Wednesday, 25 July 2012

सूर्य के अवतार नाग देवता

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हिन्दू धर्म में मान्यता है कि पृथ्वी शेष नाग के सिर पर टिकी हुई है तथा श्रावण मास में नाग पंचमी के पर्व का विशेष महत्व है। इस दिन नाग देवता की पूजा करने से नाग देवता की कृपा प्राप्त होती है तथा सभी प्रकार के कष्टों से छुटकारा भी मिलता है। भगवान आशुतोष भोलेनाथ ने नागों को गले में धारण करके इनके महत्व को और भी बढ़ा दिया है।






गरुड़ पुराण में वर्णन आता है कि नाग पंचमी के दिन घर के दोनों बगल में नाग की मूर्ति बनाकर अनंत प्रमुख महानागों का पूजन करना चाहिए। वर्षा ऋतु ही सर्पों के निकलने का समय होता है। महाशिवरात्रि वाले दिन भगवान भोले नाथ अपनी झोली से विषैले जीवों को भूमि पर विचरण हेतु छोड़ देते हैं और जन्माष्टमी वाले दिन पुन: अपनी झोली में समेट लेते हैं। वर्षा ऋतु में नाग बिलों में पानी भर जाने के कारण बाहर आ जाते हैं। इसी कारण प्रत्यक्ष नाग पूजन का समय नागपंचमी वाला दिन विशेष महत्व रखता है।


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नागपंचमी के दिन नागों का दर्शन करना शुभ माना जाता है। मानव सभ्यता में इन्हें शक्ति तथा सूर्य का अवतार माना जाता है। पंचमी तिथि के स्वामी नाग देवता हैं। श्रावण मास में नाग पंचमी होने के कारण धरती खोदने का कार्य नहीं किया जाता। इस माह में भूमि पर हल नहीं चलाना चाहिए। मकान बनाने हेतु नींव भी नहीं खोदनी चाहिए। पुराणों में वर्णन आता है कि समुद्र मंथन में वासुकि नाग को मंदराचल पर्वत के इर्द-गिर्द लपेट कर रस्सी की भांति उपयोग किया गया। भोले नाथ नागों के देवता हैं। उनके सम्पूर्ण शरीर पर नागों का वास माना जाता है।





गले में नागों का हार, कानों में नाग कुंडल, सिर पर नाग मुकुट एवं छाती पर भी नाग ही शोभा बढ़ाते हैं। शिव की स्तुति में शिवाष्टक में भी वर्णन है कि शिव शंकर का पूरा शरीर सांपों के जाल से ढका हुआ है। इसी प्रकार भगवान विष्णु शेष नाग द्वारा बनाई गई शैय्या पर शयन करते हैं। रामायण में विष्णु भगवान के अवतार श्री राम के छोटे भाई लक्ष्मण एवं महाभारत के श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम को शेषनाग का अवतार बताया गया है। नाग सदैव पूजनीय हैं। वे आदि काल से अपने भक्तों एवं मानव जाति पर कृपा करते रहे हैं।





दधीचि ऋषि की अस्थियों से बने अस्त्र से इंद्र के हाथों मारा गया वृत्तासुर भी नागराज ही था। श्री कृष्ण व कालिय नाग की कथा तो हम बचपन से ही सुनते आए हैं। बाबा बालक नाथ जी के साथ भी सर्प रहते थे। भगवान बुद्ध तथा जैन मुनि पाŸरवनाथ के रक्षक नाग देवता माने जाते हैं। कश्मीर के जाने माने संस्कृत कवि कल्हण ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘राजतरंगिणी’ में कश्मीर की सम्पूर्ण भूमि को नागों का स्थान माना है। वहां के प्रसिद्ध नगर अनंतनाग का नामकरण इसका ऐतिहासिक प्रमाण है।




अमरनाथ यात्रा के समय रास्ते में शेष नाग झील में एक विशाल नाग के दुर्लभ दर्शन कई भक्तों को होते हैं। गौरी पूजन प्रसंग में हिन्दू महिलाएं बांझपन दूर करने के लिए नाग पूजा करती हैं। ज्योतिष के अनुसार पंचमी तिथि के स्वामी नाग हैं। अग्रि पुराण में तो स्पष्ट लिखा है कि शेष आदि सर्पराजों का पूजन पंचमी को होना चाहिए। सुगंधित पुष्प तथा दूध नागों को अतिप्रिय हैं। दूध, चावल, जल, फूल, नारियल आदि सकल सामग्री नाग पूजन में प्रयुक्त होती है। केवल कच्चा दूध ही नागों को चढ़ाया जाता है।





कुछ लोग 5 नागों की आकृतियां बनाकर नाग पूजा करते हैं तथा शाम को किसी बगीचे या पेड़ के नीचे घी तथा दूध रखकर प्रार्थना की जाती है कि हे प्रभु जहां हो वहीं रहियो हमारी रक्षा करियो। न आंखो दिखयो, न कानो सुनाइयो। सेवियों का प्रसाद भी नागों को अर्पित किया जाता है। आटे से प्रतीक स्वरूप नाग बनाकर उनका पूजन किया जाता है। ज्योतिष शास्त्रों में राहु व केतु को सर्प माना जाता है। राहु को सर्प का सिर तथा केतु को पूंछ माना जाता है। ज्योतिष गणनाओं के अनुसार जब सौरमंडल के समस्त ग्रह राहु व केतु की परिधि में आ जाते हैं, तब जन्म कुंडली में कालसर्प दोष योग का निर्माण होता है।





इस काल सर्प दोष योग को कृष्टकारी माना जाता है। नागपंचमी के दिन मंदिर जाकर कच्ची लस्सी से उनका अभिषेक करें, घी का दीपक जला धूप जलाकर नागस्तोत्र का जाप करें । नाग देवता प्रसन्न होकर सौभाग्य का आशीर्वाद देते हैं। नाग पंचमी के दिन चांदी के सर्प-सॢपणी के जोड़े के ऊपर नवग्रह पूजन, काल सर्प पूजन व राहु-केतु का पूजन करने से काल सर्प दोष का भय समाप्त हो जाता है। इस दिन किसी सपेरे से नाग खरीदकर उसे खुले जंगल में भी छोडऩे से शांति मिलती है। धन के पहरेदार के रूप में भी नागदेवता को देखा जाता है। नागपंचमी के दिन दूध, कुशा, गंध, फूल, लड्डुओं से निम्र मंत्र पढ़कर स्तुति करें : ‘ओम कुरूकुल्ये हुं फट् स्वाहा।’

नाग पूजन में चंदन की लकड़ी का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। उन्हें चंदन की लकड़ी की सुगंध अति प्रिय है। नाग पूजा से कभी सर्प के काटने का भय नहीं रहता। कुल में कभी किसी की सर्पदंश से मृत्यु नहीं होती। भगवान भोले नाथ की असीम कृपा से घर में सुख, शांति बढ़ती है।


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