Saturday, 18 August 2012

भगवान शंकराचार्य


योग सिद्ध भगवान शंकराचार्य

गीता   | वेद-पुराण पढो या सुनो | परिचय  |श्री राम   |  अपना भविष्य खुद जाने   


भगवान शंकराचार्य के पिता श्री शिवगुरु को बहुत दिनों तक कोई संतान नहीं हुई। अत: उन्होंने अपनी पत्नी श्रीमती सुभद्रा जी के साथ भगवान  शंकर की कठोर तपस्या की। उनकी सच्ची आराधना से प्रसन्न होकर आशुतोष भगवान शंकर प्रकट हुए और उन्हें अपने ही समान सर्वगुण सम्पन्न पुत्र होने का वरदान दिया। इस प्रकार वैशाख शुक्ल पञ्चमी को सुभद्रा माता के गर्भ से साक्षात भगवान शंकर का ही श्री शिवगुरु के यहां प्राकट्य हुआ। केरल में कालडी नामक गांव इस महान विभूति के जन्म से प्रकाशित हो उठा।

भगवान शंकर के आशीर्वाद के फलस्वरूप उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शंकर रखा गया। वर्ष की अवस्था में पहुंचते-पहुंचते ही इनके पिता परलोकवासी हो गए। 5 वर्ष की अवस्था में इन्हें पढऩे के लिए गुरुकुल भेजा गया।  भगवान शंकराचार्य की विलक्षण प्रतिभा और महानता का परिचय इनके बचपन से ही मिलने लगा। 7 वर्ष की आयु में ये सम्पूर्ण वेद-शास्त्रों में पारंगत होकर घर वापस आ गए। विद्याध्ययन समाप्त करने के बाद भगवान शंकराचार्य ने संन्यास लेना चाहा किंतु इनकी माता ने अनुमति नहीं दी। एक दिन अपनी माता के साथ नदी में स्नान करने गए। स्नान करते समय इन्हें एक मगर ने पकड़ लिया।

इन्होंने अपनी माता से कहा कि यदि आप मुझे संन्यास लेने की आज्ञा दे देंगी तो मगर छोड़ देगा। विवश होकर माता को संन्यास की अनुमति प्रदान करनी पड़ी। जाते समय माता की मृत्यु के समय उपस्थित रहने का वचन देकर यह संन्यास लेने के लिए चल दिए। भगवान शंकराचार्य ने गोविंद भगवत्पाद से संन्यास की दीक्षा ली और अल्पकाल में ही योगसिद्ध महात्मा हो गए। गुरु ने इन्हें काशी जाकर ब्रह्म सूत्र पर भाष्य लिखने की आज्ञा दी। काशी में भगवान शंकर तथा भगवान व्यास के भी दर्शन हुए और उनकी कृपा से इनकी 16 वर्ष की आयु 32 वर्ष हो गई। भगवान व्यास ने इनको अद्वैतवाद का प्रचार करने की आज्ञा दी।

तदन्तर भगवान शंकराचार्य ने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया और शास्त्रार्थ में विभिन्न मतवादियों को परास्त करके अद्वैतवाद की स्थापना की। यद्यपि इन्होंने अनेक मंदिर बनवाए किंतु चारों धामों में इनके 4 मठ विशेष प्रसिद्ध हैं। आज भी इनके द्वारा स्थापित मठों के प्रधान आचार्य शंकराचार्य के नाम से ही जाने जाते हैं। भगवान शंकराचार्य द्वारा बनाए ग्रंथों में ब्रह्मसूत्र-भाष्य, उपनिषद्-भाष्य, गीता-भाष्य, पञ्चदशी आदि प्रमुख हैं। इस प्रकार 32 वर्ष के अल्पकाल में अपने अभूतपूर्व ज्ञान से संसार को वेदांत का अभिनव प्रकाश प्रदान करके भगवान शंकराचार्य ने सम्पूर्ण मानव जाति का अनुपम कल्याण किया।

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