Saturday, 17 March 2012

भक्ति अर्चना


भगवान शिव कल्याण के प्रतीक हैं। शिव मंगल के प्रतीक हैं। भगवान शिव एवं उनका मात्र नाम समस्त अमंगलों का नाश करने वाला है।
प्रत्येक युग में अवतरित ऋषियों-मुनियों ने उनकी महिमा गाकर, दर्शन पाकर गद्गद् होने का सौभाग्य प्राप्त किया। आज उसी शिव भक्ति अर्चना के गुणों एवं उससे होने वाली प्रत्येक मनोकामना की पूॢत के फलस्वरूप ही उसकी सत्यता को अनुभव  करते हुए शिवभक्त शीघ्र प्रसन्न होने वाले शिव की आराधना से अपना जीवन सुखमय, शांतिमय एवं सम्पन्न बनाने के लिए शिवङ्क्षलग की आराधना करते हैं। 
यह शिवङ्क्षलग उसी दिव्य प्रकाश रूप का प्रतीक है जो एक स्तम्भ (ङ्क्षलग) रूप में ब्रह्मा जी एवं विष्णु जी की स्पर्धा का निर्णायक बना।
ब्रह्मा जी जब सृष्टि का निर्माण करने के बाद घूमते हुए भगवान विष्णु के पास पहुंचे तो देखा कि भगवान विष्णु आराम कर रहे हैं। ब्रह्मा जी को यह अपमान लगा ‘संसार का स्वामी कौन?’ इस बात पर दोनों में युद्ध की स्थिति बन गई तो देवताओं ने इसकी जानकारी देवाधिदेव भगवान शंकर को दी। 
भगवान शिव युद्ध रोकने के लिए दोनों के बीच प्रकाशमान ङ्क्षलग के रूप में प्रकट हो गए। दोनों ने उस ङ्क्षलग की पूजा की। यह विराट ङ्क्षलग ब्रह्मा जी की विनती पर बारह ज्योतिॄलगों में विभक्त हुआ। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवङ्क्षलग का पृथ्वी पर प्राकट्य दिवस महाशिवरात्रि कहलाया। 
शिवरात्रि वैसे तो प्रत्येक मास की चतुर्दशी (कृष्ण पक्ष) को होती है परन्तु फाल्गुन (कृष्ण पक्ष) की शिवरात्रि (महाशिवरात्रि) नाम से ही प्रसिद्ध है। 

भगवान शंकर को महाशिवरात्रि की रात्रि अति प्रिय है। महाशिवरात्रि का पर्व एक ऐसा पावन, धाॢमक पर्व है जिसकी प्रतीक्षा प्रत्येक शिव भक्त को रहती है। महाशिवरात्रि की रात्रि बड़ी ही कल्याणकारी है। इस रात्रि में किए जाने वाले जागरण, व्रत, उपवास साधना, भजन, शांत जप, ध्यान को अति फलदायक माना जाता है। शिवरात्रि पर्व पर उपवास करने वाला सौ यज्ञों से अधिक पुण्य का भागी बनता है।
शिवरात्रि व्रत कथा में कहा गया है कि एक बार कैलाश शिखर पर माता पार्वती ने भगवान शंकर से पूछा, ‘‘हे नाथ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इस चतुर्वर्ग के तुम्हीं हेतु हो। साधना से संतुष्ट हो, आप ही इसे मनुष्यों को प्रदान करते हो। अत: यह जानने की इच्छा होती है कि किस कर्म, किस व्रत या किस प्रकार की तपस्या से आप प्रसन्न होते हो।’’

तब भगवान शंकर ने माता पार्वती की जिज्ञासा शांत करते हुए बताया कि फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को आश्रयकर जिस अंधकारमयी रात्रि का उदय होता है उसी को महाशिवरात्रि कहते हैं। उस दिन जो उपवास करता है उससे मैं अत्यधिक प्रसन्न होता हूं। महाशिवरात्रि के चार प्रहरों में चार बार पृथक-पृथक पूजा का विधान भी शास्त्रों में बताया गया है। चंदन, पुष्प, बिल्व पत्र, धूप-दीप, नैवेद्य, सुगंध, पंचामृत (दूध, दही, घी, शक्कर व शहद) पंचानंद आदि द्वारा चारों प्रहर की पूजा करनी चाहिए।
भगवान शिव भोले हैं। वह निराले हैं लेकिन भाव के भूखे हैं। एक लोटा शुद्धजल के अभिषेक से प्रसन्न होते हैं और आकड़े के फूल पसंद करते हैं। बिल्व पत्र चढ़ाने पर वह शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। ऐसा कहते हैं कि अगर शिव भक्त के पास कोई वस्तु न हो तो वह केवल बिल्व पत्र चढ़ाकर ही भगवान शिव की पूजा कर सकता है। इस बार महाशिवरात्रि सोमवार को पड़ रही है। इस बार सोमवार का समावेश होने से सभी ‘दूध’ ही शिव को चढ़ाएं। इसमें पानी न डालें, अगर डालना हो तो गंगाजल डालें। क्यों  की दूध में पानी मिला क्र किसी को देना बुराई की श्रेणी में आता है । 

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