Sunday, 8 April 2012

ऐतिहासिक पर्व वैशाखी



हमारे अनेक पर्व, दिवस व त्योहार जहां जलवायु व ऋतुओं की अनुकूलता से जुडें हैं, वहीं इनका संबंध कृषि, कृषक धर्म व इतिहास से भी जुड़ा होता है। ऐसा ही एक बहुपक्षीय मान्यताओं  वाला पर्व है  ‘वैशाखी’।
वैशाखी पर्व की महत्ता कृषक से बेहतर और कौन जान सकता है। विशेषत: उत्तर व पश्चिम-मध्य भारत के किसान को वैशाखी पर्व का विशेष इंतजा र होता है क्योंकि चैत्र माह में उसकी फसल पककर तैयार हो जाती है। कुछ यों:-
चैत्र-बैसाख सुनहरी रंग, गेहूं पककर हुई तैयार,
नई फसल के संग्रह हेतु उत्सुक कृषक-परिवार।
खेतों में लहलहाती फसल को देखकर किसान की पत्नी अपने पति से कुछ झूठ-मूठ के नखरे करती है। अपनी कुछ मांगें मनवाने के लिए। वह कहती है:-
‘तेरी कणक दी राखी (रखवाली) मुंडेया
हुण मैं नईं ओ बांदी।
जट्टï किसान पति से कहती है कि मैंअब तेरी गेहूं (कणक) की रखवाली नहीं करूंगी।
इस पर किसान पति कुछ यों कहता है:-
जे मैं हल पंजाली पावां ,
दस (बता) क्यों नहीं बांदी।
अर्थात् जब मैं हल उठा सकता हूं तो तू क्यों  रखवाली हेतु खेत में नहीं बैठती।
वैशाखी संक्रांति को धर्म की महत्ता से संदर्भ मे यदि देखा जाए तो इस पर्व पर पर पवित्र सरोवरों व नदियों में स्नान व दान का महत्व है। पंजाब में जहां इस पर्व पर मेले लगते हैं, वहीं सरोवरों व पवित्र  नदियों  में स्नान की महत्ता न्यारी है। हरिद्वार,कुरुक्षेत्र व प्रयाग (इलाहाबाद) में  लाखों श्रद्धालु पवित्र नदियों व सरोवरों में स्नान करते हैं,  दान करते हैं। वैशाखी पर्व का एक बहुत पवित्र इतिहास जुड़ा है सिख धर्म से। सिख धर्म में दस गुरु साहिबान  हुए हैं। सिख धर्म की स्थापना  गुरु नानक देव जी ने की थी तथा दशम् गुरु  गुरु गोबिंद सिंह जी ने पराक्रम, वीरता, त्याग व समानता  के आदर्शों  को अपनाया। उन्होंने सिख धर्म के इतिहास में एक नवीन अध्याय जोड़ा। और यह गौरवमयी अध्याय  है ‘खालसा पंथ की स्थापना।’ खालसा सृजन का पुनीत कार्य उन्होंने वैशाखी पर्व पर ही किया था। परंपरा थी कि वैैशाखी वाले दिन सिख साध-संगत व अन्य धर्मों  के लोग श्री आनंदपुर साहिब में गुरु साहिबानों  के दर्शनार्थ एकत्रित होते थे। संवत् 1756 अर्थात् सन् 1699 ईस्वी में भी वैशाखी वाले दिन संगत  गुरु गोबिंद सिंह जी के दर्शनों  तथा विशेष बुलावे पर भारी संख्यां में एकत्रित हुई थी। गुरु जी ने धर्म, समाज व राष्ट्र  की रक्षा हेतु एक शीश का आह्वान किया। लाखों की भीड़ में सन्नाटा पसर गया। तभी भीड़ में से  दयाराम नामक एक व्यक्ति गुरु जी की सेवा में उपस्थित हुए। गुरु गोबिंद सिंह जी प्रसन्न होकर उसे भीतर शिविर में ले गये। बाहर लौटे तो उनके  हाथों में रक्त से सनी तलवार थी। पुन: एक और शीश की मांग की गई। इस बार धर्मराय आगे आये। इसी प्रकार धर्मराय भी शिविर में ले जाए गए। इस प्रकार यह क्रम पांच बार दोहराया गया। सभा में कौतुहल था।
कुछ समय उपरांत उपरांत गुरु जी उन पांचों व्यक्तियों के साथ बाहर आए। पांचों नई वेशभूषा में थे। गुरु जी ने गर्व से घोषणा की कि ये पांच प्यारे हैं तथा ये सिंह (शेर) के समान हैं। आज से सिंह  की तरह ये पंज प्यारे  धर्म, राष्ट्र व समाज की रक्षा हेतु सदैव तत्पर रहेंगे। इस प्रकार वैशाखी पर्व पर स्थापना हुई   ‘खालसा’ की । केश, कंघा, कड़ा, कछहरा व कृपाण धारण करना आवश्यक किया गया। पंज प्यारे को गुरु जी ने अमृत चखाया।
इतिहास की दृष्टिï से भी वैशाखी वाला दिन बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह पर्व हमें याद दिलाता है जलियांवाला बाग नरसंहार के शिकार हुए शहीदों की।

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