Monday, 20 August 2012

धर्म ग्रंथों में अधिक मास

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हिंदू पंचांग के अनुसार साल 2012 में अधिक मास का योग बन रहा है। ये अधिक मास 18 अगस्त, शनिवार से शुरु होगा। ज्योतिषियों के अनुसार इस बार भादौ का अधिक मास रहेगा। इसके पहले साल 1993 में भादौ का अधिक मास आया था। 18 साल बाद ये संयोग दोबारा बन रहा है। अधिक मास के कारण इस बार चातुर्मास पांच महीनों का रहेगा वहीं गणेश चतुर्थी तथा इसके बाद आने वाले त्योहार एक महीने बाद आएंगे।

धर्म ग्रंथों में अधिक मास को पुरुषोत्तम मास भी कहा गया है, जिसका अर्थ है इस महीने के स्वामी स्वयं भगवान विष्णु हैं। वहीं भादौ मास के स्वामी भी भगवान विष्णु को ही माना जाता है। इस कारण इस बार अधिक मास का महत्व और भी बढ़ गया है। धर्म ग्रंथों के अनुसार देवताओं का शयन काल आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकदाशी तक 4 महीने का होता है। लेकिन इस बार 18 अगस्त से 16 सितंबर तक अधिक मास होने से चातुर्मास 5 माह का होगा। भादौ का अधिक मास होने से इस बार दो भादौ होंगे। ज्योतिषियों के अनुसार 1993 के बाद अब भादौ में अधिक मास के योग बने हैं। इसके बाद 2031 के भादौ में अधिक मास आएगा।

शादियों में होगी देरी

अधिक मास होने से पर्व, त्योहारों की तिथियां आगे बढ़ेंगी। शादी-ब्याह, मांगलिक कार्य देर से शुरु होंगे क्योंकि 24 नवंबर को देव उठने के बाद ही शुभ कार्य प्रारंभ होंगे।

ऐसे लगता है अधिक मास

32 महीने, 16 दिन, 1 घंटा 36 मिनट के अंतराल से हर तीसरे साल अधिक मास आता है। ज्योतिष में चंद्रमास 354 दिन व सौरमास 365 दिन का होता है। इस कारण हर साल 11 दिन का अंतर आता है जो 3 साल में एक माह से कुछ ज्यादा होता है। चंद्र और सौर मास के अंतर को पूरा करने के लिए धर्मशास्त्रों में अधिक मास की व्यवस्था की है।

जानिए अधिक मास में क्या करें, क्या नहीं

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 हमारे धर्म ग्रंथों में अधिक मास से संबंधित कई नियम बताए गए हैं। यह नियम हमारे खान-पान से लेकर व्यवहार को भी प्रभावित करते हैं। महर्षि वाल्मीकि ने अधिक मास के नियमों के संबंध में कहा है कि इस महीने में गेहूं, चावल, सफेद धान, मूंग, जौ, तिल, मटर, बथुआ, शहतूत, सामक, ककड़ी, केला, घी, कटहल, आम, हर्रे, पीपल, जीरा, सौंठ, इमली, सुपारी, आंवला, सेंधा नमक आदि भोजन पदार्थों का सेवन करना चाहिए।

इसके अतिरिक्त मांस, शहद, चावल का मांड, चौलाई, उरद, प्याज, लहसुन, नागरमोथा, छत्री, गाजर, मूली, राई, नशे की चीजें, दाल, तिल का तेल और दूषित अन्न का त्याग करना चाहिए। तांबे के बर्तन में गाय का दूध, चमड़े में रखा हुआ पानी और केवल अपने लिए ही पकाया हुआ अन्न दूषित माना गया है। अतएव इनका भी त्याग करना चाहिए। 

पुरुषोत्तम मास में जमीन पर सोना, पत्तल पर भोजन करना, शाम को एक वक्त खाना, रजस्वला स्त्री से दूर रहना और धर्मभ्रष्ट संस्कारहीन लोगों से संपर्क नहीं रखना चाहिए। किसी प्राणी से द्रोह नहीं करना चाहिए। परस्त्री का भूल करके भी सेवना नहीं करना चाहिए। देवता, वेद, ब्राह्मण, गुरु, गाय, साधु-सन्यांसी, स्त्री और बड़े लोगों की निंदा नहीं करना चाहिए।

Sunday, 19 August 2012

तीन वर्षों में एक बार आने वाला मलमास

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 हिंदू मान्यताओं के मुताबिक वैसे तो मलमास (अधिमास) में कोई शुभ कार्य नहीं होता है, लेकिन बिहार 

के नालंदा जिले के राजगीर में विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा की अनोखी परम्परा है। तीन वर्षों 

में एक बार आने वाला मलमास 18 अगस्त से प्रारम्भ होकर 16 सितंबर 2012 तक चलेगा इस दौरान 

राजगीर 

में विश्व प्रसिद्ध मेला लगता है और देश के साधु-संत यहां पहुंचते हैं। राजगीर पंडा समिति के सदस्य 

रामेश्वर पंडित कहते हैं कि इस एक महीने में राजगीर में काला काग को छोड़कर हिंदुओं के सभी 33 

करोड़ देवता राजगीर में प्रवास करते हैं। प्राचीन मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान 

ब्रह्मा के मानस पुत्र राजा बसु ने राजगीर के ब्रह्मकुंड परिसर में एक यज्ञ का आयोजन कराया था जिसमें 

33 करोड़ देवी-देवताओं को निमंत्रण दिया गया था और वह यहां पधारे भी थे परंतु काला काग (कौआ) 

को निमंत्रण नहीं दिया गया था।

जनश्रुतियों के मुताबिक इस एक माह के दौरान राजगीर में काला कौआ कहीं नहीं दिखता। इस क्रम में 

आए सभी देवी देवताओं को एक ही कुंड में स्नानादि करने में परेशानी हुई थी तभी ब्रह्मा ने यहां 22 कुंड 

और 52 जलधाराओं का निर्माण किया था। इस ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी में कई युगपुरुष, संत और 

महात्माओं ने अपनी तपस्थली और ज्ञानस्थली बनाई है। इस कारण मलमास के दौरान यहां लाखों साधु-

संत पधारते हैं। शनिवार को मलमास के पहले दिन हजारों श्रद्धालुओं ने राजगीर के गर्म कुंड में डुबकी 

लगाई और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की। पंडित जयकुमार पाठक के मुताबिक अधिमास के दौरान 

जो मनुष्य राजगीर में स्नान, दान और भगवान विष्णु की पूजा करता है उसके सभी पाप कट जाते हैं 

और वह स्वर्ग में वास का भागी बनता है। वे कहते हैं कि इस महीने में राजगीर में पिंडदान की परंपरा 

है। किसी भी महीने में मौत होने पर मात्र राजगीर में पिंडदान से ही उनकी मुक्ति मिल जाती है।


अधिमास के विषय में उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म के अनुसार दो प्रकार के वर्ष प्रचलित हैं एक सौर वर्ष 

जो 365 दिन का होता है जबकि एक चंद्र वर्ष होता है जो आम तौर पर 354 दिन का होता है। इन 

दोनों वर्षों के प्रकार में करीब 10 दिन के अंतर होता है। 32 महीने के बाद इन दोनों प्रकार के वर्ष में 

एक चंद्र महीने का अंतर आ जाता है, यही कारण है कि तीन वर्ष के बाद एक वर्ष में एक ही नाम के दो 

चंद्र मास आ जाते हैं जिसे अधिमास या मलमास कहा जाता है। पाठक कहते हैं कि इस वर्ष 18 अगस्त 

से 16 सितंबर तक सूर्य संक्रांति का अभाव है जिस कारण भादो चंद्र मास अधिमास हुआ है।


पाठक के अनुसार इस महीने में विवाह, मुंडन, नववधू प्रवेश सहित सभी शुभ कार्य वर्जित होते हैं परंतु 

विष्णु की पूजा को सर्वोत्तम माना गया है। इधर, राजगीर में मलमास मेले का शुभारंभ प्रसिद्ध संत 

फलाहारी बाबा चिदात्मन जी महाराज के द्वारा धार्मिक अनुष्ठान और ध्वजारोहण के साथ हो गया है। 

उल्लेखनीय है कि राजगीर न केवल हिंदुओं के लिए धार्मिक स्थली है, बल्कि बौद्ध और जैन धर्म के 

श्रद्धालुओं के लिए भी पावन स्थल है।
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अधिक मास का प्रारंभ 18 अगस्त,2012 . शनिवार से हो चुका है। धर्मग्रंथों के अनुसार अधिक मास को भगवान पुरुषोत्तम ने अपना नाम दिया है इसलिए इस मास को पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं। इस मास में भगवान की आराधना करने का विशेष महत्व है।

धर्मग्रंथों के अनुसार इस महीने में सुबह सूर्योदय से पहले उठकर शौच, स्नान, संध्या आदि अपने-अपने अधिकार के अनुसार नित्यकर्म करके भगवान का स्मरण करना चाहिए और पुरुषोत्तम मास के नियम ग्रहण करने चाहिए। पुरुषोत्तम मास में श्रीमद्भागवत का पाठ करना महान पुण्यदायक है। इस मास में तीर्थों, घरों व मंदिरों में जगह-जगह भगवान की कथा होनी चाहिए। भगवान का विशेष रूप से पूजन होना चाहिए और भगवान की कृपा से देश तथा विश्व का मंगल हो एवं गो-ब्राह्मण तथा धर्म की रक्षा हो, इसके लिए व्रत-नियमादि का आचरण करते हुए दान, पुण्य और भगवान का पूजन करना चाहिए। पुरुषोत्तम मास के संबंध में धर्मग्रंथों में वर्णित है -

येनाहमर्चितो भक्त्या मासेस्मिन् पुरुषोत्तमे। 

धनपुत्रसुखं भुकत्वा पश्चाद् गोलोकवासभाक्।।


अर्थात- पुरुषोत्तम मास में नियम से रहकर भगवान की विधिपूर्वक पूजा करने से भगवान अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्तिपूर्वक उन भगवान की पूजा करने वाला यहां सब प्रकार के सुख भोगकर मृत्यु के बाद भगवान के दिव्य गोलोक में निवास करता है।

Saturday, 18 August 2012

भगवान शंकराचार्य


योग सिद्ध भगवान शंकराचार्य

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भगवान शंकराचार्य के पिता श्री शिवगुरु को बहुत दिनों तक कोई संतान नहीं हुई। अत: उन्होंने अपनी पत्नी श्रीमती सुभद्रा जी के साथ भगवान  शंकर की कठोर तपस्या की। उनकी सच्ची आराधना से प्रसन्न होकर आशुतोष भगवान शंकर प्रकट हुए और उन्हें अपने ही समान सर्वगुण सम्पन्न पुत्र होने का वरदान दिया। इस प्रकार वैशाख शुक्ल पञ्चमी को सुभद्रा माता के गर्भ से साक्षात भगवान शंकर का ही श्री शिवगुरु के यहां प्राकट्य हुआ। केरल में कालडी नामक गांव इस महान विभूति के जन्म से प्रकाशित हो उठा।

भगवान शंकर के आशीर्वाद के फलस्वरूप उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शंकर रखा गया। वर्ष की अवस्था में पहुंचते-पहुंचते ही इनके पिता परलोकवासी हो गए। 5 वर्ष की अवस्था में इन्हें पढऩे के लिए गुरुकुल भेजा गया।  भगवान शंकराचार्य की विलक्षण प्रतिभा और महानता का परिचय इनके बचपन से ही मिलने लगा। 7 वर्ष की आयु में ये सम्पूर्ण वेद-शास्त्रों में पारंगत होकर घर वापस आ गए। विद्याध्ययन समाप्त करने के बाद भगवान शंकराचार्य ने संन्यास लेना चाहा किंतु इनकी माता ने अनुमति नहीं दी। एक दिन अपनी माता के साथ नदी में स्नान करने गए। स्नान करते समय इन्हें एक मगर ने पकड़ लिया।

इन्होंने अपनी माता से कहा कि यदि आप मुझे संन्यास लेने की आज्ञा दे देंगी तो मगर छोड़ देगा। विवश होकर माता को संन्यास की अनुमति प्रदान करनी पड़ी। जाते समय माता की मृत्यु के समय उपस्थित रहने का वचन देकर यह संन्यास लेने के लिए चल दिए। भगवान शंकराचार्य ने गोविंद भगवत्पाद से संन्यास की दीक्षा ली और अल्पकाल में ही योगसिद्ध महात्मा हो गए। गुरु ने इन्हें काशी जाकर ब्रह्म सूत्र पर भाष्य लिखने की आज्ञा दी। काशी में भगवान शंकर तथा भगवान व्यास के भी दर्शन हुए और उनकी कृपा से इनकी 16 वर्ष की आयु 32 वर्ष हो गई। भगवान व्यास ने इनको अद्वैतवाद का प्रचार करने की आज्ञा दी।

तदन्तर भगवान शंकराचार्य ने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया और शास्त्रार्थ में विभिन्न मतवादियों को परास्त करके अद्वैतवाद की स्थापना की। यद्यपि इन्होंने अनेक मंदिर बनवाए किंतु चारों धामों में इनके 4 मठ विशेष प्रसिद्ध हैं। आज भी इनके द्वारा स्थापित मठों के प्रधान आचार्य शंकराचार्य के नाम से ही जाने जाते हैं। भगवान शंकराचार्य द्वारा बनाए ग्रंथों में ब्रह्मसूत्र-भाष्य, उपनिषद्-भाष्य, गीता-भाष्य, पञ्चदशी आदि प्रमुख हैं। इस प्रकार 32 वर्ष के अल्पकाल में अपने अभूतपूर्व ज्ञान से संसार को वेदांत का अभिनव प्रकाश प्रदान करके भगवान शंकराचार्य ने सम्पूर्ण मानव जाति का अनुपम कल्याण किया।

श्रीराम

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गुण निधि श्रीराम
आपदामपहरतारं दातारं सर्व सम्पदम्।


लोकाभिरामं श्री रामं भूयो-भूयो नमाम्यहम्।


रामाय, रामभद्राय, राम चंद्राय मानसे।


रघुनाथाय, नाथाय, सीताया: पतये नम:।। 


प्रभु श्रीराम सभी आपत्तियों को हरने वाले तथा सब प्रकार के ऐश्वर्य 

प्रदान करने वाले हैं। वह सब को मनमोहक छवि से आनंद प्रदान 

करने वाले हैं। उनको बार-बार नमस्कार है। ऐसे रामभद्र, रामचंद्र 

सबके स्वामी, रघुनाथ जी, सीतापति जी को नमस्कार है।


ये प्रकट कृपाला, दीन दयाला कौशल्या हितकारी  चैत्र मास शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन कौशल्या माता के गर्भ से प्रभु श्रीराम प्रकट हुए। जब इस धरा पर असुर प्रवृत्ति वालों का बोलबाला बढ़ गया, तब देवताओं की विनती पर प्रभुधरती पर आसुरी शक्तियों के नाश हेतु तथा भक्तों का कल्याण करने हेतु पधारे। उनके आने से संपूर्ण मानव जाति धन्य हो गई।

सनातन मर्यादा के मापदंड  के जो आदर्श उन्होंने स्थापित किए आज भी सम्पूर्ण मानव जाति उनसे प्रेरणा ले रही है इसलिए वह मर्यादा पुरुषोत्तम भी कहलाए। स्वयं सनातन परब्रह्म होते हुए भी उन्होंने साधारण मानव की भांति व्यवहार किया लेकिन जिन्होंने उन्हें परमपिता परमेश्वर के रूप में पहचाना उन्होंने उनकी अविरल एवं शुद्ध हृदयचित से भक्ति कर परमधाम को प्राप्त किया। प्रभु श्रीराम शत्रुओं को भी अभय देने वाले, शरणागत वत्सल हैं।

जब विभीषण जी उनकी शरण में अपने भाई रावण की लंका को त्याग कर आए, तब उनकी निष्ठा पर वानर सेना ने शंका जताई। तब प्रभु श्री राम बोले कि अगर कोई दुराचारी भी मेरी शरण में आता है, मैं तो उसका भी परित्याग नहीं करता। विभीषण तो पूर्णतया निष्पाप हैं। भगवान श्री राम ने बाली से किष्किन्धा तथा रावण से लंका जीतकर इन्हें अपने साम्राज्य में नहीं मिलाया अपितु किष्किन्धा का राज्य सुग्रीव को तथा लंका का राज्य विभीषण को दे दिया तथा वहां आर्य विधान स्थापित किया। प्रभु श्रीराम त्रेतायुग में आए।

आज भी उनकी यशोकीर्ति का गुणगान कर भक्त आनंदित होते हैं। उनके भक्तों में भरत जी, हनुमान जी, लक्ष्मण जी, जटायु, शबरी आदि भक्ति के विलक्षण उदाहरण हैं। प्रभु श्रीराम आदि पुरुष नारायण हैं। उनकी भार्या सीता जी प्रभु संग वैकुंठ से पधारीं। प्रभु श्री राम ने शस्त्र एवं शास्त्रों का ज्ञान महॢष वशिष्ठ, विश्वामित्र जी एवं अगस्तय मुनि जी से प्राप्त किया। भगवान श्रीराम गुणनिधि हैं एवं संपूर्ण ब्रह्मांड के अधिपति हैं, वह मायापति हैं। ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया, रोम -रोम प्रति वेद कहैं। प्रभु श्रीराम की योगमाया के अंश मात्र से अनेकानेक ब्रह्मांडों की रचना हुई है, ऐसा वेद कहते हैं। प्रभु श्रीराम धर्म के साक्षात् विग्रह हैं।

रघुकुल रीति सदा चली आई। प्राण जाई पर वचन न जाई। अपने रघुवंश में चली आई परम्परा का निर्वहन करते हुए प्रभु श्रीराम जी ने चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया तथा अपने पिता दशरथ के द्वारा माता कैकेयी को दिए वचनों की रक्षा की। भगवान श्री राम ने अयोध्या में ग्यारह हजार वर्षों तक राज किया। उनके राज्य में प्रजा अत्यंत सुखी थी। सबके मन निर्मल एवं शुद्ध थे। किसी के प्रति भी किसी के मन में ईष्र्या-द्वेष की भावना नहीं थी। सब लोग कत्र्तव्य पालन करते थे जिस प्रकार सूर्य, पृथ्वी से जल खींचकर, पुन: वर्षा के रूप में जल को पृथ्वी पर बरसा देता है, उसी प्रकार प्रजा से प्राप्त कर को, प्रजा के हित में लगाया जाता था।

इसी कारण आज भी हर राष्ट्र राम राज्य की कामना करता है। भगवान श्री राम जी ने समाज के हर वर्ग, हर जाति, समुदाय के लोगों को गले लगाया। चाहे वह पक्षीराज जटायु हो, चाहे केवट अथवा शबरी। भगवान श्री राम सम्पूर्ण मानव जाति के महानायक हैं। जब तक इस धरती पर जीवन रहेगा, सूर्य का प्रकाश रहेगा, तब तक प्राणी समुदाय भगवान श्री राम द्वारा स्थापित सनातन आर्य मर्यादा के मापदंडों से शिक्षा लेता रहेगा। भगवान श्री राम समस्त जगत के परम आश्रय हैं। वह सनातन धर्म के रक्षक हैं। जीव के अंतिम क्षणों में मुख से राम का नाम निकलना, मुक्ति प्रदाय है एवं मोक्ष प्रदायक है। प्रभु श्रीराम का नाम भव, भय एवं समस्त दुखों को हरने वाला है। 

आपदामपहरतारं दातारं सर्व सम्पदम्।
लोकाभिरामं श्री रामं भूयो-भूयो नमाम्यहम्।
रामाय, रामभद्राय, राम चंद्राय मानसे।
रघुनाथाय, नाथाय, सीताया: पतये नम:।।
प्रभु श्रीराम सभी आपत्तियों को हरने वाले तथा सब प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हैं। वह सब को मनमोहक छवि से आनंद प्रदान करने वाले हैं। उनको बार-बार नमस्कार है। ऐसे रामभद्र, रामचंद्र सबके स्वामी, रघुनाथ जी, सीतापति जी को नमस्कार है।