Saturday, 17 March 2012

बल, बुद्धि और वीर्य प्रदान करते है हनुमान जी

बल, बुद्धि और वीर्य प्रदान करते है हनुमान जी बल, बुद्धि और वीर्य प्रदान करने वाले, अपने भक्तों की रक्षा करने वाले चारों युगों में व्याप्त श्री हनुमान जी अपने भक्तों की पीड़ा हरने वाले रामायण महामाला के महारत्न हैं। इनका चरित्र एक आदर्श है जिसका चिंतन, मनन, श्रवण करने से लोक-परलोक सुधर जाता है। इनकी उपासना मात्र से ही जीवन सफल हो जाता है।
हनुमान उपासना जीवन में सफलता पाने की कुंजी है। जब व्यक्ति, समाज अथवा देश अपने कत्र्तव्यों में भटक रहा हो, धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता पाखंड का रूप ले चुकी हो, दुष्प्रवृतियां पांव पसार रही हों, ऐसे में हर व्यक्ति के लिए ‘हनुमान चालीसा’  का पाठ वरदान  है। 
भारतीय संस्कृति में मारुतिनंदन आंजनेय जी से अधिक पराक्रमी की कल्पना ही नहीं की जा सकती। श्री हनुमान जी में प्रतिभा के साथ-साथ शांति है, बुद्धि के साथ आज्ञा पालन है, स्मृति के साथ गोपनीयता है और बल के साथ नियंत्रण है। उनमें शारीरिक शांति के साथ ब्रह्मचर्य का निर्वहन है। उनके अवतरण का एकमात्र उद्देश्य रामकाज है। उनमें भगवान शिव का अनुग्रह है, भगवान विष्णु की पालन शक्ति है, ब्रह्मा जी की समता है, रुद्र की संहार शक्ति का सामंजस्य है।
श्री हनुमान जी अखंड शक्ति के स्रोत हैं, वह शरणहीन को शरण देने वाले हैं, दीन जनों के दीनबंधु हैं और दुष्वृत्ति लोगों के लिए काल के भी काल हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने उन्हें ‘अघटित घटन-सुघटन विघटन’ कह कर उनकी  शक्ति का उल्लेख किया है। हनुमान जी का जीवन समॢपत भक्त का जीवन है। व्यक्तिगत सुख-दुख से ऊपर उठे हुए एक निष्काम साधक की उद्दात्त भूमि पर प्रतिष्ठित उनका चरित्र है।
अनेकानेक राम काव्यों में, रामायणों में, पुराणों में उनके चरित्र का चित्रण है। भारतीय आधुनिक भाषाओं के साहित्य में हनुमत-चरित्र का विविध चित्रण मिलता है। भारतीय भक्ति साहित्य, स्रोत साहित्य तथा तंत्र साहित्य में हनुमान जी की भक्ति और उपासना के विविध स्वरूप उपलब्ध होते हैं। तंत्र साहित्य में हनुमान जी को बड़ी श्रद्धा से स्मरण किया गया है। 
श्री हनुमान जी साक्षात परमेश्वर रूप हैं। उनकी रुद्ररूप में की हुई अभिव्यक्ति वेद, उपनिषद, पुराण आदि शास्त्रों में निरुपित है। संत महात्माओं की वाणी और कथानकों में भी श्री हनुमान जी की रुद्र रूप में अभिव्यक्ति स्वीकार की गई है। शिव पुराण की रुद्र संहिता में तो श्री हनुमान जी के परब्रह्म स्वरूप की संपूर्णता की आधारशिला स्थापित की गई है। श्री रुद्र से श्री हनुमान जी की अभिन्नता और एकाकारता का उल्लेख है। याज्ञवल्क्य ने भारद्वाज को बोध प्रदान करते हुए कहा है कि परमात्मा नारायण ही श्री हनुमान हैं।
श्री हनुमान जी को रुद्रों में ग्यारहवां रुद्र माना गया है। वह परम कल्याण, स्वरूप साक्षात शिव हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘हनुमान बाहुक’ में भी इसका समर्थन किया है। वायु पुराण के पूर्वाद्र्ध में भगवान महादेव के श्री हनुमान रूप में अवतार लेने का उल्लेख है। ‘विनय पत्रिका’ के अनेक पदों में गोस्वामी जी ने हनुमान जी को शंकर रूप मानकर ‘देवमणि’ रुद्रावतार महादेव, वामदेव, कालाग्रि आदि नामों से संबोधित किया है।
हनुमान जी को पुराणों में कहीं भगवान शिव के अंश रूप में तो कहीं साक्षात शंकर जी के रूप में वॢणत किया गया है। शिव पुराण की शतरुद्र संहिता के बीसवें अध्याय से इस कथन की पुष्टि होती है। स्कंद पुराण के अनुसार हनुमान जी से बढ़कर जगत में कोई नहीं है। किसी भी दृष्टि से चाहे पराक्रम, उत्साह, मति और प्रताप वर विचार करें अथवा शील माधुर्य और नीति को देखें, चाहे गाम्भीर्य चातुर्य और धैर्य को देखें, इस विशाल ब्रह्मांड में श्री हनुमान जैसा कोई नहीं है।
हनुमान जी के लिए ‘वायुपुत्र’ का जो प्रयोग होता है, उसकी दार्शनिक प्रतीकात्मक भूमिका जानना अनिवार्य है। वायु, गति, पराक्रम, विद्या, भक्ति और प्राण शब्द का पर्याय है वायु के बिना या वायु की वृद्धि से प्राणियों का मरण होता है। साधक और योगी के लिए तो प्राण, वायु का नियमन योग की आधार भूमिका है। पवन सभी का प्राणदाता जनक है। इसी प्राणतत्व की भूमिका पर हनुमान जी पवनपुत्र सहज ही निरुपित हो जाते हैं।

1 comment:

  1. आपने सब सही लीखा है। धन्यवाद शिवम् अस्तु सर्व जगत। पर एक मात्र प्रश्न का समाधान चाहते है आपसे अगर यह ज्ञात हो आप के पास, के मनुष्य शरीर का एक अंग उपांग स्त्रीका हो यां पुरुषका लिंग हो क्या वोही है भगवान शिव जी के ग्यारहवें रुद्र ? महेरबानी करके स्पष्ट करें.... क्योंकि आपने उपर लीखा है वे वीर्य प्रदान करते हैं इसलिए प्रश्न पूछना चाहा।

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