Thursday, 10 January 2013

मानो या ना मानो


यहां कोई नहीं खोलता आभूषण की दुकान
बैजनाथ : हिन्दुस्तान में ऐसा कोई बाजार नहीं होगा जहां सोने के आभूषणों की दुकानें नहीं हैं। लेकिन जिला कांगड़ा का बैजनाथ कस्बा इस मामले में अपवाद है जहां आभूषणों की एक भी दुकान नहीं है। कहते हैं दुकानें तो यहां कई लोगों ने खोली मगर या तो इनको खोलने वाले उजड़ गए या फिर उनकी दुकानें तबाह हो गई। यही कारण है कि हिमांचल प्रदेश  के बैजनाथ कस्बे में कोई भी सुनार आज तक आभूषणों की दुकान खोलने का साहस नहीं कर पाया।


दिलचस्प तो यह है कि बैजनाथ से महज आधे किलोमीटर के फासले पर बसे पपरोला बाजार में आभूषणों की करीब 30 दुकानें हैं। बैजनाथ में सुनारों की दुकानें न होने के पीछे एक श्राप को कारण माना जाता है। बैजनाथ मंदिर के पुजारी सुरेंद्र आचार्च का कहना है कि मां पार्वती ने एक बार भगवान शिव से सोने का महल बनाने की प्रार्थना की थी इसके बाद शिव ने विश्वकर्मा के माध्यम से लंका में सोने का भवन बनवाया था। इस स्वर्ण महल में प्रतिष्ठा का कार्य चल रहा था तथा रावण के पिता विश्रवा एक पुरोहित के रूप में इस कार्य को संपन्न करवा रहे थे।


बाद में जब भगवान शिव ने पुरोहित विश्रवा से दक्षिणा के बारे में पूछा तो विश्रवा ने शिव से दान के रूप में सोने की लंका ही मांग ली तथा शिव इस मांग को ठुकरा नहीं पाए और उसी समय लंका का निर्माण करने वाले विश्वकर्मा के वेश में एक सुनार वहां पहुंच गया तथा उसने महल को बनाने में मेहनताना मांगा। जिस पर शिव ने उसे धन दे दिया तभी असली विश्वकर्मा वहां पहुंच गए। ऐसे में जब भगवान शिव माता पार्वती को सच्चाई का पता चला तो मां पार्वती ने गुस्से में आकर विश्वकर्मा के वेश आए सुनार को श्राप देते हुए कहा कि जिस भी स्थान पर मैं और भगवान शिव अर्द्धनारीश्वर रूप में होंगे तुम वहां कुछ नहीं कमा पाओंगे।

बैजनाथ मंदिर में भी भगवान शिव व माता पार्वती अर्द्धनारीश्वर रूप में विराजमान है। मान्यता है कि उस श्राप के कारण ही यहां कोई भी सुनार अपना कारोबार नहीं कर पाया। हालांकि यहां सुनारों के 5-6 परिवार हैं। मगर कोई भी आभूषण का कारोबार नहीं करता है।

Tuesday, 8 January 2013

gita ki booli: गीता से ज्योतिषीय उपचार

gita ki booli: गीता से ज्योतिषीय उपचार


गीता की टीका फेस बुक पर गीता शर्मा द्वारा बनाये गये पृष्ठ सनातन धर्म   पर अधिकतर ज्योतिषीय आधार पर आधारित अंदाज में देखने को मिली |मिलने पर कई लोगों ने गीता शर्मा 
जी  के सुर में सुर मिलाते हुए अपने अपने स्तर पर अपने खुद  के द्वारा  किये  गये प्रयोगों को बहुत सफलभी  बताया प्रीतम सिंह जी का कहना है कि दुख के समय वह राधा- स्वामी के डेरे ब्यास में  गये , उनकोनाम - दीक्षा  भी दी गयी परन्तु समस्या का कोई हल नही निकला |तब मेरे  ढाबे पर गीता शर्मा जी पधारीं और ढाबे पर लगी राधा - स्वामी डेरे वालों कि  फोटो जिसे मेने अपने दस गुरुओं के बीच स्थापित  कर रखा था कि और इशारा कर के पूछा यह गुरु जी  क्या इन दस गुरुओं से ज्यादा करनी वाले हैं ?मेने कहा  जी सुना तो ऐसा  ही है ,तो गीता जी ने कहा अगर तुम पर कोई विपति आये तो क्या पलक झपकते यह तुम्हें बचाने को ब्यास से यहाँ नही पहुंच सकते परन्तु यह दसो गुरु रक्षा  को आते  हैं | हमारी गीता में तो भगवान श्री कृष्ण ने ऐसे क्या इससे भी बड़े बड़े महा योधा गुरुओं को अर्जुन के हाथों मरवा डाला था क्यों  कि इन का गुरु कहलाना  उनको पसंद नही था |इसी बात को जान के गुरु जी ने ग्रन्थ साहिब को गुरू मानने की आज्ञा दी और समझाया की आपे -गुरू आपे चेलाजो भगवान को पसंद नही क्या यह दसों गुरू उसे पसंद करें गे ?गीता जी का एक एकप्रश्न मेरे दिमाग की बंद बती को जला रहा था , मन कह रहा था की यह साधारण सी दिखने वाली महिला कोई असाधारण महिला नही हो सकती अरे यह तो वही बातें कह रही है जो में आज नही वर्षों  से जानता  हूँ  पर कभी मैने उन पर अम्ल नही किया मेरी समस्या का हल भी यह बता सकती हो तो अछा हो |हिमत कर विन्रम भाव से मेने उन से पुछ ही लिया |माता जी तीन बेटियों की चिंता सताती रही कारोबार भी नही बेटियां पड़ा - लिखा दीं अब योग्य वर नही मिलता इसी से नाम - दान ले लिया पहले घर का खर्चा निकल आता था अब सत्संगी भाइयों पर हो जाता है कोई चाये -नाश्ता कर  रहा है तो कोई राधा -स्वामी कह कर खाना कहा जाता है में भी बड़े चाव से उन की सेवा में लग जाता हूँ पर मेरी समस्या जेसी थी वेसी ही रही आप ही कहिये मे क्या करू -क्या नाकरु| 
तब गीता जी ने कहा एक महीना गुरुद्वारे माथा टेकने को जाओ धुप दीप जला के गुरु ग्रन्थ साहिब की वाणी का श्रवण करो साथ साथ एक महीना सूरज को जल में चुटकी चावल इतनी ही चीनी दाल कर रोजाना चडाना शुरू करदो जब महीना हो जाए तब ग्रन्थ साहिब पर रूमाला और ग्रन्थि जी को वस्त्र भेंट कर देना कुछ दक्षिणा देकर माथा टेक कर अरदास कर देना अपने आप तेरी रक्षा वाहे गुरु जी ही करन गे |
गीता जी भोजन कर के जब पेसे देने को मेरे काउन्टर पर आयीं तो मेने पेसे लेने से इनकार किया और पांच सो का नोट उन को देना चाहा तो उन हों ने कहा देखो पेसे तो मेने देने है |पर किसी से उस ज्ञान का जो मुझे उस परमात्मा ने बख्शा हे उसका कोई मूल्य लेने का  मुझे कोई हक नही |क्या सूर्य आप से अपने प्रकाश की कोई कीमत माँगता है ?में निरुतर था वह चली गयीं ,दुबारा पधारें गी ऐसा वादा करके |
गीता जी के कहें अनुसार उपाए को करते अभी मुझे  बारह दिन ही हुए थे कि मर्री बेटियाँ ढाबे पर सब्जी लेने आ गयीं उस समय ढाबे पर कोई परिवार बेठा हुआ था बेटियाँ चलीं गयीं तो इस परिवार कि एक महिला ने मुझसे जानना चाहा कि यह ल्त्कियां जो अबी आयीं थी उन में नीले सूट वाली कोन से परिवार कि है |  मेने कहा कि मेरी बेटियाँ हैं फिर  क्या था मेरी तकदीर मेरी bchiyon के साथ ही बदल  गयी  |मेरी ओकात से कही ज्यादा बड़े सम्पन पड़े लिखे खनदान में बड़ी बेटी बिना दहेज के ही ब्याही गयी छं भर में वह फेक्टरियों कि मालकिन बन गयी मुझे मानो यकीन ही नही कि इतने अछे लोगों से मेरा नाता जुड़ सकता था | मेरे मन घर मोटल पर अब द्स्गुरुओं कि फोटो के अलावा किसी गुरु कि फोटो सिवाए मेग्जिन अखबार और रदी में ही पा सकते है |
यह है एक गीता से हुआ ज्योतिषीय उपचार आप कि क्या राये है ?