Thursday, 24 May 2012

मानवता के सच्चे सेवक गुरु अर्जुन देव

गीता   | वेद-पुराण पढो या सुनो                        | परिचय    |श्री राम   
मानवता के सच्चे सेवक गुरु अर्जुन देव

शांति के पुंज, शहीदों के सरताज गुरु अर्जुन देव जी की शहादत अतुलनीय है। हर विचारवान व्यक्ति के मन में यह प्रश्र कौंध जाता है कि गुरुदेव ने ऐसा कौन-सा ‘अपराध’ किया कि उन्हें इस तरह यासा व सियासत कानून के अंतर्गत शहीद कर दिया गया। श्री गुरु अर्जुन देव जी का प्रकाश श्री गुरु रामदास जी तथा माता भानी जी के यहां वैशाख बदी 7 सम्वत् 1620 मुताबिक 15 अप्रैल 1563 ई को गोइंदवाल साहिब में हुआ। आपका पालनपोषण गुरु अमरदास जी जैसे गुरु तथा बाबा बुड्ढा जी जैसे महापुरुषों की देखरेख में हुआ। आप बचपन से ही बहुत शांत स्वभाव तथा पूजा भक्ति करने वाले थे।

मानव-कल्याण के लिए आजीवन शुभ कार्य करने वाले गुरु अर्जुन देव सिखों के पांचवें गुरु हैं। संपादन कला के गुणी गुरु अर्जुन देव जी ने 1604 में गुरु ग्रंथ साहिब का संपादन भाई गुरदास की सहायता से किया। उन्होंने रागों के आधार पर ग्रंथ साहिब में संकलित वाणियों का जो वर्गीकरण किया है, उसकी मिसाल मध्यकालीन धाॢमक ग्रंथों में दुर्लभ है। यह उनकी सूझबूझ का ही प्रमाण है कि ग्रंथ साहिब में गुरु जी ने अनेक धर्मों, वर्णों व जातियों से संबंधित भक्तों, महापुरुषों, संतों की बाणी को सिख गुरु साहिबान के बराबर सम्मान देते हुए शामिल किया। श्री गुरु ग्रंथ साहिब के कुल 5894 शब्द हैं, जिनमें से 2216 शब्द श्री गुरु अर्जुन देव जी महाराज के हैं। सिख संस्कृति को गुरु जी ने घर-घर तक पहुंचाने के लिए अथाह प्रयत्न किए। गुरु अर्जुन देव का कई दृष्टिïयों से सिख गुरुओं में विशिष्ट स्थान है।अर्जुन देव ने अपने पिता द्वारा अमृतसर नगर के निर्माण कार्य को आगे बढ़ाया। ‘अमृत सरोवर’ का निर्माण कराकर उसमें ‘हरमंदिर साहब’ का निर्माण कराया, जिसकी नींव सूफी संत मियां मीर के हाथों से रखवाई गई। तरनतारन नगर गुरु अर्जुन देव के समय बसाया गया एक नगर है। अमृतसर में रामदास सरोवर के बीच में हरमंदिर साहिब का निर्माण कराया। हरमंदिर साहिब के चार दरवाजे इस बात के प्रतीक हैं कि हरमंदिर साहिब हर धर्म जाति वालों के लिए खुला हुआ है। ‘उपदेश चहुं वरनो को सांझा’। तरनतारन साहिब में एक विशाल सरोवर का निर्माण कराया जिसके एक तरफ तो गुरुद्वारा साहिब का निर्माण कराया और दूसरी तरफ कुष्ठ रोगियों के लिए एक दवाखाना बनवाया। यह दवाखाना आज तक सुचारू रूप से चल रहा है। सामाजिक कार्य के रूप में गांव-गांव में कुंओं का निर्माण कराया। सुखमणि साहिब की भी रचना की जिसका हर गुरसिख प्रतिदिन पाठ करता है। सुखमणि शब्द अपने आप में अर्थ भरपूर है। मन को सुख देने वाली वाणी यानी सुखों की मणि। गुरु अर्जुन देव ने 6000 से अधिक पद रचे हैं, जिनमें सुखमणि सबसे सरस है।

अकबर के देहांत के बाद जहांगीर दिल्ली का शासक बना। वह कट्टरपंथी था। अपने धर्म के अलावा उसे और कोई धर्म पसंद नहीं था। गुरु जी के धार्मिक  और सामाजिक कार्य भी उसे बुरे लगते थे। इसी दौरान जहांगीर का पुत्र खुसरो बगावत करके आगरा से पंजाब की ओर आ गया। जहांगीर को यह सूचना मिली थी कि गुरु अर्जुन देव जी ने खुसरो की मदद की है इसलिए उसने गुरु जी को गिरफ्तार करने के आदेश दे दिए। अपनी जीवनी तुकाके जहांगीरी में उसने स्पष्ट लिखा है कि वह गुरु जी के बढ़ रहे प्रभाव से दुखी था। गुरु अर्जुन देव कहते थे, ‘न किसी से अकारण डरो और न ही किसी को अकारण डराओ।’ वे मानवता के सच्चे सेवक और धर्म के रक्षक थे। उनके मन में सभी धर्मों के लिए समान भाव था। बादशाह ने एक न सुनी और यासा कानून के अनुसार फतवा लगाकर शहीद करने का हुक्म दे डाला। यासा के अनुसार किसी व्यक्ति का रक्त धरती पर गिराए बिना उसे यातनाएं देकर शहीद कर दिया जाता है। जहांगीर द्वारा कैद में गुरु अर्जुन देव को तरह-तरह की यातनाएं दी गईं।  पर शांति के दूत, ‘तेरा कीआ मीठा लागे, हरि नाम पदारथ नानक मांगे’ कहते रहे और कष्ट सहते रहे। कभी भी आपने किसी को भी दुर्वचन नहीं बोले।

1606 ई. में रावी के तट पर गुरु अर्जुन देव को रावी नदी में डालने का हुक्म दिया गया और जपुजी का जाप करते-करते रावी नदी में स्नान के लिए डुबकी लगाते ही इस नश्वर संसार का त्याग कर दिया। उसी स्थान पर लाहौर में रावी नदी के किनारे गुरुद्वारा डेरा साहिब (जो अब पाकिस्तान में है) का निर्माण किया गया है। गुरु अर्जुन देव जी की शहादत सिख इतिहास में पहली और दुनिया के इतिहास में एक बेमिसाल शहादत है। आपने सिख धर्म के पनप रहे पौधे को अपने खून से सींचा है। 
 

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