Tuesday, 2 April 2013

पत्नी के अपमान का फल




राजा प्रसिचेत ने किसी कारणवश रुष्ट होकर अपनी पत्नी का परित्याग कर दिया। यह बात सर्वत्र फैल गई। प्रशासन में धीरे-धीरे अव्यवस्था फैलने लगी। लोग राजाज्ञा का खुलेआम उल्लंघन करने लगे। राज्य की व्यवस्थाएं अस्त-व्यस्त हो गईं। चारों ओर उत्पात होने लगे। राज्य की सीमा पर शत्रुओं ने आक्रमण कर दिया।

महाराज उसे रोकने के लिए सेना सहित जा रहे थे। मार्ग में महार्षि उद्दालक का आश्रम पड़ा तो वह उनसे मिलने के लिए रुके। महार्षि ने उनके शासकोचित  सम्मान की तैयारी की, लेकिन एक शिष्य ने जब पत्नी त्याग की बात ऋषि को बता दी, तो उन्होंने सम्मान की तैयारी स्थगित कर दी और साधारण व्यक्ति जैसा व्यवहार ही उनसे किया।

महाराज प्रसिचेत ने जब इस संबंध में पूछा तो महार्षि बोले, ‘‘राजन्! जो अपनी स्त्री का परित्याग कर देता है, उसे धर्म छोड़कर चला जाता है और धर्म द्वारा त्यागा हुआ मनुष्य सम्मान, सुख-शांति से भी रहित हो जाता है। देवताओं की साक्षी में स्वीकार की हुई पत्नी का त्याग कर आपने जो पाप किया है, उसके फलस्वरूप आपका अब सम्मान एवं सौभाग्य भी समाप्त होने वाला है।’’

राजा ने अपनी भूल समझी और पत्नी को अपनाया। उसके बाद से शासन की व्यवस्था भी ठीक हो गई। क्रोध का ही एक स्वरूप अहंकार है। कटुभाषण एवं दुव्र्यवहार भी कुसंस्कारी व्यक्तियों में ही देखे जाते हैं। इनका परिणाम भी क्रोध के समान ही अहितकर है।      
          

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