Thursday, 19 April 2012

तुम हो कोंन जरा खुद को पहिचानो


तुम हो कोंन जरा खुद को पहिचानो 
एक शेरनी जिसका प्रसव काल निकट था। एक बार अपने शिकार की खोज में बाहर निकली। उसने दूर भेड़ों के एक झुंड को चरते देख, उन पर आक्रमण करने के लिए ज्यों ही छलांग मारी, त्यों ही उसके प्राणपखेरू उड़ गए और एक मातृहीन सिंह शावक ने जन्म लिया।
भेड़ें उस सिंह-शावक की देखभाल करने लगीं और वह भेड़ों के बच्चों के साथ-साथ बड़ा होने लगा, भेड़ों की भांति घास-पात खाकर रहने लगा और भेड़ों की ही भांति, ‘मैं-मैं’ करने लगा। और यद्यपि वह कुछ समय बाद एक शक्तिशाली, पूर्ण विकसित सिंह हो गया, फिर भी वह अपने को भेड़ ही समझता था। इसी प्रकार दिन बीतते गए कि एक दिन एक बड़ा भारी सिंह शिकार के लिए उधर आ निकला।
पर उसे यह देख बड़ा आश्चर्य हुआ कि भेड़ों के बीच एक सिंह भी है और वह भेड़ों की भांति डर कर भागा जा रहा है। तब सिंह उसकी ओर यह समझाने के लिए बढ़ा कि तू सिंह है, भेड़ नहीं। पर ज्यों ही वह आगे बढ़ा, त्यों ही भेड़ों का झुंड और भी भागा और उसके साथ-साथ वह ‘भेड़-सिंह’ भी। जो हो, उसने उस भेड़-सिंह को उसके अपने यथार्थ स्वरूप को समझा देने का संकल्प नहीं छोड़ा। वह देखने लगा कि वह भेड़-सिंह कहां रहता है, क्या करता है। एक दिन उसने देखा कि वह एक जगह पड़ा सो रहा है।

देखते ही वह छलांग मार कर उसके पास जा पहुंचा और बोला, ‘‘अरे, तू भेड़ों के साथ रह कर अपना स्वभाव कैसे भूल गया? तू भेड़ नहीं है, तू तो सिंह है।’’ भेड़-सिंह बोल उठा, ‘‘ क्या कह रहे हो? मैं तो भेड़ हूं, सिंह कैसे हो सकता हूं।’’ उसे किसी प्रकार विश्वास नहीं हुआ कि वह सिंह है, और वह भेड़ों की भांति मिमियाने लगा।

तब सिंह उसे उठा कर एक सरोवर के किनारे ले गया और बोला, ‘‘यह देख, अपना प्रतिबिम्ब, और यह देख मेरा प्रतिबिम्ब।’’ और तब वह उन दोनों परछाइयों की तुलना करने लगा। वह एक बार सिंह की ओर, और एक बार अपने प्रतिबिम्ब की ओर ध्यान से देखने लगा। तब क्षण भर में ही वह जान गया कि ‘‘सचमुच, मैं तो सिंह ही हूं।’’ तब वह सिंह गर्जना करने लगा और उसका भेड़ों का सा मिमियाना न जाने कहां चला गया।

इसी प्रकार तुम सब सिंह हो-तुम आत्मा हो, शुद्ध अनन्त और पूर्ण हो। विश्व की महाशक्ति तुम्हारे भीतर है। ‘‘हे सखे, तुम क्यों रोते हो? जन्म-मरण तुम्हारा भी नहीं है और मेरा भी नहीं। क्यों रोते हो? तुम्हें रोग-शोक कुछ भी नहीं है, तुम तो अनन्त आकाश के समान हो, उस पर नाना प्रकार के मेघ आते हैं और कुछ देर खेल कर न जाने कहां अंतॢहत हो जाते हैं, पर वह आकाश जैसा पहले नीला था, वैसा ही नीला रह जाता है।’’ इसी प्रकार के ज्ञान का अभ्यास करना होगा।
जगत की अनंत शक्ति तुम्हारे भीतर है। जो कुसंस्कार तुम्हारे मन को ढंके हुए हैं, उन्हें भगा दो। साहसी बनो। सत्य को जानो और उसे जीवन में परिणत करो। चरम लक्ष्य भले ही बहुत दूर हो, पर उठो, जागो, तब तक ध्येय तक न पहुंचो, तब तक मत रुको

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