Thursday, 19 April 2012

हमे ज्ञान ही कितना है ?

विश्व गुरु या फिर गुरु 
या गुरु ब्रह्मा विष्णु महेश 
हमे ज्ञान ही कितना है ?
जीवन में हम कुछ चीजें पसंद करते है और कुछ नहीं| पसंदगी और नापसंदगी केवल तभी उठती हैं, जब हम इन चीजों के बारे में कुछ जानते हैं| यदि हम नहीं जानते, तो रूचि-अरुचि हो ही नहीं सकती|

मोह, राग और इच्छाएं उन्हीं के लिए उठती है, जिन्हें हम जानते हैं| अरुचि और घृणा भी उन्हीं के लिए उठती हैं, जिन्हें हम जानते हैं|इस विश्व के बारे में हम कितना जानते हैं? इस सृष्टि के आकार की तुलना में हमारा ज्ञान सरसों के बीज के आकार से भी कम है| फिर भी हम केवल कुछ चीज़ों को पसंद करते हैं और उन्हीं में फंसे रहते हैं| तो, अब हम उन चीज़ों के बारे मैं बात करते हैं, जिनके बारे में हम नहीं जानते, जो अज्ञात हैं| 
१  हम कितनी बार जन्म ले चुके हैं ?  भूत काल 
२  हमारे और कितने जन्म होने वाले हैं ? भविष्य   काल 
३  ब्रह्माण्ड में पृथ्वी के समान कितने ग्रह हैं? वर्तमान काल 
४  हमारे द्वारा ली गयी प्रत्येक श्वास में कितने परमाणु होते हैं?
 इन सभी का एक ही जवाब है पता नही  , अगर यही जवाब है तो ,सवाल भी यही होगा हम किस भरोसे से विश्वगुरु या खुद को गुरु मानने या मनवाने की चेष्टा करते है ।
क्या तुम देख रहे हो कि हम अज्ञानता में कितने प्रसन्न हैं? अंग्रेज़ी में एक कहावत है, जिसका अर्थ है – अज्ञानता वरदान है|
हम एक पृथ्वी को जानते हैं। कहते हैं कि, इस तरह की १४ पृथ्वी हैं। पर, हम उनके बारे में कुछ नहीं जानते| प्रेम, जिसे हम नहीं जानते, श्रद्धा या विश्वास कहलाता है| क्या हम ईश्वर को जानते हैं? क्या बच्चा माँ को जानने की कोशिश करता है? वह बस उसे प्यार करता है और उसमें विश्वास रखता है। क्या वह इसकी जांच करता है कि वह किस स्कूल में गयी या कौन सी डिग्री पायी| बच्चा तो तीन-चार साल तक अपनी माँ का नाम भी नहीं जानता! तुम इस सृष्टि के बच्चे हो| तुम इसके बारे में कुछ भी नहीं जानते। फिर भी तुम विश्वास कर सकते हो| की तुम्हें गुरु मान लिया जाए या तुमहारे ज़ेसों के रहते भारत विश्व गुरु बनने वाला है ?
विश्वात्मा - विश्व संसार है, आत्मा चेतना है| विश्वात्मा शाश्वत सत्य है| क्या तुम अपने जीवन के बारे में जानते हो? तुम तो यह भी नहीं जानते कि तुम कौन हो? तुम अपनी नींद या स्वप्नों के बारे में नहीं जानते। स्वप्न क्यों आते हैं, हम नहीं जानते|
अहंकार तब आता है जब तुम सोचते हो कि तुम कुछ जानते हो| तुम अहंकार से मुक्त हो सकते हो, जब तुम्हारा मन शांत होता है और तुम सोचते हो कि तुम कुछ नहीं जानते| जब तुम मंदिर जाते हो, तुम नहीं जानते कि पुजारी क्या कर रहा है या कौन सा मंत्र पढ़ रहा है, पर तुम्हें विश्वास होता है कि कुछ भला ही होगा| गांवों के लोगों में बहुत विश्वास होता है| तुम डॉक्टर से दवा लेते हो, पर तुम नहीं जानते कि यह कैसे काम करती है|
यदि तुम जानने का प्रयास करो कि तुम्हारा भोजन कैसे पचता है तो तुम आश्चर्य-चकित हो जाओगे| भोजन को सिर्फ पचाने के लिए कितना काम आवश्यक होता है! इसे मुख में रखकर चबाना, इसमें लार मिश्रित करना, निगलना। फिर भोजन का पेट के सभी रास्तों से होकर गुजरना, जठराग्नि और पाक-रसों का इस पर कार्य करना, फिर समान्गीकरण के लिए बड़ी आंत में घूमना, आदि-आदि|
कितना कुछ होता है! हम भोजन को मुंह में रखना जानते हैं| इसके बाद हम नहीं जानते कि क्या होता है|

जो हम जानते हैं, उसका महत्व है। पर, जो हम नहीं जानते, उसका और अधिक महत्व है|
इस पूरी सृष्टि के बारे में हर चीज़ जानना संभव नहीं है| पुराणों में एक कथा है| ब्रह्मा और विष्णु ने शिव के बारे में जानना चाहा| शिव आदि या अंत से परे, अनंत हैं| तो ब्रह्मा, शिव के सिर, और विष्णु उनके पैरों की खोज के लिए चल पड़े| वे युगों तक चलते रहे, पर आदि-अंत में से किसी का पता नहीं लगा सके| उन्होंने वापस लौटने का निर्णय लिया| अपने लौटने के मार्ग पर ब्रह्मा ने एक केतकी का फूल गिरते हुए देखा और उससे पूछा कि वह कहाँ से आ रहा है| फूल ने उत्तर दिया कि वह शिव के सिर का श्रृंगार था| फूल के वचनों को सच मानते हुए ब्रह्मा ने सोच लिया कि उन्होंने शिव के सिर को देख लिया, और यही विष्णु को बता दिया| विष्णु ने कहा कि वह शिव के पैरों को नहीं पा सके|

इस ब्रह्माण्ड का विस्तार अनंत है| इस अनंत ब्रह्माण्ड में व्याप्त चेतना भी अनंत और अज्ञेय है| यह केवल प्रेम करने योग्य है| ईश्वर को जानने की चेष्टा न करो| ईश्वर, जो अज्ञेय है - उससे बस प्रेम करो| यही श्रद्धा है|

जब तुम ध्यान करते हो और अन्य लोगों के इतने अच्छे अनुभवों के बारे में सुनते हो, तो तुम सोचने लगते हो, ‘मेरी क्या स्थिति है?’ इसमें मत फंसो|

जानो कि ईश्वर अज्ञेय है| ध्यान में यह जान कर बैठो, ‘मैं कुछ नहीं जानता|’ ध्यान का यह मूल है – ‘मैं कुछ नहीं जानता|’

ज्ञान का गलत प्रयोग मत करो| यदि कोई तुमसे पूछता है कि, ‘तुम कहाँ से आ रहे हो?’ या, ‘कहाँ जा रहे हो?’ या, ‘क्या समय है?’ तो यह मत कहो कि, ‘मैं नहीं जानता|’ यह ठीक नहीं है| जब तुम ध्यान में बैठो, तब इसका उपयोग करो|

यदि हम रूचि या अरुचि में फंस जाते हैं, तो जीवन सीमित हो जाता है| सीमित होने में आनंद नहीं है|

‘नाल्पे सुकमस्ती।’ तुच्छ चीज़ों में आनंद नहीं|’ ‘योवाई भूमा सुकम।’ विस्तार में,विशालता में आनंद है|

जब तुम आनंद में होते हो, तुम्हारी चेतना का विस्तार होता है और जब तुम पीड़ा या दुःख में होते हो, तुम्हारी चेतना संकुचित होती है।
 निर्विचार होने की स्थिति, स्व की अनुभूति का मूल है| श्रृद्धा या विश्वास अंधा नहीं होना चाहिए| इसीलिये हम साधना करते हैं| विश्लेषण और तार्किक विचार दिन-प्रतिदिन के कार्य-कलापों के लिए आवश्यक होते हैं| परतु वे ध्यान के लिए कच्चा-माल नहीं है|

नाद और वेद दोनों आवश्यक हैं| वेद प्राचीन ज्ञान है| नाद संगीत है, जो अनुभव को बढ़ाता है| श्रृद्धा दोनों को बढ़ाती है| यह मौन चेतना का क्षितिज है|

साधारणतः जब कुछ नहीं जानते या नहीं जान पाते हैं, तो हम चिढ़ते या क्रोधित हो जाते हैं| परन्तु यह ‘न जानना’, बहुत सुंदर है। जब यह ‘न जानना’ आ जाता है, तो मन स्थिर और शांत हो जाता है। यह ध्यान का क्षितिज है, और मौन इसका मार्ग है|



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