है ऐसे समस्त प्राणियों की रात्रि आत्मनिष्ठा की रात्रि है। क्योंकि ऐसे मनुष्यों का उसमें आत्मविषयक दर्शन आदि व्यवहार नहीं होता। उस आत्मनिष्ठा में संयमी जागता है- भलीभांति सावधान होता है। वहीं आत्मतत्त्व को जानने वाले मुनि की वह रात्रि है, क्योंकि उसका उस विषयनिष्ठा में दर्शन आदि व्यापार नहीं होता।

1 comment:

  1. सुन्दर आलेख...
    शिवरात्री की अनंत शुभकामनाएं...

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