Monday, 2 July 2012

सनातनधर्म की जये


भारतीय संस्कृति में गुरु को समर्पित पर्व का नाम ‘गुरु पूर्णिमा’ है। इसे व्यास 


पूजा भी कहते 


हैं। गुरु पूर्णिमा यानी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा गुरु पूजा के रूप में 


मनाई जाती 


है। गु का अर्थ है-अंधकार-तिमिरता और रु का अर्थ है-उसका निरोधक अर्थात् 


अंधकार को 


हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को गुरु कहा जाता है।


मान्यता है कि प्रत्येक युग के किसी एक विशेष  मन्वन्तर में विष्णु व्यास के 


रूप में अवतरित 


होते हैं। 7वां मन्वन्तर अर्थात काल गणना के अनुसार यह 28वां चतुदुर्गी है। इस 


वैवस्वत 


मन्वंतर में महर्षि वेद व्यास भगवान विष्णु के 


कालावतार माने जाते हैं। मानवीय कल्याण के लिए स्वयं श्री हरि विष्णु 


द्वापर युग 


के अंतिम चरण में महर्षि पराशर के अंश से सत्यवती के गर्भ द्वारा अनंत विभूषित 


महर्षि व्यास 


के रूप में अवतरित हुए। 


महॢष वेद व्यास जी ने श्रेष्ठतम जीवन मूल्यों को अपने जीवन में संचित कर उसे 


सम्पूर्ण मानव 


जाति के कल्याण के लिए उपयोग किया। महॢष वेद व्यास निष्णात उद्भट विद्वान 


हैं। महॢष वेद 


व्यास जी ने वेदों  को ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद , और अथर्ववेद -इन 4 भागों 


में विभक्त किया। वेदों का विस्तार इनके माध्यम से होने के कारण इनका नाम 


वेद व्यास 


पड़ा। भारतीय संस्कृति पर वेद व्यास जी की अमिट छाप है।


भारतीय संस्कृति विश्व के सम्मुख प्राचीन काल से ही एक चट्टान की भांति अटल 


रही है। 


अनेकों बुद्धिजीवियों, समाज सुधारकों के मन से निकले विचारों के प्रबल प्रवाह ने 


इसे उखाड़ 


फैंकना चाहा, लेकिन यह कलयुग और लालच की वृति द्वारा ही  संभव हो पाया। 


वस्तुत: इसके 


पीछे एकमात्र कारण महॢष वेद व्यास जैसे तपस्वी व ऋषियों और मुनियों की गरिमापूर्ण 


विलक्षणता और उनका अक्षुण्ण प्रभाव एवं प्रताप रहा है। सनातन धर्म के प्रचार-


प्रसार में उनका 


विशिष्ट योगदान रहा है।


पाखंडी और धूर्त वृति के कलयुगी कथा वाचकों -तथाकथित आज के बाबाओं -


गुरुओं ने सनातनधर्म की नरमाई का दुरूपयोग करते हुए खुद बलात भगवान वेद 


व्यास जी की गडी पर बेठने का दुसाहस करते हुए खुद को भगवान कहलाना शुरु 


कर भोले -भले सनातन धर्म प्रेमी सनातनियों को लूटने का धंदा बनालिया ।


इतनाही नही सनातन धर्मियों को धर्म परिवर्तन कर राधास्वामी -निरंकारी -


आर्यसमाजी -brindrabni वगेरा-वगेरा भारतीय सरकार की नाक तले सनातनधर्म 


को जद से उखाड़ फेंकने का असफल प्रयास कर  रहे हैं। जब की   


भगवान वेद व्यास जी को  महाभारत, अठारह पुराण,  


श्रीमद्भगवद् 


गीता, ब्रह्मसूत्र, मीमांसा जैसे 


अद्वितीय साहित्य दर्शन के प्रणेता होने का गोरव आज भी 


भगवान 


की कृपा से प्राप्त हैं। 


इन्हीं अपरिमित उपलब्धियों व विशेषताओं के कारण महॢष वेद व्यास जी की जन्म तिथि को 


गुरु पूर्णिमा  के रूप में मनाया जाता है।




बिन गुरु होय न ज्ञान- साधना पथ पर साधक बिना गुरु के सफल नहीं हो सकता। बिना 


सत्गुरु ब्रह्मा .विष्णु ,महेश- की शरण के मनुष्य का कल्याण असंभव नहीं, तो 


अत्यंत कठिन 


अवश्य है। गुरु और शिष्य का संबंध संसार में सबसे महत्वपूर्ण है।


‘तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्रेन सेवया।


उपदेक्ष्यंति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदॢशन:।।


जो श्रद्धाभाव से इन गुरुओं की  शरणागत हो, अपना आप सद्गुरु को समॢपत कर 


देता है, वही     


ज्ञाना अर्जित  करने का पात्र है। गुरु अनमोल हैं , अतुलनीय हैं, गुरु अनुपमेय हैं। 


गुरु ज्ञान का 


असीम भंडार हैं। गुरु के  बिना मोक्ष नहीं। सद्गुरु जिसने सत् अर्थात  ब्रह्म का 


साक्षात्कार  कर 


लिया है, जो ज्ञान  की  प्राप्ति के लिए अपने शरण में आए  लोगों का शिक्षक  


बन गया है,  


वह  सद्गुरु   कहलाता है।


‘गुरुब्र्रह्मा गुरुविष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:।


गुरु साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे 


नम:।।






गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं:


ज्ञान का पथ कृपाण की धार’ अर्थात  ज्ञान का पथ तलवार की धार पर चलने 


की तरह है। इस रास्ते पर चलने के लिए तो अपने आप को मिटाना जरूरी है, 


अन्यथा कुछ नहीं मिलता है। हमारी संस्कृति में, समाज में, परिवार में, गुरु का 


गौरवपूर्ण स्थान है। गुरु का गौरवगान ईश्वर गुणगान के तुल्य है।  महॢष वेद 


व्यास जी 8 चिरंजीवियों में से एक हैं, जिस के बिना हमारा रचित संसार अधूरा 


है। गुरु पूर्णिमा दिवस मांगलिक एवं पवित्रमय है और एक शिष्य के लिए 


‘गुरुब्र्रह्मा गुरुविष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:।


गुरु साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे 


नम:।।

 पूजा से श्रेष्ठ कोई उत्सव नहीं है। शास्त्रों में वॢणत है कि इस दिन श्रद्धा से पूजन 


करने से असीम भगवत् कृपा की प्राप्ति होती है। गुरु के चरण कमलों से बढ़कर न 


कोई बैकुंठ है, न गौलोक, न कैलाश, न ब्रह्मलोक। गुरु के प्रति सात्विक भावना 


एवं अगाध श्रद्धा के कारण गुरु की अपार कृपादृष्टि शिष्य पर बनी रहे तो कार्य 


सहज ही सम्पूर्ण हो जाते हैं।अतः कलयुग में इन दंभी गुरुओं की पूजा  ना कर 


अपना यह अनमोल जीवन गुरु ब्रह्मा ,गुरु विष्णु ,गुरु महेश्वर ; की गुरु रूप में 




पूजा करने का प्रयास कर  सनातनी बने ।



सनातनधर्म की जये 

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