Friday, 6 April 2012

प्राणियों की रक्षा करते हैं भगवान

प्राणियों की रक्षा करते हैं भगवान
एक बार श्रीकृष्ण दोपहर को घर देर से आये। रुक्मिणी ने पूछा ‘ आज इतनी देर से क्यों आए?’ श्रीकृष्ण कहने लगे ‘तुम्हें पता है न, मुझे सभी जीवों के भोजन का प्रबंध करना होता है। आज इस सिलसिले  में कहीं दूर जाना पड़ गया था।
रुक्मिणी को विश्वास नहीं हुआ। हालांकि वह जानती थी कि  श्रीकृष्ण भगवान हैं और विष्णु का अवतार हैं। विश्व में श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित हुए हैं। परन्तु मायापति की माया के कारण ही वह उन्हें श्री विष्णु भगवान का अवतार मानकर भी अपना पति मान रही थी। स्त्री का स्वभाव शंकालु होता है। इसलिए रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण पर प्रश्नों की बौछार कर दी और कहने लगी ‘बस आप ही सबको भोजन देते हो। इसका क्या प्रमाण है?
श्रीकृष्ण ने कहा ‘यदि ऐसी शंका है तो आजमा कर देख लो।’
दूसरे दिन रुक्मिणी ने अपने शृंगार की डिबिया में एक कीड़े को बंद कर दिया ,यह सोचकर  कि देखूं श्रीकृष्ण इस कीड़े को कैसे भोजन देते हैं। दूसरे दिन जब श्रीकृष्ण दोपहर को घर आये तो रुक्मिणी ने उन्हें ताना देते हुए कहा ‘ क्यों सभी के लिए भोजन की व्यवस्था करके आ रहे हैं?  हां, श्रीकृष्ण ने कहा!
क्या इस डिबिया में पड़े  कीड़े को भी आपने  भोजन  दे दिया? रुक्मिणी ने शंका व्यक्त की। श्रीकृष्ण  जी बड़े आश्वस्त होकर हंस पड़े और कहने लगे ‘तुम स्वयं ही देख लो। हाथ  कंगन को आरसी क्या? रुक्मिणी ने अपने शृंगार की डिबिया खोली। देखकर आश्चर्यचकित रह गयी कि जिस कीड़े को उसने जमीन से उठाकर डिबिया में बंद कर दिया था, उसके मुंह में चावल का दाना था जिसे वह बड़े चाव से खा रहा था। रुक्मिणी हैरान हो गयी। श्रीकृष्ण रुक्मिणी को आश्चर्यचकित देखकर मंद-मंद मुस्कराने लगे और  बोले, क्यों रुक्मिणी देख लिया न कि मुझे सभी जीवों के भोजन का प्रबंध करना पड़ता है। क्या अब भी कुछ शंका बची है? यह सुनते रुक्मिणी भगवान श्रीकृष्ण के पांवों में गिर पड़ी और बोली, ‘धन्य हैं प्रभु आप और धन्य हैं आपकी लीला। सचमुच प्रभु आपको विश्व के प्रत्येक  प्राणी की चिंता है, मैंने स्वयं इन आंखों से देख लिया।

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