Sunday, 23 September 2012

श्राद्ध में

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पितृपक्ष में सूर्य कन्या राशि के दशवें अंश पर आता है और वहां से तुला राशि की ओर बढ़ता है। इसे कन्यागत सूर्य कहते हैं। जब सूर्य कन्यागत हो तो उस समय पितरों का श्राद्ध करना अति महत्वपूर्ण कहा गया है। प्रतिवर्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक श्राद्ध पक्ष मान्य रहता है। इस वर्ष यह 29 सितम्बर से 15 अक्तूबर तक रहेगा। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध पक्ष में दिवंगत पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान यज्ञ और भोजन का विशेष प्रावधान बताया गया है।

साल में जिस भी तिथि को वे  दिवंगत होते हैं, पितृपक्ष की उसी तिथि को उनके निमित्त विधि-विधान पूर्वक श्राद्ध कार्य सम्पन्न किया जाता है। दिवंगत पूर्वजों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किए दान को ही श्राद्ध कहा जाता है। ‘सुसंस्कृत व्यन्जनाद्यं च पयोदधिघृतान्वितम्, श्रद्धया दीयते यस्मात श्राद्धं तेन प्रकीर्तितम।।  अर्थात पकाए हुए शुद्ध पकवान व दूध, दही, घी आदि को श्रद्धापूर्वक पितरों के निमित्त दान करने का नाम ही श्राद्ध है। ‘ब्रह्मपुराण’ में कहा गया है ‘आयु: प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च।

प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितर:
श्राद्ध तर्पिता।।’अर्थात श्राद्ध के द्वारा प्रसन्न हुए पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष और स्वर्ग आदि प्रदान करते हैं। पितृश्वरों के आशीर्वाद से ही जन्म कुंडली में निर्मित पितृदोषों के दुष्परिणामों से बचा जा सकता है। आश्विन कृष्ण पक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाते हैं जबकि वार्षिक श्राद्ध एकोदिष्ट होते हैं। वसु, रुद्र और आदित्य श्राद्ध के देवता हैं। ये तीनों हमारे द्वारा किए गए श्राद्ध कर्म से तृप्त होकर मनुष्यों के पितरों को भी तृप्त करते हैं। याज्ञवल्क्य का कथन है कि श्राद्ध देवता श्राद्ध कत्र्ता को दीर्घ जीवन, आज्ञाकारी संतान, धन विद्या, संसार के सुख भोग, स्वर्ग तथा दुर्लभ मोक्ष भी प्रदान करते हैं।


पितरों की मनुहार:
‘विष्णु पुराण’ में कहा गया है कि श्राद्ध और तर्पण से तृप्त होकर पितृगण समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हैं। श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों के द्वारा ही होती है अत: श्राद्ध के अवसर पर दिवंगत पूर्वजों की मृत्यु तिथि को निमंत्रण देकर ब्राह्मण को भोजन, वस्त्र और दक्षिणा सहित दान देकर श्राद्ध कर्म करना चाहिए। इस दिन पांच पत्तों पर अलग-अलग भोजन सामग्री रखकर पंचबलि करें। इसके बाद अग्नि में भोजन सामग्री, सूखे आंवले और मुनक्का का भोग लगाएं। श्राद्ध में एक हाथ से पिंड और आहूति दें लेकिन तर्पण में दोनों हाथों से जल दें।


तर्पण (तिलांजलि):
श्राद्ध तिथि को स्नान करके पितरों के लिए दिया हुआ तिल मिश्रित जल भी उनके लिए अक्षय तृप्ति का साधक होता है। पितरों का तर्पण करने के पूर्व ओम आगच्छन्तु में पितर इमं गृश्न्तु जलान्जलिम।।’ मंत्र से उनका आह्वान करें। अब तिल के साथ पिता, पितामह, प्रपितामह और माता, मातामह, प्रमातामह के निमित्त तीन-तीन तिलांजलियां दें। तर्पण में दक्षिण की ओर मुख करके अंजली में कुश के साथ तिल मिश्रित जल लेकर पितृ तीर्थ मुद्रा (दाहिने अंगूठे के सहारे) से उसे जल में डाल दें और पुन: आकाश की तरफ गिराएं। पितरों का निवास आकाश और दक्षिण दिशा होता है।


श्राद्ध में क्या करें:
श्राद्ध अपने ही घर में करना चाहिए, दूसरे के घर में करना निषेध है। श्राद्ध केवल अपराह्न काल में ही करें। श्राद्ध में तीन वस्तुएं पवित्र हैं-दुहिता पुत्र, कुतपकाल (दिन का आठवां भाग) और काले तिल। श्राद्ध में तीन प्रशंसनीय बातें हैं-बाहर भीतर की शुद्धि,  क्रोध और जल्दबाजी नहीं करना। श्राद्ध काल में गीताजी, श्रीमद्भागवत पुराण, पितृसूक्त, पितृ संहिता, रुद्र सूक्त, ऐन्द्र मधुमति सूक्त का पाठ करना मन, बुद्धि और कर्म तीनों की शुद्धि के लिए बेहद फलप्रद है।


श्राद्ध काल में जपनीय मंत्र:
1.ओम क्रीं क्लीं ऐं सर्वपितृभ्यो स्वात्म सिद्धये ओम फट।। 
2. ओम सर्व पितृ प्रं प्रसन्नो भव ओम । 
3. ओम पितृभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधानम: पितामहेभ्य स्वधायिभ्य: स्वधा नम:। प्रपितामहेभ्य स्वधायिभ्य: स्वधा नम: अक्षन्न पितरो मीमदंत पितरोतीतृपंत पितर: पितर: शुन्दध्वम।। ओम पितृभ्यो नम: पितराय नम:।। 
इसके अलावा जिनकी जन्म पत्रिका में पितृदोष  हो तो वे पितृ पक्ष में नित्य ओम ऐं पितृदोष शमनं ह्नीं ओम स्वधा।।  नित्य मंत्र जाप के पश्चात तिलांजलि से अघ्र्य दें व किसी निर्धन को तिल दान अवश्य करें।


श्राद्ध में क्या नहीं करें:
‘पद्म पुराण’ और ‘मनुस्मृति’ के अनुसार श्राद्ध का दिखावा नहीं करें, उसे गुप्त रूप से एकांत में करें। धनी होने पर भी इसका विस्तार न करें और भोजन के माध्यम से मित्रता, सामाजिक या व्यापारिक संबंध स्थापित न करें। श्राद्ध के दिन घर में दही नहीं बिलोएं, चक्की नहीं चलाएं तथा बाल न कटवाएं। महाभारत के अनुसार बैंगन, गाजर, मसूर, अरहर, गोल लौकी, शलजम, हींग, प्याज, लहसुन, काला नमक, कालाजीरा, सिंघाड़ा, जामुन, पिपली, सुपारी, कुलपी, महुआ, अलसी, पीली सरसों और चना का प्रयोग श्राद्ध में निषिद्ध है।

पितृ पक्ष में कूप निर्माण, बावड़ी, बाग, वन का प्रारम्भ और देव प्रतिष्ठा व किसी भी प्रयोजन के निमित्त व्रत, उत्सव, उद्यापन, वधू प्रवेश आदि कार्य करना वर्जित है। घर में पेंट करना, नए वस्त्र खरीदना, मकान, विवाह और विवाह की बात चलाना भी वर्जित है। किसी भी नए काम की शुरूआत इन दिनों नहीं करनी चाहिए।


श्राद्ध कब न करें:
पूर्वजों की मृत्यु के प्रथम वर्ष में श्राद्ध नहीं करें। पूर्वाह्न में, शुक्ल पक्ष में, रात्रि में और अपने जन्म दिन में श्राद्ध नहीं करना चाहिए। कूर्म पुराण के अनुसार जो व्यक्ति अग्नि, विष आदि के द्वारा आत्महत्या करता है उसके निमित्त श्राद्ध तर्पण करने का विधान नहीं है। इसी प्रकार चतुर्दशी तिथि को श्राद्ध नहीं करना चाहिए। इस तिथि को मृत्यु प्राप्त पितरों का श्राद्ध दूसरे दिन अमावस्या को करने का विधान है।  चतुर्दशी को श्राद्ध करने  से अनिष्ट हो सकता है परंतु जिनके पितृ युद्ध में श से मारे गए हों उनका श्राद्ध चतुर्दशी को करने से वे प्रसन्न होते हैं और परिवारजनों पर आशीर्वाद बनाए रखते हैं।

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