Friday, 12 April 2013

नवरात्र के नौ दिनों में माता के नौ रूपों की पूजा



नवरात्र के नौ दिनों में माता के नौ रूपों की पूजा करने का विशेष विधान है। नवरात्रों के प्रथम दिन उपवास कर कलश की स्थापना की जाती है। नवरात्र में विधि विधान से मां का पूजन करने से कार्य सिद्ध होते हैं और चित को शांति मिलती है। साथ ही इन दिनों में जप-पाठ, व्रत अनुष्ठान, यज्ञ, दान आदि शुभ कार्य करने से व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है। आइए माता के इन नौ रूपों से आपका परिचय करवाते हैं। 

द्वितीय : आरती मां ब्रह्मचारिणी


‘भोला-भाला रूप मां तेरा’
दर्शन तेरे साकार करें दाती-मां तू बड़ी मेहरबान!
मां ब्रह्मचारिणी! अम्बे मैया करे-हर विपदा का निदान!!
दर्शन तेरे साकार करें दाती....का निदान!!
तू माहेश्वरी, ललिता, गौरी-पदमा, दुर्गा, महाकाली तू!
तू जगजननी सबकी मैया, सूरज किरणों की लाली तू!!
गूंजे जयकारों से मंदिर-हो नित तेरा गुणगान!
दर्शन तेरे साकार करें दाती....का निदान!!
कठिन तप कर शिव को पाया-ऋषि-मुनियों ने तुझे ध्याया
हुईं मुरादें पूर्ण भक्तों की-दर तेरे जिस मन से आया!!
कमंडल, जपमाला हाथों में-मुकुट-मस्तक विराजमान!
दर्शन तेरे साकार करें दाती....का निदान!!
जागे लौ जप, त्याग की-आराधना जो मन से करता!
भोला-भाला रूप मां तेरा-झोलियां सुखों की भरता!!
कवि ‘झिलमिल’ करे तेरी आरती-दे हमको आत्मज्ञान!
दर्शन तेरे साकार करें दाती...का निदान!!




तृतीय : आरती मां चंद्रघंटा


‘युद्ध मुद्रा मां रूप है तेरा’
तुझको निहारें जी भर मैया-सुन लो दाती करुण पुकार!
मां चंद्रघंटा! शेरों वाली-तेरी जय-जय-जय जयकार!!
तुझको निहारें जी भर मैया ...जय जयकार!!
कोई पुकारे छत्रेश्वरी तुझको-मुकुटेश्वरी, अर्जिता पुकारें!
जिस रूप चाहे जो मैया-तू सबका जीवन संवारे!!
स्वर्ण रूप तन-आभा-दमके-अद्र्धशशि मस्तक चमकार!
तुझको निहारें जी भर मैया...जय-जयकार!!
निडरता मार्ग करे लक्षित-परस्पर प्यार संदेश मिले!
रहें दूर द्वेष, भेदभाव से श्रद्धा-विश्वास परिवेश मिले!!
अस्त्र-शस्त्र दसों हाथ उठाए-त्रिशूल, गदा, धनुष, तलवार!
तुझको निहारें जी भर मैया...जय-जयकार!!
युद्ध मुद्रा मां रूप है तेरा-शेर सवारी, गुफा में डेरा!
सच्चे मन तेरी ज्योति जलाए-आए आंगन सुख का सवेरा!!
कवि ‘झिलमिल’ करें तेरी आरती- तन-मन-धन सौ-सौ बार!
तुझको निहारें जी भर मैया...जय-जयकार!!


चतुर्थ : आरती मां कूष्मांडा


‘अंधकार हरण कर दिया उजाला’
सोहणा-सोहणा भवन मां तेरा-भवतारिणी तेरी माया!
मां कूष्मांडा! जग जननी, सृष्टि सृजना, तेरी छाया!!
सोहणा-सोहणा भवन मां तेरा...तेरी छाया!!
भवानी, कृपालिनी, महादेवी , सुपथा, गौरी, महाकाली तू!
सूर्यलोक की तू स्वामिनी, जोश, उमंग, दे खुशहाली तू!!
अंधकार हरण कर, दिया उजाला-मैया तूने ब्रह्मांड रचाया!
सोहणा-सोहणा भवन मां तेरा...तेरी छाया!!
पाए वरदान यश, बल वृद्धि-शरण तिहारी दीया जलाए!
करे उपासना पावन मन से, घर-आंगन उसका महकाए!!
टपके क्लश से अमृतधारा, झरना प्यार का तूने बहाया!
सोहणा-सोहणा भवन मां तेरा...तेरी छाया!!
कल्याण विश्व का करने वाली, करे सारे जग की रखवाली!
तेरी भक्ति की शक्ति मैया, सबकी झोलियां भरने वाली!
कवि ‘झिलमिल’ करे तेरी आरती-दर तेरे मां शीश झुकाया!
सोहणा-सोहणा भवन मां तेरा...तेरी छाया!!






पंचम : आरती मां स्कंधमाता


 ‘देवासुर संग्राम की बनी सेनापति’
मां की ममता का रूप सिलौना-छवि तेरी अति न्यारी!
मां स्कंधमाता! वात्सल्य देवी-सूरत तेरी लागे प्यारी!!
मां की ममता का रूप सिलौना...लागे प्यारी!!
वैष्णो, अम्बिका, दुर्गा, भवानी-हर रूप तेरा नूरानी!
ब्राह्मणी, पूतना, महादेवी तू-सारी दुनिया तेरी दीवानी!!
बैठे गोद में बाल स्कंध-हो फूलों की जैसे पिटारी!
मां की ममता का रूप सिलौना...लागे प्यारी!!
देवासुर संग्राम की बनी सेनापति-किया देवताओं का उद्धार!
मिले पुराणों में यह वर्णन-शक्तिधर का रूप संचार!!
मोर सवारी, कमल पुष्प बिछौना-भुजाएं वरमुद्रा तिहारी!
मां की ममता का रूप सिलौना...लागे प्यारी!!
द्वार मोक्ष का तू दिखलाती-करे उपासक दिल से आह्वान!
हर विपदा तू हर लेती-मंजिल की बनती सौपान!!
कवि ‘झिलमिल’ करे तेरी आरती-तुझको ध्याए दुनिया सारी!
मां की ममता का रूप सिलौना...लागे प्यारी!!


षष्टम : आरती मां कात्यायनी


‘खडग़धारिणी कलिका, मातंगी तू’
चारों ओर जब पृथ्वी पर-आतंक महिषासुर का था छाया!
लिया अवतार कात्यायनी ने रूप उग्र धारण कर मिटाया!!
चारों ओर जब पृथ्वी पर...कर मिटाया!!
खडग़धारिणी, कलिका, मातंगी तू जगदम्बे महाकाली मैया!
सुपथा, विंध्यवासिनी, बलशाली-लगाई पार सबकी नैया!!
लिया जन्म ऋषि कात्य के घर-सारे जग को चमकाया!
चारों ओर जब पृथ्वी पर...कर मिटाया!!
वर मुद्रा उठा हाथ तुम्हारा-करे जो भक्ति मिले सहारा!
जोत जलाए करे आराधना-साधक पथ फैले उजियारा!!
शेर सवारी करे तू मैया-रूप पराक्रमी सबको भाया!
चारों ओर जब पृथ्वी पर...कर मिटाया!!
पाप-संताप से देती मुक्ति-दिखलाती तू आलौकिक शक्ति!
हर विपदा को हरने वाली-सबकी झोली खुशियों से भरती!!
कवि ‘झिलमिल’ करे तेरी आरती सौ-सौ बार शीश नवाया!
चारों ओर जब पृथ्वी पर...कर मिटाया!!





सप्तम : आरती मां कालरात्रि



‘तू ज्वालामुखी ज्वाला बरसाती’
बिखरे बाल, घनी काली काया-कैसा तूने मां रूप बनाया!
मैया कालरात्रि पुकारे तुझको-जिसने ध्याया, परम सुख पाया!!
बिखरे बाल, घनी काली काया...परमसुख पाया!!
तू ज्वालामुखी ज्वाला बरसाती-वागेश्वरी, अम्बिका कहलाती!
त्रिनेत्री, महाकाली, अर्जिता तू-सब भक्तों की आंख सुहाती!!
करे स्मरण जो दिल से तेरा-घर आंगन उसका महकाया!
बिखरे बाल, घनी काली काया...परमसुख पाया!!
भूत-पिशाच निकट न आते-श्रद्धा से तेरी जोत जलाते!
चमकती कटार लिए हाथों में-मोती माला के चम-चमाते!!
गदर्भ की तू करे सवारी-पुण्य का मार्ग दिखालाया!
बिखरे बाल, घनी काली -काया...परमसुख पाया!!
भक्तों का उद्धार करे तू-सपनों को साकार करे तू!
निर्धन-धनवान करे अर्चना-हर विपदा को पल में हरे तू!!
कवि ‘झिलमिल’ करे तेरी आरती-मन दर्शन को अकुलाया!
बिखरे बाल, घनी काली काया...परमसुख पाया!! 





अष्टम : आरती मां महागौरी

वृषभ सवारी भाती तुझको’
जय-जय जगदम्बे महाशक्ति-मनु मनोहर रूप तुम्हारा!
अष्टम रूप तेरा महागौरी-देती तू मां सबको सहारा!!
जय-जय जगदम्बे महाशक्ति...सबको सहारा!
वज्रधारिणी, वैष्णवी, जगजननी-नीलग्रीवा, कामाक्षी, बलशाली!
अम्बा, लक्ष्मी, तू मां दुर्गा-घर आंगन में लाती खुशहाली!!
भागे कोसों दूर दरिद्रता-तन-मन-धन जिसने वारा!
जय-जय जगदम्बे महाशक्ति...सबको सहारा!!
महके फूलों-सा तन दमके-कानों में प्यारे कुंडल चमकें!
वृषभ सवारी भाती तुझको-शंख, त्रिशूल, डमरू हस्तन में!!
सिजदे करे, तेरी जोत जलाए-चमकाए किस्मत का तारा!
जय-जय जगदम्बे महाशक्ति...सबको सहारा!!
हर मुश्किल को आसां करती-भक्तों की तू झोलियां भरती!
तिलक लगाए तुझे पुष्प चढ़ाएं- कदम-कदम हर विपदा हरती!!
कवि ‘झिलमिल’ करे तेरी आरती-चले तेरे दम जहां ये सारा!
जय-जय जगदम्बे महाशक्ति....सबको सहारा!!




नवम : आरती मां सिद्धिदात्री


‘सबको देने आई वरदान सिद्धिदात्री’
जप लो, जप लो प्यारे भक्तो-जप लो शेरों वाली का नाम!
नवरात्र नवम रूप सिद्धिदात्री-आई देने सबको वरदान!!
जप लो, जप लो प्यारे भक्तो...सबको वरदान!
मंगला, मनसा, ललिता, मुकुटेश्वरी-तू सारे जग की राजेश्वरी!
वज्रहस्ता, योगिनी, नारायणी-गौरी, लक्ष्मी तू हृदयेश्वरी!!
सौ हाथ तेरे देने वाले-अजब आलौकिक तेरी शान!
जप लो, जप लो प्यारे भक्तो...सबको वरदान!!
तू अमृत का रसपान कराए-लौ जिसको तेरी लग जाए!
मिले आंचल की शीतल छाया-मनवांछित मंजिल मिल जाए!!
लाखों भक्त मां ध्याएं तुझको-देना सफलताओं की सौपान!
जप लो, जप लो प्यारे भक्तो...सबको वरदान!!
चक्रधारिणी, शंख वादिनी मैया-रिद्धि-सिद्धि से करे भरपूर!
ओढ़े आंगन रंग बसंती चोला-महके चमन मैया तेरे नूर!!
कवि ‘झिलमिल’ करे तेरी आरती-करना क्षमा बंदा मैं अनजान!
जप लो, जप लो प्यारे भक्तो...सबको वरदान!!

Tuesday, 2 April 2013

पत्नी के अपमान का फल




राजा प्रसिचेत ने किसी कारणवश रुष्ट होकर अपनी पत्नी का परित्याग कर दिया। यह बात सर्वत्र फैल गई। प्रशासन में धीरे-धीरे अव्यवस्था फैलने लगी। लोग राजाज्ञा का खुलेआम उल्लंघन करने लगे। राज्य की व्यवस्थाएं अस्त-व्यस्त हो गईं। चारों ओर उत्पात होने लगे। राज्य की सीमा पर शत्रुओं ने आक्रमण कर दिया।

महाराज उसे रोकने के लिए सेना सहित जा रहे थे। मार्ग में महार्षि उद्दालक का आश्रम पड़ा तो वह उनसे मिलने के लिए रुके। महार्षि ने उनके शासकोचित  सम्मान की तैयारी की, लेकिन एक शिष्य ने जब पत्नी त्याग की बात ऋषि को बता दी, तो उन्होंने सम्मान की तैयारी स्थगित कर दी और साधारण व्यक्ति जैसा व्यवहार ही उनसे किया।

महाराज प्रसिचेत ने जब इस संबंध में पूछा तो महार्षि बोले, ‘‘राजन्! जो अपनी स्त्री का परित्याग कर देता है, उसे धर्म छोड़कर चला जाता है और धर्म द्वारा त्यागा हुआ मनुष्य सम्मान, सुख-शांति से भी रहित हो जाता है। देवताओं की साक्षी में स्वीकार की हुई पत्नी का त्याग कर आपने जो पाप किया है, उसके फलस्वरूप आपका अब सम्मान एवं सौभाग्य भी समाप्त होने वाला है।’’

राजा ने अपनी भूल समझी और पत्नी को अपनाया। उसके बाद से शासन की व्यवस्था भी ठीक हो गई। क्रोध का ही एक स्वरूप अहंकार है। कटुभाषण एवं दुव्र्यवहार भी कुसंस्कारी व्यक्तियों में ही देखे जाते हैं। इनका परिणाम भी क्रोध के समान ही अहितकर है।      
          

चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी शीतला अष्टमी के नाम से प्रसिद्घ है।

चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी शीतला अष्टमी के नाम से 

प्रसिद्घ है। 

इस दिन मां शीतला का पूजन किया जाता है तथा कच्ची लस्सी मां शीतला को चढ़ा कर आशीर्वाद पाया जाता है। कंजक पूजन करके परिवार के मंगलमय भविष्य की कामना की जाती है। मां शीतला के व्रत से बीमारियों से रक्षा होती है तथा किसी प्रकार का शारीरिक कष्ट वर्ष भर नहीं होता।

पोराणिक मान्यता अनुसार 

  माता शीतला जी की उत्पत्ति भगवान ब्रह्मा जी से हुई थी। ब्रह्मा जी नेमाता शीतला को धरती पर पूजे जाने के लिए भेजा था । देवलोक से धरती पर मां शीतला अपने साथ भगवान शिव के पसीने से बने ज्वरासुर को अपना साथी मानकर लाईं। तब उनके पास दाल के दाने भी थे। 

उस समय के राजा विराट ने माता शीतला को अपने राज्य में रहने के लिए कोई स्थान नहीं दिया तो माता शीतला क्रोधित हो गईं। उनके क्रोध की ज्वाला से राजा की प्रजा के शरीर पर लाल-लाल दाने निकल आए और लोग उस गर्मी से संतप्त हो गए तो राजा को अपनी गलती का एहसास हो गया। 


उन्होंने माता शीतला से माफी मांगकर उन्हें उचित स्थान दिया। लोगों ने माता शीतला के क्रोध को शांत करने के लिए ठंडा दूध एवं कच्ची लस्सी चढ़ाई और माता शांत हुईं। तबसे हर साल शीतला अष्टमी पर लोग मां का आशीर्वाद पाने के लिए ठंडे-बासी भोजन का प्रसाद मां पर चढ़ाने लगे और व्रत करने लगे।

क्या है पुण्य फल? 


इस दिन माता शीतला का पूजन करने से परिवार के लोग स्वस्थ एवं निरोग रहते हैं तथा माता शीतला अपने बच्चों पर कृपा करते हुए ठंडे झोंके प्रदान करती हैं ताकि किसी प्रकार का रोग परिवार के किसी सदस्य को न सताए। वैसे भी शीतलाष्टमी गर्मी के मौसम से पहले आती है तथा आगामी भीषण गर्मी से बचने के लिए पहले ही माता शीतला का पूजन करके उनकी कृपा प्रसाद रूप में प्राप्त की जाती है। इस व्रत में मां शीतला का पूजन किया जाता है तथा उन्हें ठंडी एवं बासी वस्तुएं चढ़ाई जाती हैं।


 कैसे होता है व्रत?


अष्टमी से पहले दिन सप्तमी तिथि यानी 2 अप्रैल को शाम को सूर्य ढलने के पश्चात तेल और गुड़ में खाने-पीने की वस्तुएं तैयार की जाएं जिनमें मीठी रोटी, मीठे चावल, गुलगुले, बेसन एवं आलू आदि भर कर नमकीन पूरियां तैयार कर सकते हैं। मां शीतला को अष्टमी के दिन मंदिर में जाकर कच्ची लस्सी के साथ सभी चीजों का भोग लगाया जाता है। 

मीठी रोटी के साथ दही और मक्खन, कच्चा दूध, भिगोए हुए काले चने, मूंग और मोठ आदि मां का भंगूर भी प्रसाद रूप में चढ़ाने की परम्परा है। माता शीतला को भोग लगाने के बाद मंदिर में बनी विभिन्न पिंडियों पर भी कच्ची लस्सी चढ़ाई जाती है तथा भगवान शिव के मंदिर में शिवलिंग पर कच्ची लस्सी चढ़ाकर आशीर्वाद लिया जाता है। 

कंजक पूजन की परम्परा

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वैसे तो भारत में हिन्दुओं के अनेक धार्मिक आयोजनों पर कंजक पूजन की परम्परा है परंतु नवरात्रों में इसका विशेष महत्व होता है। तभी तो कुछ लोग प्रत्येक नवरात्र में कंजक पूजन करते हैं। ऐसे ही चैत्र मास में शीतला अष्टमी पर कंजक पूजन करने की परम्परा है। माता को पहले दिन की बासी अथवा ठंडी वस्तुओं का भोग लगाने के बाद कंजक पूजन करके माता का आशीर्वाद लिया जाता है।

गर्म वस्तुओं का सेवन वर्जित है माता शीतला के पूजन में किसी प्रकार की गर्म वस्तु का न तो सेवन किया जाता है तथा न ही घर में उस दिन चूल्हा जलाया जाता है। यहां तक कि चाय भी नहीं पी जा सकती तथा पहले दिन बनाया गया भोजन ही बिना गर्म किए खाने की परम्परा है। ठंडी वस्तुएं खाने से ही व्रत पूरा होता है।



क्या लेकर आएं घर?

माता शीतला के मंदिरों में भारी मेला लगता है जहां जाकर भक्तजन मां शीतला का पूजन करते हैं। मेले में से हरे रंग का छोलिया तथा बेर प्रसाद के रूप में लाना शुभ माना जाता है। बच्चों के लिए मिट्टी के खिलौने घर लाने की परम्परा बहुत पुरानी है। माता पर चढ़ाई गई लस्सी का कुछ भाग लाकर घर के सभी ओर छिड़का जाता है, जो माता के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। 
पूजा जाता है जेठा मंगल

कुछ लोग तो फाल्गुन मास की पूर्णिमा से तथा कुछ लोग फाल्गुन मास की संक्रांति से माता शीतला पर लस्सी चढ़ाना शुरू कर देते हैं। वे महीना भर माता शीतला की पूजा करते हैं। माता शीतला का पूजन होली के बाद पहले मंगलवार से भी किया जाता है क्योंकि उस दिन जेठा मंगलवार पूजने की परम्परा भी काफी पुरानी चल रही है। 

सुसंस्कार कैसे हो?

सभी अभिभावक चाहते है की उनका बच्चा सुसंस्कारित हो,बच्चे की प्रथम पाठशाला और शिक्षक होते हैं उसके माता-पिता। आदर्श जीवन का तत्त्वज्ञान बच्चों को सिखाना होता है। बच्चे को जीवन के लिए दिशा दर्शन करने वाला सर्व संस्कार धार्मिकता के आधार पर ही होने चाहिए । 

आज के अधिकांश अभिभावक पश्चिमी संस्कृति की धुन पर भोगवादी बन गये है। अत: उनके प्रभाव से बच्चों पर भी उन्हीं विचारों का प्रभाव पड़ता है। पश्चिमी संस्कृति के आक्रमण एवं स्वसंस्कृति के विस्मरण के कारण आज के बच्चे किसी की सुनते ही नहीं है। ये सुसंस्कार कैसे हो? इनकी शुरूआत करें अपने बच्चे के जन्मदिन मनाने की पद्धति से पाश्चत्य की धुन पर थिरकने की बजाय भारतीय मान्यताओं के अनुरूप-
  
-जन्मदिन पर स्नान करने के बाद नए वस्त्र पहनें। 

-माता-पिता तथा बड़ों का आर्शीवाद लें।

-कुलदेवता अथवा कुलदेवी की पूजा करें अगर संभव हो तो उनका अभिषेक करें।

-अपने इष्ट देवता की नाम माला जाप करें।

-दान-पुण्य करें।

-माता को चाहिए बच्चे के जन्मदिन पर उसकी आरती उतारें। 

-आरती के उपरांत कुलदेवता अथवा अपने इष्ट का स्मरण कर बच्चे के सिर पर तीन बार अक्षत डालें।

-फिर उसे मिठाई अथवा घर पर कोई मीठा पदार्थ बना कर खिलाएं ।

-बच्चे की मंगलकामना के लिए प्रार्थना करें। 

-अंत में बच्चे को कुछ भेंट दें,बच्चा ईश्वर से मिला हुआ प्रसाद जान कर मिले हुए तोहफो को सिर माथे पर लगाए।

Monday, 1 April 2013

‘साइलैंस इज गोल्डन’





*मन को शोर-शराबे से मुक्त तथा सोच की शुद्धता के लिए चुप्पी धारण करें। एक साफ मन विचारों को इधर-उधर भटकने से बचा कर सही दिशा में संचालित करता है।

*चुप्पी धारण करने से आपकी अंदरूनी ताकतों का विस्तार होता है तथा आप और बुद्धिमान होते हैं। हम सब में सहज ज्ञान होता है, परन्तु सिर में न खत्म होने वाले व्यर्थ के शोर के चलते हम इस अमूल्य उपहार तक पहुंच नहीं बना पाते। इस कारण बेचैनी या ङ्क्षचता, संशय तथा अच्छे निर्णय लेने में हमारी अक्षमता में बेतहाशा वृद्धि होती है। चुप के माध्यम से हम अपने उपचेतन (सब-कांशियस) मन में गहरे तक उतर सकते हैं और खुशी, संतुलन तथा बुद्धिमता प्राप्त कर सकते हैं।

*बेचैनी या चिंता घटाने का एक ढंग है चुप्पी  धारण करना विशेषकर तब जब यह अनुलोम-विलोम प्राणायाम के कुछ राऊंड्स के बाद धारण की जाए। तंग करने वाले विचार आपके पेट में गांठें पैदा कर सकते हैं और नकारात्मकता की भावना पैदा कर सकते हैं। ये लक्षण उस बेचैनी के हैं जिसका अनुभव आजकल बड़े शहरों के लोग करते हैं। बेचैनी आपकी खुशी तथा सुरक्षा की भावना को नष्ट कर सकती है। इसे मैडीटेशन तथा प्रोफैशनल सहायता से दूर करें।

*चुप्पी से आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और साथ ही आंतरिक विश्वास बढ़ता है जो ऐसे विश्व में इतना महत्वपूर्ण है जो निरंतर आपको सीखने और न सीखने हेतु बाध्य करता है।

*किसी समस्या के हल का सबसे आसान तरीका है कि इससे खुद को मुक्त करके चुप हो जाएं। किसी समस्या से चिपके रहना अत्यधिक बाधा पैदा  करने वाला हो सकता है। कुछ घंटों तक चुप्पी धारण किए रहें तो हल अपने आप आपके दिमाग में कहीं से आ जाएगा। वह हल इतना सही और स्पष्ट होगा कि आपको यह सोच कर हैरानी होगी कि वह पहले आपके दिमाग में क्यों नहीं आया।

*संसार का प्रत्येक धर्म चुप की शक्ति का प्रचार करता है। चुप का पथ कई हजार वर्षों से जांचा-परखा जा चुका है। सिर्फ इस बात की जरूरत है कि खुद को इसकी प्रभावशीलता याद दिलाते रहें।

कृप्या शांत रहें 
वैदिक काल से ही ऋषि-मुनि और विद्वान मौन रहने के फायदे जानते थे। मौन हर मर्ज का इलाज है, कहते हैं न ‘एक चुप, सौ सुख’ यानी  एक चुप अपने आप मे सौ सुख समेटे होती है। क्रोध को भी आप मौन से जीत सकते हैं। कहते हैं न ‘एक मौन सौ को हरावे’। एक चुप में इतनी ताकत होती है कि वह सौ योद्धाओं को हरा सकता है। इससे पारिवारिक जीवन पर बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है। बोलने में हमारी काफी ऊर्जा नष्ट हो जाती है, इस ऊर्जा को बचाने के लिए प्रतिदिन कुछ वक्त मौन रह कर बिताना चाहिए। इससे मानसिक तनाव तो कम होता ही है साथ ही स्वास्थ्य को भी फायदा मिलता है।

गांधी जी तो बाकायदा मौन व्रत रखते थे। प्रात:काल और सायंकाल जितनी देर संभव हो सके मौन रहना चाहिए। सुबह जल्दी उठें और टी.वी., रेडियो, म्यूजिक सिस्टम या मोबाइल फोन न चलाएं। प्राणायाम के कुछ चरण करें। यदि आपके मन में कोई विचार पनपता है तो इसे फलने-फूलने दें। किसी भी प्रकार की उत्तेजना पर ध्यान न दें। कुछ ही मिनटों के भीतर आप अपने अंदर की चुप के साथ संपर्क साध लेते हैं और ऐसी शांति व खुशी महसूस करते हैं जैसी पहले कभी न की हो। सुबह-सुबह मौन रहने से मन एकाग्र रहता है और रोजमर्रा के खास कामों को हम ठीक से कर पाते हैं। दिनभर के कई जरूरी काम मौन रहकर भी किए जा सकते हैं। शाम के समय मौन रहने से दिनभर के कार्य से जो मानसिक तनाव उत्पन्न होता है उससे मुक्ति मिलती है और मन शांत रहता है

आप ने कितनी बार यह अंग्रेजी वाक्यांश सुना है ‘साइलैंस इज गोल्डन’ (चुप्पी स्वर्णिम होती है) और इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया है कि क्या यह अब भी सच है? यह बात अक्सर लोगों को चक्कर में डाल देती है क्योंकि लोगों को अपने संगे-साथियों से ढेर सारी प्रशंसा और अटैंशन मिलती है। ध्वनि रहित होने का मंत्र जैसे बीते समय की बात हो गई है क्योंकि जो लोग अधिक बातचीत नहीं करते उन्हें अलग-सा और वैरागी माना जाता है परन्तु एक ऐसे युग में जहां आपके मन में तथा बाहर शोर ही शोर है, वहां चुप्पी आपके बचाव का पथ होना चाहिए।

विजयी होना मनुष्यों में स्वाभाविक है

हम जीतने के लिए ही बने हैं। जीत की प्राप्ति के लिए जरूरत है एक उद्देश्य निर्धारित करने की। जीत के पथ पर अपना ध्यान केंद्रित रखें और अपने वास्तविक ‘स्वयं’ से जुड़ें।

विजयी होना मनुष्यों में स्वाभाविक है
विजयी होना सभी मनुष्यों के लिए अस्तित्व की एक प्राकृतिक अवस्था है। स्वाभाविक तौर पर हम जो भी करते हैं उसमें सफल रहने की हम सब को आवश्यकता होती है। हम ब्रह्मांड, इसके रचयिता, जो हमारी जरूरतों को पूरा करता है, के साथ हाथ से हाथ मिलाकर काम करते हुए जीवन में जीत प्राप्त कर सकते हैं।

कौन-सी चीज विजेताओं को दूसरों से अलग करती है?
वे दृढ़ निश्चयी होते हैं : सबसे पहले विजेता कभी भी मैदान छोडऩे वाले नहीं होते। वे निराशा तथा विपरीत परिस्थितियों का सामना करने से पीछा नहीं छुड़ाते। वे हर प्रकार की मुश्किलों का सामना करते हुए आगे बढ़ते रहते हैं।

उनके पास दृष्टि होती है: विजेताओं में अपने उद्देश्यों के प्रति स्पष्टता होती है और उन्हें पूरा करने के लिए सोच भी है।

वे हमेशा सकारात्मक सोचते हैं : विजेता की मानसिक स्थिति हमेशा सकारात्मक होती है, बहुत तथा हमेशा। यह हमारी सकारात्मक सोच तथा स्पष्ट दृढ़ता ही है जो हमारे लिए काम करती है।

विजयी लोगों में अत्यधिक दृढ़ता होती है : सफल लोगों में जो बात एक समान होती है वह है अत्यधिक दृढ़ता। स्पष्ट तथा ताकतवर दृढ़ता से पर्वतों पर फतेह हासिल की जा सकती है और इससे आपकी इच्छाओं की पूर्ति के सब दरवाजे खुलते हैं। जब
स्पष्टता, समर्पण तथा दृढ़ता एक साथ होते हैं तो सब कुछ अच्छा होता है।

उनमें दृढ़ इच्छाशक्ति होती है : विजयी होने का अर्थ दृढ़ता तथा इच्छा से है। इसका संबंध खुद की सच्ची परिभाषा से है, जीवन के उद्देश्य से है और जीने से है। जो भी व्यक्ति अपनी आत्मा के प्रति सच्चा होने की इच्छा रखता है और जीवन के खेल  में विजयी होना चाहता है उसके लिए किसी भी नकारात्मक सोच का कोई महत्व नहीं होता। आप विजयी कैसे बन सकते हैं हम में से सब विजेता बन सकते हैं।
आइए जानें कैसे :
1. आप क्या चाहते हैं इसके बारे में जानें : सबसे पहले हमें इस बात की जानकारी की जरूरत है कि हम अपनी जिंदगी में क्या चाहते हैं और इसे कैसे जीता जा सकता है।

2. अपने सफर को दृश्यमान करें : जब हम एक बार कोई निर्णय कर लेते हैं तो अपेक्षित फल प्राप्त करने के लिए हमें उसे दृश्यमान करने की शक्ति मिल जाती है।  हम अपने उद्देश्यों को दृश्यमान कर सकते हैं। अपने मानसिक समर्पण, प्रतिबद्धता तथा अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सकारात्मकता को ताकतवर बना सकते हैं।

3. हमेशा अपना ध्यान केंद्रित रखें : यदि हम मानसिक तौर पर काफी तेज हैं और जीवन में जो कुछ चाहते हैं उस पर ध्यान केंद्रित रखने की पहुंच रखते हैं, तब यकीनन हम विजेता होंगे। जिन लोगों को अपने उद्देश्यों को दृश्यमान करने में मुश्किल आती हो उन्हें सबसे पहले अपने मन को केंद्रित करने से शुरूआत करनी होगी।
4. मैडीटेशन करें : रोजाना आधार पर मैडीटेशन का अभ्यास करें। मैडीटेशन, प्रार्थना तथा परमात्मा से बातचीत का अर्थ सिर्फ मुश्किल समय या आपदाओं के वक्त से ही नहीं है। मैडीटेशन के असली फलों को निरंतर अभ्यास से देखा जा सकता है। जब आप ध्यान लगाते हैं तो आप सकारात्मक ऊर्जा के लिए ही स्पेस बना रहे होते हैं। उस स्पेस में आपकी चीजों को दृश्यमान करने या सोचने की क्षमता बहुत गहरे तक आपके उपचेतन (सब कांशियस) में पहुंच जाती है। तब अपनी रोजाना रूटीन में आप सही स्थान, सही समय तथा सही कार्य मन से कर रहे होते हैं। अधिकतर लोग इसे इत्तेफाक मानते हैं। हम इसे जिंदगी के खेल को जीतने का नाम देते हैं।