Saturday, 7 April 2012

पौराणिक मूर्तियों की समृद्ध धरोहर

पौराणिक मूर्तियों की समृद्ध धरोहर



मूर्ति साधक और साध्य के मध्य संपर्क स्थापित करने का विशिष्ट माध्यम है और भारत में मूर्ति कला का इतिहास, श्री वासुदेव शरण अग्रवाल के अनुसार काफी पुराना है। वाल्मीकीय रामायण में उल्लेख है कि श्रीराम ने याज्ञिक अनुष्ठान की संपूर्णता हेतु देवी सीता की स्वर्ण मूर्ति का निर्माण करवाया था। महाभारत काल में एकलव्य द्वारा गुरु द्रोणाचार्य  की मिट्टी की मूर्ति के निर्माण का वृत्तांत भी मिलता है। मंदिर एवं पूजा स्थलों में देवी-देवताओं की स्वर्ण, रजत, कांस्य, पीतल प्रस्तर प्रतिमाओं को प्रतिष्ठित करने का विधान है।
हरियाणा का संबंध शिव (हर) तथा हर (विष्णु) से जोड़ा जाता है। ‘हरस्ययावानि विमानानि गच्छन्ति यस्मिन प्रदेशे स: हरयान: हरयाणा:’— हरियाणा वह क्षेत्र है जहां भगवान शिव के यान-विमान चलते थे। इसी कारण यहां शिव एवं शिव परिवार की मूर्तियों का अधिक संख्या में उपलब्ध होना स्वाभाविक है। त्रिदेवों में विष्णु एवं ब्रह्मा का भी शुमार है। इस प्रदेश में विष्णु-मूर्तियां भी प्रचुर संख्या में पाई जाती हैं। अग्नि ‘देव-पुरोहित है’, आठ दिक्पालों में इसका प्रमुख स्थान है तो सूर्यदेव जीवन-दाता हैं। इनकी भी हरियाणा में दुर्लभ मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। पिंजौर के भीमा देवी मंदिर परिसर में दशमी शती से संबंधित रेत-पत्थर से निर्मित अग्निदेव प्रतिमा में देव को अभंग-मुद्राओं में प्रदर्शित किया गया है। प्रतिमा का कलात्मक सौंदर्य अनुपम है। बेरी, हांसी, पिहोवा आदि से उपलब्ध सूर्य प्रतिमाओं से निष्कर्ष सम्मुख आता है कि क्षेत्र में सूर्यापासना का भी प्रचलन था। हांसी दुर्ग की थेह से प्राप्त 58 प्रतिमाओं में से काले रंग की कसौटी पत्थर से निर्मित चार फुट छह इंच ऊंची सूर्य प्रतिमा विशिष्ट थी। आठवीं-नवमी शती से संबंधित इस विलक्षण मूर्ति के शीर्ष के पृष्ठ भाग के आभामंडल की किनारी पर नवगृह अंकित हैं। बेरी से प्राप्त सूर्य प्रतिमा में देव को कमल के फूलों पर खड़ा प्रदर्शित किया गया है, जबकि पिहोवा वाली प्रतिमा में सूर्यदेव रथ के गद्देदार आसन पर विराजमान हैं। यह अनूठी प्रतिमा दसवीं शती की है।
हरियाणा में शिवालय यत्र-तत्र सर्वत्र स्थापित हैं। गायक गान भी करते हैं :-
सदा भगवती दाहिनी, गौरी पुत्र गणेश!
पांच देव रक्षा करें, ब्रह्मा, विष्णु, महेश॥
खेड़ी गुज्जर गांव (सोनीपत) के सतकुंभा तीर्थस्थल की खुदाई से लाल बलुए पत्थर से निर्मित पांचवीं शती की शिव की एक दुर्लभ प्रतिमा मिली थी।
मूर्ति में शिव के तीन नेत्र हैं- दो नेत्र खुले हैं तीसरा मस्तक के मध्य -केश  ‘जटा-मुकट’ की भांति!  रोहतक से तेरहवीं शती की भूरे रंग की पाषण प्रतिमा में शिव नृत्य मुद्रा में हैं। ऊपरी दायें हाथ में त्रिशूल है तो बाएं में सर्प। नीचे का दायां हाथ ‘अभय मुद्रा में है तो बायां हाथ दायीं टांग तक विस्तृत! अन्य शिव प्रतिमाओं की भांति इस प्रतिमा में पांवों के नीचे कोई दैत्य नहीं। अंबाला से उपलब्ध ग्यारहवीं शती की विचित्र प्रतिमा में शिव प्रतिमा के तीन मुख हैं- दो मुख ब्रह्मा तथा विष्णु के कहे जाते हैं, तो मत यह भी है कि तीनों मुख भगवान शिव के हैं- सत्यं, शिवम्, सुंदरम् के प्रतीक।  बेरी से ‘हरि-हर’ समन्वित दसवीं शती की पाषण प्रतिमा भी अद्भुत है। बेरी से ही दसवीं शती की नन्दी-आरूढ़ शिव प्रतिमा भी मिली है।
शिव परिवार की प्रतिमाएं भी प्रचुर संख्या में मिली हैं, जिनमें पिहोवा से बादामी रंग के रेत-पत्थर से निर्मित गणेश जी की उपलब्ध प्रतिमा भव्य है। सिरसा से उपलब्ध गणेश जी की अद्भुत पाषाण प्रतिमा में गणेश जी को शक्ति के साथ पदकनुमा गोल चक्र में प्रदर्शित किया गया है। गुज्जर खेड़ी (रोहतक) से मिली बादामी रंग के रेत-पत्थर से निर्मित कार्तिकेय प्रतिमा में देव के  छह सिर प्रदर्शित हैं। खोखरा कोट (रोहतक) से मिली भव्य कार्तिकेय मूर्ति में देव को ‘अर्धपर्यकासन मुद्रा’   में दिखाया गया है।
हरियाणा में विष्णु मूर्तियां भी प्रचुर संख्या में मिली हैं। उल्लेखनीय है : कोसली से प्राप्त 12वीं शती की भूरे-काले रंग के रेत-पत्थर से निर्मित विष्णु मूर्ति (मूर्ति के चारों ओर दशावतार हैं। पुरखास (सोनीपत) से प्राप्त विष्णु ब्रह्मा संयुक्त प्रतिमा, पिंजौर से प्राप्त विष्णु के तीसरे अवतार ‘वराह’ की दसवीं-ग्यारहवीं शती की प्रतिमा, यहीं से प्राप्त अनूठी लक्ष्मी-विष्णु मूर्ति, हांसी से उपलब्ध ‘नृसिंहावतार’ की सातवीं शती की पाषाण प्रतिमा, बेरी (रोहतक) से प्राप्त दशमी शती की विष्णु शिव प्रतिमा, सिरसा से प्राप्त दशमी शती की बफ रेत-पत्थर से निर्मित विष्णु मूर्ति। इसमें योग-नारायण ‘पदमासन मुद्रा’ में हैं। पिहोवा के प्राचीन शिव मंदिर   से ब्रह्मा जी की कलात्मक प्रतिमा भी चर्चित है।
रानीला गांव (भिवानी) से जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ तथा चक्रकेशवरा देवी की अलौकिक प्रतिमाएं मिली हैं। श्री आदिनाथ की प्रतिमा की ऊंचाई ग्यारह इंच तथा चौड़ाई नौ इंच है। प्रतिमा के चारों ओर छोटी मूर्तियां हैं। अस्थल बोहर मठ में बौद्ध, जैन, हिन्दू धर्म से संबंधित सातवीं शती की अनेकानेक प्रतिमाएं हैं, जिनका शिल्प अनूठा आंका गया है।
पिंजौर में बिखरे हुए भग्नावशेषों की खुदाई से अनेकानेक मूर्तियां मिली हैं तो सांस्कृतिक महत्व की वस्तुएं भी। इनमें गणपति महाराज की आधी दर्जन प्रतिमाएं त्रिभंग मुद्रा में खड़े विष्णु की चतुर्भुजी प्रतिमा, उमा-महेश्वर प्रतिमा, वरुण देवी प्रतिमा, जैन प्रतिमाएं उल्लेखनीय हैं। इन मूर्तियों के निर्माण में क्षेत्र में उपलब्ध रेत-प्रस्तर  का प्रयोग हुआ और इनका समय आठवीं से ग्यारहवीं शती रहा होगा। मध्य युग में पिंजौर निश्चित ही कला जगत में प्रचलित विभिन्न शैलियों का संगम स्थल था।

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