Sunday, 6 May 2012

ऋषियों की पवित्र तपोभूमि नैमिषारण्य

ऋषियों की पवित्र तपोभूमि नैमिषारण्य
भारतवर्ष के पग-पग पर तीर्थ विद्यमान हैं। हर तीर्थ किसी न किसी मान्यता अथवा विश्वास से जुड़ा है। भक्तों की अडिग आस्था इन तीर्थों को बनाए रखती है। युगों-युगों से ये आस्था स्थल लोगों को सद्प्रेरणा व भक्ति प्रदान कर रहे हैं। भारत के अति प्राचीन तीर्थों में प्रमुखता से नाम आता है-नैमिषारण्य का। उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर में विद्यमान नैमिषारण्य तीर्थ हिन्दू मान्यताओं में प्रमुख स्थान रखता है। 
कई ऋषि-मुनि इस स्थान पर तप करने के लिए आते रहे हैं। इसीलिए कहा जाता है कि यहां के वायुमंडल में प्रवेश करते ही मनुष्य का तन व मन दोनों पवित्र हो जाते हैं।
नैमिषारण्य ही वह स्थान है जहां महॢष वेद व्यास जी ने वेदों का विस्तार किया। माना जाता है कि स्वामी शुकदेव जी ने यहीं पर राजा परीक्षित को श्रीमद् भागवत की कथा सुनाई थी। नैमिषारण्य तीर्थ को शौनकादिक व 88 हजार ऋषियों द्वारा 12 वर्ष तक किए जाने वाले सत्र व यज्ञ का सौभाग्य प्राप्त है। इसी सत्र के दौरान व्यास जी के शिष्य सूत जी महाराज का आगमन हुआ, जिनसे शौनकादिक व 88 हजार ऋषियों ने इस तीर्थ के महत्व की कथा सुनाने की प्रार्थना की। 
सूत जी ने इस तीर्थ के महत्व की जो कथा कही वह इस प्रकार है-एक बार समस्त ऋषि भगवान ब्रह्मा के पास गए और उनसे प्रार्थना की-हे प्रभु! पृथ्वी पर ऐसी कौन-सी पवित्र भूमि है जहां हम लोग यज्ञ व तपस्या पूर्णत: शांतिपूर्वक कर सकें। तब ब्रह्मा जी ने सूर्य के समान तेज पूर्ण एक चक्र उत्पन्न किया और मुनिजनों से कहा कि आप लोग इस चक्र के पीछे-पीछे जाएं जिस स्थान पर इस चक्र की नैमि (धुरी) शीर्ण हो जाए उसी भूमि को पवित्र व तप योग्य समझना।
इतना कह कर ब्रह्मा जी ने उस चक्र को प्रणाम करके छोड़ दिया। सारे ऋषि-मुनि चक्र के पीछे-पीछे चल पड़े। वेग पूर्वक घूमता हुआ वह चक्र समस्त लोकों में विचरण करता हुआ पृथ्वी पर आ पहुंचा। कुछ समय पश्चात वह एक स्वादिष्ट जल वाले सुरमय जंगल के ऊपर जा पहुंचा। धीरे-धीरे वहीं चक्र की धुरी (नेमि) शीर्ण हो गई। इसी कारण इस स्थान का नाम नैमिषारण्य कहलाया। ऋषि समझ गए कि यही वह आरण्य है जहां वे अपनी तपोभूमि बना सकते हैं। जिस स्थान पर चक्रशीर्ण हुआ उस स्थान पर जल की धारा प्रवाहित होने लगी। यह स्थान आज एक सरोवर के रूप में है तथा चक्र तीर्थ कहलाता है। ब्रह्म पुराण व स्कंद पुराण में सर्वप्रथम इस स्थान का वर्णन आता है। नैमिषारण्य में सर्वप्रथम इस कुंड में स्नान करने के पश्चात ही यहां के दर्शन करने का प्रावधान है।
नैमिषारण्य में 84 कोस की परिक्रमा के विषय में शास्त्रों में उल्लेख किया गया है। यह परिक्रमा फाल्गुन मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पूॢणमा तक की जाती है। इसके अंतर्गत कुल 11 पड़ाव आते  हैं। चक्रतीर्थ के अतिरिक्त नैमिष में कई महत्वपूर्ण तीर्थ हैं जिसमें से ललिता देवी मंदिर 108 शक्तिपीठों में से एक है। इस सिद्ध पीठ पर नवरात्रों में भक्तजन दूर-दूर से दर्शन हेतु आते हैं। यहां के अन्य तीर्थ इस प्रकार हैं-
व्यास गद्दी-महॢष वेद व्यास ने यहां कई वर्षों तक साधना की थी। यहीं उन्होंने वेदों का विस्तार किया था। इसी गद्दी मंदिर के पास ही मनु व शतरूपा देवी का तप स्थल है, जहां लोग संतान प्राप्ति की मनोकामना करने आते हैं।
मिश्रित तीर्थ : इस तीर्थ पर स्थित कुंड में समस्त तीर्थों का जल विराजमान माना जाता है। यहीं पर प्राचीन काल में महॢष दधीचि ने इंद्र देव को अपना अस्थि दान दिया था। वृत्रासुर नामक दानव ने समस्त देवों को बहुत परेशान कर रखा था। उसका वध केवल मुनि दधीचि की हड्डियों से बने वज्र से ही संभव था। तब इंद्रदेव ने मुनि से इस बलिदान की गुहार लगाई। दधीचि इस महादान के लिए तैयार हो गए परन्तु देह त्यागने से पूर्व उन्होंने सारे तीर्थों में स्नान करने की इच्छा प्रकट की। देवों ने तब सब तीर्थों का यहां आह्वान किया। इस प्रकार मिश्रित तीर्थ प्रकाश में आया।
श्री दशाश्वमेध घाट : यह स्थान गोमती नदी के तट पर विद्यमान है। गुरु वशिष्ठ के कहने पर श्रीराम ने यहीं पर अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था। सीता जी के अभाव में उनकी स्वर्ण प्रतिमा बना कर यज्ञ में रखी गई। इसी यज्ञ सत्र के अंतर्गत भगवान वाल्मीकि लव-कुश के साथ पधारे तथा पिता-पुत्रों का आपस में मिलन करवाया।
हनुमान गढ़ी : इस मंदिर में भगवान राम को कांधे पर उठाए वीर बजरंगबली की 21 हाथ बड़ी दक्षिणाभिमुखी मूरत सुशोभित है। जिस समय लंका में राम व रावण में युद्ध हो रहा था उसी समय रावण का भाई अहिरावण छल से राम-लक्ष्मण का अपहरण करके उन्हें पाताल लोक ले गया। तब वीर हनुमान ने पाताल में जाकर उसका वध किया। वह राम लक्ष्मण को कंधों पर बैठा कर नैमिषारण्य में ही पाताल लोक से बाहर आए थे। हनुमान गढ़ी में भगवान का यही रूप शोभायमान है।
पांडव कूप : हनुमानगढ़ी में ही पांडवों द्वारा निॢमत यह कुआं है। इसका उल्लेख पदमपुराण में भी मिलता है। पांडवों को भगवान कृष्ण ने ब्रह्म हत्या से पाप मुक्ति के लिए नैमिष में ही तपस्या करने को कहा। उनके अनुसार इस दौरान यदि सोमवती अमावस्या आ गई तो उन्हें इस दोष से मुक्ति मिल जाएगी। पांचों पांडवों ने 12 वर्ष तक यहां तप किया परन्तु सोमवती अमावस्या नहीं आई। अत: पांडवों ने सोमवती अमावस्या को श्राप दे दिया कि कलयुग में हर वर्ष पड़ोगी और नाना प्रकार के लोग इस दौरान स्नान करके मुक्ति प्राप्त करेंगे तभी से हर वर्ष 2 या 3 बार यह दिवस आता है।
इसके अलावा यहां पर भूतेश्वरनाथ महादेव, पांडव किला, सूतजी गद्दी मंदिर, महॢष शौनकजी आश्रम, काशीकुंड, देव-देवेश्वर महादेव, सीता रसोई, द्रौपदी मंदिर, सिद्धेश्वर महादेव इत्यादि कई तीर्थ स्थान हैं जिनकी यात्रा को लाभकारी व कल्याणकारी माना जाता है। नैमिषारण्य में वर्ष भर श्रद्धालुओं का आगमन होता रहता है।



                                                                  



दसूहा का प्राचीन पांडव सरोवर

दसूहा का प्राचीन पांडव सरोवर



द्वापर  युग में अवतरित सोलह कला सम्पूर्ण भगवान श्री कृष्ण ने मर्यादा के साथ-साथ कर्म को श्रेष्ठ बताया है। फल की इच्छा न कर कर्म करना गीता का संदेश है जो हर किसी को कर्म के  प्रति प्रेरित करता है। गीता का उपदेश श्री कृष्ण ने अर्जुन को महाभारत का युद्ध प्रारंभ होने से पहले दिया था। महाभारत के युद्ध का विनाश रोकने हेतु एक बैठक का आयोजन जिस स्थान पर हुआ था वह स्थान आजकल विराट नगरी दसूहा के नाम से प्रसिद्ध है। दसूहा पंजाब के होशियारपुर जिला क्षेत्र में जालंधर से पठानकोट जाते समय मुख्य मार्ग पर पड़ता है। मान्यता के अनुसार प्राचीन युग (महाभारत) के समय 12 वर्ष वनवास के पश्चात पांडवों ने एक वर्ष का अज्ञातवास ऐतिहासिक नगरी दसूहा में राजा विराट के सेवादार बन कर पूरा किया। जब राजा विराट ने नकुल और सहदेव को चरवाहे का कार्य सौंपा तो उन्होंने गऊओं के लिए पीने के पानी की कमी महसूस करके अपने भाई महाबली भीम को इसकी जानकारी दी। महाबली भीम ने अपने बाहुबल से भगवान श्री कृष्ण का नाम लेते हुए अढ़ाई ठप्प लगाकर एक  सरोवर का निर्माण किया जो ‘पांडव सरोवर’ के नाम से विख्यात हुआ है। 
महाभारत युद्ध का विनाश टालने के प्रयास हेतु भी इस पवित्र स्थान पर पांडवों की बैठक हुई जिसमें पांचों पांडव भाई, योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण, विराट नगरी के राजा विराट, पांचाल नरेश द्रुपद आदि राजा और मंत्री शामिल हुए। इस बैठक के दौरान निर्णय लिया गया कि कौरव यदि पांडवों को रहने के लिए पांच गांव भी दे दें तो युद्ध टाला जा सकता है। पांडवों का यह प्रस्ताव लेकर भगवान श्री कृष्ण दूत के रूप में कौरवों के पास गए परन्तु अभिमान वश कौरव सूई की नोक के बराबर भी भूमि देने को तैयार न हुए। घमंड में चूर दुर्योधन ने श्री कृष्ण की एक  न सुनी और उन्हें वापस लौटा दिया।
कौरवों का युद्ध का प्रस्ताव सुनकर जब भगवान श्री कृष्ण पुन: इस विराट नगरी में आए तो दोबारा बैठक में यह प्रस्ताव पारित हुआ कि अब युद्ध करना ही पड़ेगा। भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों को युद्ध की तैयारी करने को कहा और साथ ही कहा कि यह धर्मयुद्ध है। यहां से ही पांडवों ने युद्ध के लिए प्रस्थान किया।
1993 तक यह सरोवर पानी से भरा रहता था लेकिन सरोवर के जीर्णोद्धार व मंदिर निर्माण के लक्ष्य को लेकर गठित की गई धाॢमक कमेटी ने मोटरों से पानी बाहर निकाला। प्राचीन पांडव सरोवर निर्माण कमेटी के प्रयास से पांडव सरोवर में भव्य श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर का निर्माण हो चुका है। इस मंदिर का निर्माण 111 पिलरों पर किया गया है। कमलपुष्प की आकृति में बना यह मंदिर चार प्रवेश द्वारों से सुसज्जित है।
मंदिर की धाॢमक कमेटी के अथक प्रयासों से भारत सरकार ने इस ऐतिहासिक सरोवर को भारत के ऐतिहासिक तीर्थ स्थानों में उच्च स्तर की मान्यता प्रदान करके इस पवित्र स्थान की मान्यता को और भी बढ़ा दिया है। दसूहा नगरी में स्थित प्राचीन पांडव सरोवर परिसर के मुख्य मार्ग पर विशाल दो मंजिला लंगर हाल भी बनाया गया है जो बाबा बर्फानी सेवा समिति श्री शांतिगिरी जी लंगर हाल के नाम से विख्यात है। सीमित द्वारा प्रतिवर्ष श्री अमरनाथ यात्रा के दौरान, श्रावण मेला श्री ङ्क्षचतपूर्णी जी व बाबा बड़भाग ङ्क्षसह जी की यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए लंगर, रात ठहरने की व्यवस्था व नि:शुल्क दवाइयों की व्यवस्था की जाती हैं।
अमर शहीद लाला जगत नारायण जी की स्मृति में मंदिर प्रबंधक कमेटी द्वारा एक यादगारी गेट भी बनाया गया है। मंदिर में श्री लक्ष्मी नारायण, श्री राधा कृष्ण, श्री राम दरबार एवं मां दुर्गा जी की दिव्य मूॢतयां सबके  आकर्षण का केंद्र हैं और भगवान शिव की बनाई गई विशाल प्रतिमा सबको आकॢषत करती है।

1 comment: