Friday, 6 April 2012

धर्मनगरी हरिद्वार


धर्मनगरी हरिद्वार स्थित नील पर्वत के शिखर पर स्थित मां चंडी देवी सिद्धपीठ की महिमा ही निराली  है। देवी भागवत् में वर्णित नीलाम्बा देवी ही जगत में चंडी देवी  के नाम से जानी जाती है। शत्रुओं का विनाश व शुभ फलदायी मां चंडी देवी का गुणगान सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह जी द्वारा इस प्रकार किया गया है— ‘चण्डि दियो विहार, शोण पानी काली कियो, क्षण महं डारययो मार शोणबिन्दु दानव महा।’ स्वयं देवीभागवत में मां भगवती के कथनानुसार उपासक उन्हें जिस-जिस नाम से स्मरण करेंगे, वह उसी रूप में उसी जगह पर उपस्थित होकर उनका कष्टï निवारण करेंगी।
हरिद्वार स्थित नील पर्वत पर  मां चंडी देवी का प्राचीन सिद्धपीठ वर्तमान में उपासकों हेतु अटूट श्रद्धा व विश्वास का केन्द्र है। ललतारौ पुल से तीन कि.मी. की दूरी पर स्थित पूर्व में मां चंडी देवी सिद्धपीठ जाने के लिये घने जंगल व रज्जूमार्ग से दूरी तय करनी पड़ती है लेकिन अब उडऩखटोलों ने इस मागर को बेहद सुगम कर दिया है। यही कारण है कि यहां  श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। इस सिद्धपीठ का निर्माण वर्ष 1886 ई. में राजा सुचेत सिंह द्वारा कराया गया। यह भी प्रचलित है कि बुंदेलखंड के स्वर्णिम इतिहास के नायकगण आल्हा उदल ने भी समय-समय पर इस पवित्र जगह पर मां चंडी देवी से शक्तिप्राप्ति हेतु अर्चना की थी। मंदिर में प्रवेश द्वार पर ही सुरक्षार्थ लोहे का जाल लगाया गया है जो सम्भवत: जंगल जानवरों आदि से बचाव हेतु  है। सिद्धपीठ के आंतरिक भाग में मां चंडी देवी की मनोहारी प्रतिमा के साथ ही अन्य देवी-देवताओं के विग्रह हैं जिनके दर्शन मात्र से ही उपासक के महापातक तक कट जाते हैं। पूर्व में बियाबान जंगल होने के कारण मां चंडी के दिन मेें ही दर्शन सुलभ थे, लेकिन अब स्थिति में सुधार आया है तथा सुदूर क्षेत्रों से भक्तजनों की टोलियां सहजता से दृष्टिïगोचर हो जाती हैं।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि मां भगवती का यंत्र त्रिकोणात्मक है जिसका मूर्त रूप हरिद्वार में स्पष्टï दृष्टिïगोचर होता है। जहां त्रिकोण के एक कोने में चंडीदेवी का पवित्र सिद्धपीठ हरिद्वार की शान है वहीं दूसरी तरफ अन्य दो कोनों पर मां मनसा देवी व मायादेवी के पृथक-पृथक सिïद्धपीठ इस यंत्र की आकृति को साकार करते हैं। पुराण में वर्णित है कि मां चंडी देवी दानव, दैत्य, राक्षस, भूत-प्रेत के अलावा ग्रह-बाधाओं को दूर करने वाली जगतजननी है। मां चंडीदेवी की कृपा से उपासक सदैव भयमुक्त रहता है। नवरात्र व चैत्रमास  मेले के पुनीत अवसरों पर मां चंडी देवी सिद्धपीठ की छटा देखते ही बनती है। दुल्हन की भांति सुशोभित सिद्धपीठ में असंख्य उपासक प्रतिदिन आकर पूजा-अर्चना व दर्शनलाभ प्राप्त कर धन्य होते हैं।

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