Monday, 1 April 2013

‘साइलैंस इज गोल्डन’





*मन को शोर-शराबे से मुक्त तथा सोच की शुद्धता के लिए चुप्पी धारण करें। एक साफ मन विचारों को इधर-उधर भटकने से बचा कर सही दिशा में संचालित करता है।

*चुप्पी धारण करने से आपकी अंदरूनी ताकतों का विस्तार होता है तथा आप और बुद्धिमान होते हैं। हम सब में सहज ज्ञान होता है, परन्तु सिर में न खत्म होने वाले व्यर्थ के शोर के चलते हम इस अमूल्य उपहार तक पहुंच नहीं बना पाते। इस कारण बेचैनी या ङ्क्षचता, संशय तथा अच्छे निर्णय लेने में हमारी अक्षमता में बेतहाशा वृद्धि होती है। चुप के माध्यम से हम अपने उपचेतन (सब-कांशियस) मन में गहरे तक उतर सकते हैं और खुशी, संतुलन तथा बुद्धिमता प्राप्त कर सकते हैं।

*बेचैनी या चिंता घटाने का एक ढंग है चुप्पी  धारण करना विशेषकर तब जब यह अनुलोम-विलोम प्राणायाम के कुछ राऊंड्स के बाद धारण की जाए। तंग करने वाले विचार आपके पेट में गांठें पैदा कर सकते हैं और नकारात्मकता की भावना पैदा कर सकते हैं। ये लक्षण उस बेचैनी के हैं जिसका अनुभव आजकल बड़े शहरों के लोग करते हैं। बेचैनी आपकी खुशी तथा सुरक्षा की भावना को नष्ट कर सकती है। इसे मैडीटेशन तथा प्रोफैशनल सहायता से दूर करें।

*चुप्पी से आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और साथ ही आंतरिक विश्वास बढ़ता है जो ऐसे विश्व में इतना महत्वपूर्ण है जो निरंतर आपको सीखने और न सीखने हेतु बाध्य करता है।

*किसी समस्या के हल का सबसे आसान तरीका है कि इससे खुद को मुक्त करके चुप हो जाएं। किसी समस्या से चिपके रहना अत्यधिक बाधा पैदा  करने वाला हो सकता है। कुछ घंटों तक चुप्पी धारण किए रहें तो हल अपने आप आपके दिमाग में कहीं से आ जाएगा। वह हल इतना सही और स्पष्ट होगा कि आपको यह सोच कर हैरानी होगी कि वह पहले आपके दिमाग में क्यों नहीं आया।

*संसार का प्रत्येक धर्म चुप की शक्ति का प्रचार करता है। चुप का पथ कई हजार वर्षों से जांचा-परखा जा चुका है। सिर्फ इस बात की जरूरत है कि खुद को इसकी प्रभावशीलता याद दिलाते रहें।

कृप्या शांत रहें 
वैदिक काल से ही ऋषि-मुनि और विद्वान मौन रहने के फायदे जानते थे। मौन हर मर्ज का इलाज है, कहते हैं न ‘एक चुप, सौ सुख’ यानी  एक चुप अपने आप मे सौ सुख समेटे होती है। क्रोध को भी आप मौन से जीत सकते हैं। कहते हैं न ‘एक मौन सौ को हरावे’। एक चुप में इतनी ताकत होती है कि वह सौ योद्धाओं को हरा सकता है। इससे पारिवारिक जीवन पर बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है। बोलने में हमारी काफी ऊर्जा नष्ट हो जाती है, इस ऊर्जा को बचाने के लिए प्रतिदिन कुछ वक्त मौन रह कर बिताना चाहिए। इससे मानसिक तनाव तो कम होता ही है साथ ही स्वास्थ्य को भी फायदा मिलता है।

गांधी जी तो बाकायदा मौन व्रत रखते थे। प्रात:काल और सायंकाल जितनी देर संभव हो सके मौन रहना चाहिए। सुबह जल्दी उठें और टी.वी., रेडियो, म्यूजिक सिस्टम या मोबाइल फोन न चलाएं। प्राणायाम के कुछ चरण करें। यदि आपके मन में कोई विचार पनपता है तो इसे फलने-फूलने दें। किसी भी प्रकार की उत्तेजना पर ध्यान न दें। कुछ ही मिनटों के भीतर आप अपने अंदर की चुप के साथ संपर्क साध लेते हैं और ऐसी शांति व खुशी महसूस करते हैं जैसी पहले कभी न की हो। सुबह-सुबह मौन रहने से मन एकाग्र रहता है और रोजमर्रा के खास कामों को हम ठीक से कर पाते हैं। दिनभर के कई जरूरी काम मौन रहकर भी किए जा सकते हैं। शाम के समय मौन रहने से दिनभर के कार्य से जो मानसिक तनाव उत्पन्न होता है उससे मुक्ति मिलती है और मन शांत रहता है

आप ने कितनी बार यह अंग्रेजी वाक्यांश सुना है ‘साइलैंस इज गोल्डन’ (चुप्पी स्वर्णिम होती है) और इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया है कि क्या यह अब भी सच है? यह बात अक्सर लोगों को चक्कर में डाल देती है क्योंकि लोगों को अपने संगे-साथियों से ढेर सारी प्रशंसा और अटैंशन मिलती है। ध्वनि रहित होने का मंत्र जैसे बीते समय की बात हो गई है क्योंकि जो लोग अधिक बातचीत नहीं करते उन्हें अलग-सा और वैरागी माना जाता है परन्तु एक ऐसे युग में जहां आपके मन में तथा बाहर शोर ही शोर है, वहां चुप्पी आपके बचाव का पथ होना चाहिए।

No comments:

Post a Comment