Monday, 1 October 2012

माता पिता ऋण, पितृलोक,तर्पण

गीता   | वेद-पुराण पढो या सुनो | परिचय  |श्री राम |  

  अपना भविष्य खुद जाने 



इस संसार में अगर भगवान से भी अधिक ऋण किसी का हम पर होता है तो वह है हमारे माता-पिता का ऋण। माता-पिता ही बच्चों के लिए पूरा संसार होते हैं। गणेश जी ने अपने माता-पिता के चारों तरफ चक्कर लगाकर यह सिद्ध किया था कि माता-पिता के ईर्द-गिर्द ही हमारी पूरी दुनिया है। माता-पिता के कदमों में ही हमारी पूरी दुनिया बसती है। आज भी लोग अपने माता-पिता और पूर्वजों को अपनी यादों में बसा कर रखते हैं। भारतीय संस्कृति में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन की परम्परा है। श्रद्धापूर्वक मृतकों के निमित्त किए जाने वाले इस कर्म को श्राद्ध कहा जाता है और इस श्राद्ध को करने का सबसे सही समय पितृपक्ष माना जाता है।


अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक तर्पण देने का पर्व पितृ पक्ष कहलाता है। पितरों से तात्पर्य मृत पूर्वजों से है यानी लौकिक संसार से जा चुके माता, पिता, दादा, दादी, नाना, नानी आदि। शास्त्रों में इस पर्व का विशेष महत्व बताया गया है जिसमें संतानों से मिला तर्पण सीधे पुरखों को मिल जाता है।

पितृलोक की प्राप्ति

व्यक्ति जब देह छोड़ता है तो तीन दिन के भीतर वह पितृलोक चला जाता है। इसीलिए ‘तीज’ मनाई जाती है। कुछ आत्माएं 13 दिन में पितृलोक चली जाती हैं, इसीलिए त्रयोदशाकर्म (13वां) किया जाता है और कुछ सवा माह अर्थात् 37वें या 40वें दिन। फिर एक वर्ष पश्चात तर्पण किया जाता है।

पितृलोक के बाद उन्हें पुन: धरती पर कर्मानुसार जन्म मिलता है या वे ध्यानमार्गी रही हैं तो वे चक्र से मुक्त हो जाती हैं। हमारे जो पूर्वज पितृलोक नहीं जा सके या जिन्हें दोबारा जन्म नहीं मिला, ऐसी अतृप्त और आसक्त भाव में लिप्त आत्माओं के लिए अंतिम बार एक वर्ष पश्चात ‘गया’ में मुक्ति-तृप्ति का कर्म तर्पण और पिंडदान किया जाता है। गया के अतिरिक्त और कहीं भी यह कर्म नहीं होता है। उक्त स्थान का विशेष वैज्ञानिक महत्व है।


 
क्या कहते हैं वेद

यजुर्वेद में कहा गया है कि शरीर छोडऩे के पश्चात्य, जिन्होंने तप-ध्यान किया है वे ब्रह्मलोक चले जाते हैं अर्थात् ब्रह्मलीन हो जाते हैं। कुछ सतकर्म करने वाले भक्तजन स्वर्ग चले जाते हैं। स्वर्ग अर्थात् वे देव बन जाते हैं। राक्षसी कर्म करने वाले कुछ प्रेत योनि में अनंतकाल तक भटकते रहते हैं और कुछ पुन: धरती पर जन्म ले लेते हैं। जन्म लेने वालों में भी जरूरी नहीं कि वे मनुष्य योनि में ही जन्म लें। इससे पूर्व ये सभी पितृलोक में रहते हैं वहीं उनका न्याय होता है। 
ये हैं हमारे पितर

उक्त सभी हमारे पितर हैं। इस तरह जिन्हें हम जानते हैं और जिन्हें हम नहीं भी जानते हैं, सभी के लिए हम अन्न-जल को अग्नि को दान करते हैं। अग्नि उक्त अन्न-जल को हमारे पितरों तक पहुंचा कर उन्हें तृप्त करती है। श्राद्ध और तर्पण के जल और अग्नि के माध्यम से यह सुगंध रूप में गया भोजन उन पितरों तक पहुंच कर उन्हें तृप्त करता है।

श्राद्ध कर्म : पितृदोष से मुक्ति
वेदानुसार यज्ञ पांच प्रकार के होते हैं - 

(1) ब्रह्म यज्ञ (2) देव यज्ञ (3) पितृ यज्ञ (4) वैश्वदेव यज्ञ 

 (5) अतिथि यज्ञ। 

उक्त पांच यज्ञों को पुराणों और अन्य ग्रंथों में विस्तार से दिया गया है। उक्त पांच यज्ञ में से ही एक यज्ञ है पितृ यज्ञ। इसे पुराण में श्राद्ध कर्म की संज्ञा दी गई है।

पूर्वजों के कार्यों के फलस्वरूप आने वाली पीढ़ी पर पडऩे वाले अशुभ प्रभाव को पितृ दोष कहते हैं। पितृ दोष का अर्थ यह नहीं कि कोई पितृ अतृप्त होकर आपको कष्ट दे रहा है। पितृ दोष का अर्थ वंशानुगत, मानसिक और शारीरिक रोग और शोक भी होते हैं। घर और बाहर जो वायु है वह सभी पितरों को धूप, दीप और तर्पण देने से शुद्ध और सकारात्मक प्रभाव देने वाली बन जाती है।

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