Sunday, 6 May 2012

इस्लाम की कुछ शिक्षाएं


*इस्लाम ही  ने अनिवार्य परिस्थिति में स्त्रियों को पति -त्याग का अधिकार प्रदान किया है जिसे ‘खुलअ’ कहते हैं।

*इस्लाम ने किसी स्त्री के सतीत्व पर लांछन लगाने वाले के लिए चार साक्ष्य उपस्थित करना अनिवार्य ठहराया है और यदि वह चार साक्ष्य उपस्थित न कर सके तो उसके लिए अस्सी कोड़ों की सजा निश्चित की है।
*इस्लाम ने कम नापने और कम तोलने को वैधानिक अपराध के साथ धाॢमक पाप भी ठहराया और बताया कि परलोक में भी इसकी पूछ होगी।
*इस्लाम ने अनाथों के संपत्तिहरण को धार्मिक  पाप ठहराया है। (कुरआन, 4:10, 4:127) 
*इस्लाम कहता है कि यदि तुम ईश्वर से प्रेम करते हो तो उसकी सृष्टि से प्रेम करो।
ऌइस्लाम कहता है कि ईश्वर उससे प्रेम करता है, जो उसके बंदों के साथ अधिक से अधिक भलाई करता है।
ऌइस्लाम कहता है कि जो प्राणियों पर दया करता है, ईश्वर उस पर दया करता है।
ऌदया ईमान की निशानी है, जिसमें दया नहीं उसमें ईमान नहीं।
ऌकिसी का ईमान पूर्ण नहीं हो सकता, जब तक वह अपने साथी को अपने समान न समझे।
*कोई व्यक्ति सही भावार्थ में मुस्लिम नहीं हो सकता यदि वह पेट भरकर सोए और उसका पड़ोसी खाली पेट (भूखा) हो।
*इस्लाम के अनुसार इस्लामी राज्य कुफ्र (अधर्म) को तो (विशेष परिस्थितियों में तथा निश्चित सीमा तक) सहन कर सकता है, परन्तु अत्याचार और अन्याय को सहन नहीं कर सकता।
*इस्लाम कहता है कि जिसका पड़ोसी उसकी बुराई से सुरक्षित न हो वह ईमान वाला नहीं है।
*जो व्यक्ति किसी व्यक्ति की एक बालिश्त (बित्ता) भूमि भी अनाधिकार रूप से ले लेगा, वह कयामत के दिन सात तह तक पृथ्वी में धंसा दिया जाएगा।

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