Monday, 21 May 2012

धार्मिक एकता के सूत्रपात हजरत ख्वाजा मुईनुद्दीन हसन चिश्ती अजमेरी

धार्मिक एकता के सूत्रपात हजरत ख्वाजा मुईनुद्दीन हसन चिश्ती अजमेरी
| वेद | परिचय  |                       

धार्मिक एकता के सूत्रपात हजरत ख्वाजा मुईनुद्दीन हसन चिश्ती अजमेरी



समस्त संसार में जब मानवता त्राहि-त्राहि कर रही थी तब अनेक सूफी-संतों का प्रादुर्भाव हुआ। इन्होंने जन साधारण में जाति-पाति, अमीर-गरीब एवं सम्प्रदायों से रहित होकर समस्त मानवता में नवचेतना का संचार किया। इनके द्वारा एकेश्वरवाद, स्वलीला अद्वैत का आलौकिक संदेश भी प्रसारित किया गया। इनका सदैव से ही विश्व बंधुत्व एवं सौहार्द का प्रयास रहा है। इसी परम्परा को बढ़ाते हुए अनेकों फकीरों ने एक सच्चरित्रवान व्यक्ति की अवधारणा बनाई। हिंदुस्तान में भी सर्वप्रथम सौहार्द-धार्मिक  एकता का सूत्रपात किया। इनमें प्रमुख नाम ख्वाजा साहिब अजमेरी का है। उनको आज तक हिंदू-मुस्लिम अपनी श्रद्धा के पुष्प अर्पित  करते हैं।
 

ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती साहिब का जन्म ईरान के हेरात में स्थित सजिस्तान प्रांत के संजर ग्राम में हुआ। आपने ही हिंदुस्तान में चिश्तिया सम्प्रदाय का प्रचार-प्रसार अपने सद्गुरु ख्वाजा उस्मान हारुनी के दिशा-निर्देशों पर किया। आपकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा अपने पिता के संरक्षण में हुई परन्तु आपके पिता की मृत्यु के समय आपकी अल्पायु मात्र ग्यारह वर्ष थी। उत्तराधिकार में मात्र एक बाग की प्राप्ति हुई। इसी की आय से जीवन निर्वाह होता था। संयोग या दैवयोग से आपके बाग में एक बार हजरत इब्राहिम कंदोजी का शुभ आगमन हुआ। आपकी आवभगत से वह अत्यंत प्रभावित हुए। फकीर ने आपके सिर पर अपना पवित्र हाथ फेरा तथा शुभाशीष दी।
 

तत्पश्चात आपके हृदय में नवचेतना का संचार हुआ।  सर्वप्रथम आप एक वृक्ष के नीचे समाधिस्थ हुए परन्तु राज कर्मचारियों द्वारा यह कहने पर कि यहां तो राजा की ऊंटनियां बैठती हैं, आप वहां से नम्रतापूर्वक उठ गए। राजा के ऊंट-ऊंटनियां वहां से उठ ही न पाए तो कर्मचारियों ने क्षमा-याचना की। अब आपका मुकाबला राजा पृथ्वीराज चौहान के जादूगर जयपाल से हुआ परन्तु सद्गुरु कृपा से वह जादूगर परास्त हो गया।
आपका निवास एक तालाब के किनारे पर बना दिया गया। जहां पर आप दिन-रात निरंतर साधना में निमग्र रहते थे। आप अक्सर दुआ मांगते कि ‘ए अल्लाह त आला/परब्रह्म स्वामी जहां कहीं भी दुख दर्द और मेहनत हो वह मुझ नाचीज को फरमा दे।’ आपने अनेकों हज पैदल ही किए।
आपने अंतध्र्यान होने से पूर्व ही अपने प्रिय शिष्य ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियारी को उत्तराधिकारी बनाया जिनका दरबार दिल्ली के महरौली में स्थित है। अवसान अजमेर में आपकी समाधि स्थित है। आपकी समाधि पर प्रतिवर्ष उर्स का आयोजन होता है।

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