भारतीय संस्कृति के कर्णधार ब्रह्मस्वरूप आनंदकंद श्रीकृष्ण ने सखा-भाव से अपने मित्र अर्जुन को अनुयायी रूप में सरस्वती सरोवर पिहोवा  (कुरुक्षेत्र) के स्थान पर सम्पूर्ण गीता सुनाई थी, अद्भुत संदेश दिए थे और अंतत: अर्जुन का मोहजनित संशय समाप्त कर कर्म (युद्ध) के प्रति उसे प्रेरित किया था।
गीता की प्रस्तुति कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में हुई जो वैदिक युग से पवित्र तीर्थस्थल रहा है। वह प्रवचन भगवान द्वारा मानव जाति के पथ-प्रदर्शन हेतु तब किया गया जब वह इस लोक में स्वयं उपस्थित थे।
स्वयं भगवान श्री कृष्ण द्वारा साक्षात उच्चारित होने के कारण यह पूर्ण रूप से ‘आस्तिक विज्ञान’ है। इस युद्ध को कुरुक्षेत्र में लड़ा जाना था जिसका उल्लेख वेदों में स्वर्ग के निवासियों के लिए भी तीर्थस्थल के रूप में हुआ है।
अर्जुन ने सखा कृष्ण को कहा कि मैं सेनाओं का निरीक्षण करूंगा। अपनी शक्ति का पूर्ण अनुमान लगाऊंगा, आप युद्ध के मैदान में मेरा रथ स्थापित करें ताकि युद्ध की अभिलाषा रखने वालों को, शस्त्रों की इस महान परीक्षा में जिनसे मुझे संघर्ष करना है, उन्हें देख सकूं। अर्जुन यह जानने के लिए अत्यंत उत्सुक थे कि युद्ध भूमि में कौन-कौन से अग्रणी व्यक्ति उपस्थित हैं और वे इस अवांछित युद्ध पर किस हद तक तुले हुए हैं।
अर्जुन के आग्रह पर श्री कृष्ण ने दोनों सेनाओं के मध्य रथ को स्थापित कर दिया।
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत। 1/21
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धु कामानवस्थितान्
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रण समुद्यमे।। 1/22
रथ स्थापित होने पर अर्जुन ने सेनाओं का निरीक्षण किया। इधर धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयत्सव:।
मामका: पांडवाश्चैव किमकुर्वत संजय।।
धृतराष्ट्र अपने पुत्रों की विजय की संभावना के विषय में अत्यधिक संदिग्ध थे।  इस संदेह के कारण उन्होंने अपने सचिव से ऐसा प्रश्र किया। संजय ने धृतराष्ट्र को बताया :
दृष्ट्वा तु पांडवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्य मुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्।।
संजय युद्ध भूमि की स्थिति के विषय में धृतराष्ट्र के प्रश्र के मंतव्य को समझ गया। अत: वह निराश राजा को प्रोत्साहित करना चाह रहा था। उसने उसे विश्वास दिलाया कि उसका पुत्र पवित्र स्थान के प्रभाव में आकर भी किसी प्रकार का समझौता करने नहीं जा रहा है।
दुर्योधन राजनीतिज्ञ होते हुए भी पांडवों की व्यूह रचना को देखकर भयभीत हो गया, उसका कूटनीतिक व्यवहार उसके भय को छिपा न सका। इस प्रकार वह युद्ध के प्रथम दिन से ही भयभीत हो गया, जो एक योद्धा एवं राजनीतिज्ञ के लिए शुभ संकेत नहीं है।
इधर दोनों पक्षों की सेनाओं का निरीक्षण करने के पश्चात अर्जुन विस्मित होकर मोह में फंस गया, कत्र्तव्यविमूढ़ हो गए, हताश हो गए। उन्हें सभी ओर अमंगल ही अमंगल दिखाई पडऩे लगा। हत्प्रभ होकर उन्होंने अपने ही कुटुम्बियों का वध करने में असमर्थता दिखाई। विनष्ट होते हुए परिवार को देखकर , स्त्रियों के  कथित  विधवापन, पथ भ्रष्ट होकर, दूषित होकर, वर्णसंकर, संतान उत्पन्न होने की आशंका जताई। अर्जुन ने धनुष बाण एक ओर रख दिए, शोकग्रस्त होकर रथ के आसन पर बैठ गए, उन्हें मोह हो गया लेकिन भगवान से भगवद्गीता सुनकर समस्त मोहों से मुक्त हो गए। स्मरण शक्ति मिल गई, संशय रहित दृढ़ होकर कर्म करने के लिए तैयार हो गए।  पुन: भगवान के आदेशानुसार युद्ध करने के लिए अपना धनुष बाण ग्रहण कर लिया। उन्हें पूर्ण ज्ञान हो गया। श्रीमद् भगवद् गीता में अर्जुन ने स्वयं कहा :
नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसंदेह: करिष्ये वचनं तव।। 18/73
हे कृष्ण, हे अच्युत! अब मेरा मोह दूर हो गया, आप के अनुग्रह से मुझे मेरी स्मरण शक्ति वापस मिल गई। अब मैं संशय रहित तथा दृढ़ हूं और आप के आदेशानुसार कर्म करने के लिए उद्यत हूं।
श्री कृष्ण द्वारा भगवद् गीता सुनाना एवं अर्जुन का मोह नष्ट होना, स्मरण शक्ति का पुन: प्राप्त होना, कर्म के लिए पुन: जागृत होना गीता को ‘आस्तिक विज्ञान’ की श्रेणी में लाता है।