भारतीय संस्कृति के मूल आधार सनातन हिन्दू धर्म के अठारह पुराणों को लगभग 3000 वर्ष पूर्व रचा गया था। इनमें से आदिशक्ति मां जगदम्बा की स्तुति पर आधारित श्री मार्कन्डेय पुराण अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह पुराण अत्यधिक पूजनीय ‘दुर्गा स्तुति’ का मूल आधार है।
इस पुराण के रचयिता श्री मार्कन्डेय ऋषि को मात्र 18 वर्ष का छोटा जीवन प्राप्त हुआ था परन्तु सतत् शिव भक्ति तथा महामृत्युजंय मंत्र के जप से उन्होंने यमराज को भी मात देकर चिरायु प्राप्त कर इस महान ग्रंथ की रचना की।
शिवालिक पर्वत शृंखला से निकलने वाली मार्कन्डेय नदी (वर्तमान हरियाणा प्रांत में) के तट पर सूत जी तथा जैमनी ऋषि से परामर्श कर वैदिक काल में प्रचलित आदिदेवी के कुछ शक्ति स्वरूपों का गहन अध्ययन कर, उसे विधिवत रूप में इस पुराण में संजोने से पहले ऋषि-मुनियों की कई संगोष्ठियां की गईं। बाद में महॢष वेद व्यास पीठ द्वारा इसका अनुमोदन करवाया गया तथा हिन्दू धर्म को ज्ञान की यह मणि प्राप्त हुई।
वास्तव में इसी महापुराण के बाद ही शक्ति पूजा का युग आरंभ हुआ क्योंकि इससे पहले वैदिक युग में मात्र पुरुष प्रधान देव पूजा ही प्रचलित थी। इसी पुराण में सर्वप्रथम ‘सांख्य दर्शन’ पर आधारित प्रकृति के तीन गुणों सतगुण, रजोगुण तथा तमोगुण का अति उत्तम बखान किया गया है। श्री मार्कन्डेय पुराण के अनुसार इस संसार में एक ऐसी महाशक्ति विद्यमान है जो अनंत व असीमित पूर्वसत्ता है तथा पृथ्वी, नक्षत्रों तथा ग्रह गोचरों का भी संचालन करती है। इस महिमा का बखान पुराण के 79 से 92वें तक तेरह अध्यायों में किया गया है। यह आज तक भी शक्ति पूजा तथा देवी आराधना का मूल स्रोत है।
इस पुराण में कुल 709 शक हैं तथा इसी कारण इसे ‘सप्तशती’ सप्त (सात)+ शती (सौ) श£ोकों की उपमा के नाम से भी जाना जाता है। इस पुराण में मां जगदम्बा को समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त एक ऐसी शक्ति के रूप में प्रकट किया गया है जो अपने आप में पूर्ण हैं तथा सभी देवता उन्हें अपनी-अपनी शक्तियां प्रदान करते हैं।
भारत के प्राचीन ग्रंथों कात्यानी तंत्र, रुद्रयामल तंत्र तथा चिदम्बर रहस्य में इस पुराण की उपमा विश्व की एक सर्वोत्तम रचना के रूप में की गई है।
श्री मार्कंडेय पुराण में नारी के रूप में, विश्व में व्याप्त शक्ति का एक पुंज दिखाया गया है जो स्वयं में केंद्रित होकर तमोगुणों के प्रतीक अति शक्तिशाली राक्षसों का भी संहार कर सकती है तथा इसके साथ ही नारी को त्याग, वैभव व दया का स्वरूप दिखाकर, उसके बालिका स्वरूप को भी देवी का दर्जा दे दिया गया है।
श्री मार्कन्डेय पुराण को अन्य ग्रंथों तथा पुराणों में शिरोमणि माना जाता है जिसके साथ आधुनिक भारतीय विशेष हिन्दू समाज के विश्वास तथा श्रद्धा की  डोर बंधी है