Friday, 6 April 2012

जबलपुर का चौंसठ योगिनी मंदिर

जबलपुर का चौंसठ योगिनी मंदिर


खुशवीर मोठसरा
भारत भूमि ऋषि, मुनियों, तपस्वियों की जन्मस्थली एवं कर्मस्थली रही है। यहां पर बहुत बड़े-बड़े ऋषियों-मुनियों ने अपने तप-बल से दुनिया को चकित किया है। भारत आज भी उन महान ऋषि-मुनियों द्वारा स्थापित परंपराओं, प्रभाओं व मान्यताओं का अनुकरण करता हुआ प्रतीत होता है। इसीलिए भारतवर्ष का शायद ही कोई गांव या बस्ती हो जहां कोई मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा न हो। ये सब भारतीयों के अटूट धार्मिक आस्था को दर्शाता है। इन धार्मिक स्थानों में उमड़ती भीड़ ये जताने के लिए पर्याप्त है कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के इस जमाने में भी उन पर आस्था भारी पड़ रही है।
इस तरह की धार्मिक व ऐतिहासिक इमारतों के अनुरक्षण में जहां भारतीय पुरातत्व विभाग अपनी अहम भूमिका निभा रहा है वहीं प्रदेश स्तर पर वहां कि सरकारें भी इनका अनुरक्षण कर रही हैं। मध्यप्रदेश भी इनमें से एक है। यहां पर धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व की अनेक इमारतें हैं जिनका अनुरक्षण किया जा रहा है। ऐसी ही एक इमारत जबलपुर में स्थित चौंसठ योगिनी मंदिर है जिसका अनुरक्षण भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा किया जा रहा है।
जबलपुर का चौंसठ योगिनी मंदिर सुप्रसिद्ध पर्यटक स्थल भेड़ाघाट व धुआंधार जलप्रपात के नजदीक एक ऊंची पहाड़ी के शिखर पर स्थापित है। पहाड़ी के शिखर पर होने के कारण यहां से काफी बड़े भू-भाग व बलखाती नर्मदा को निहारा जा सकता है। चौंसठ योगिनी मंदिर को दसवीं शताब्दी में कल्चुरी साम्राज्य के शासकों ने मां दुर्गा के रूप में स्थापित किया था। लोगों का मानना है कि यह स्थली महर्षि भृगु की जन्मस्थली है जहां उनके प्रताप से प्रभावित होकर तत्कालीन कल्चुरी साम्राज्य के शासकों ने इस मंदिर का निर्माण करवाया।
वर्तमान में मंदिर के अंदर भगवान शिव व मां पार्वती की नंदी पर वैवाहिक वेशभूषा में बैठे हुए की पत्थर की प्रतिमा स्थापित है।  मंदिर के चारों तरफ करीब दस फुट ऊंची गोलाई में चारदीवारी बनाई गई है जो पत्थरों की बनी है तथा मंदिर में प्रवेश के लिए केवल एक तंग द्वार बनाया गया है। चारदीवारी के अंदर खुला प्रांगण है जिसके बीचोंबीच करीब डेढ़-दो फुट ऊंचा और करीब 80-100 फुट लंबा एक चबूतरा बनाया गया है। चारदीवारी के साथ दक्षिणी भाग में मंदिर का निर्माण किया गया है।  मंदिर का एक कक्ष जो सबसे पीछे है उसमें शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित है। इसके आगे एक बड़ा-सा बरामदा है जो खुला है। बरामदे के सामने चबूतरे पर शिवलिंग की स्थापना की गई है जहां पर भक्तजन पूजा-पाठ करवाते हैं।
मंदिर की चारदीवारी जो गोल है उसके ऊपर मंदिर के अंदर के भाग पर चौंसठ योगिनियों की विभिन्न मुद्राओं में पत्थर को तराश कर मूर्तियां स्थापित की गई हैं। लोगों का मानना है कि ये सभी चौंसठ योगिनी बहनें थीं तथा तपस्विनियां थीं जिन्हें महाराक्षसों ने मौत के घाट उतारा था। राक्षसों का संहार करने के लिए यहां स्वयं मां दुर्गा को आना पड़ा था। इसलिए यहां पर सर्वप्रथम मां दुर्गा की प्रतिमा कल्चुरी के शासकों द्वारा स्थापित कर दुर्गा मंदिर बनाया गया था तथा उन सभी चौंसठ योगिनियों की मूर्तियों का निर्माण भी मंदिर प्रांगण की चारदीवारी पर किया गया। कालांतर में मां दुर्गा की मूर्ति की जगह भगवान शिव व मां पार्वती की मूर्ति स्थापित की गई है, ऐसा प्रतीत होता है।

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