Tuesday, 2 April 2013

चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी शीतला अष्टमी के नाम से प्रसिद्घ है।

चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी शीतला अष्टमी के नाम से 

प्रसिद्घ है। 

इस दिन मां शीतला का पूजन किया जाता है तथा कच्ची लस्सी मां शीतला को चढ़ा कर आशीर्वाद पाया जाता है। कंजक पूजन करके परिवार के मंगलमय भविष्य की कामना की जाती है। मां शीतला के व्रत से बीमारियों से रक्षा होती है तथा किसी प्रकार का शारीरिक कष्ट वर्ष भर नहीं होता।

पोराणिक मान्यता अनुसार 

  माता शीतला जी की उत्पत्ति भगवान ब्रह्मा जी से हुई थी। ब्रह्मा जी नेमाता शीतला को धरती पर पूजे जाने के लिए भेजा था । देवलोक से धरती पर मां शीतला अपने साथ भगवान शिव के पसीने से बने ज्वरासुर को अपना साथी मानकर लाईं। तब उनके पास दाल के दाने भी थे। 

उस समय के राजा विराट ने माता शीतला को अपने राज्य में रहने के लिए कोई स्थान नहीं दिया तो माता शीतला क्रोधित हो गईं। उनके क्रोध की ज्वाला से राजा की प्रजा के शरीर पर लाल-लाल दाने निकल आए और लोग उस गर्मी से संतप्त हो गए तो राजा को अपनी गलती का एहसास हो गया। 


उन्होंने माता शीतला से माफी मांगकर उन्हें उचित स्थान दिया। लोगों ने माता शीतला के क्रोध को शांत करने के लिए ठंडा दूध एवं कच्ची लस्सी चढ़ाई और माता शांत हुईं। तबसे हर साल शीतला अष्टमी पर लोग मां का आशीर्वाद पाने के लिए ठंडे-बासी भोजन का प्रसाद मां पर चढ़ाने लगे और व्रत करने लगे।

क्या है पुण्य फल? 


इस दिन माता शीतला का पूजन करने से परिवार के लोग स्वस्थ एवं निरोग रहते हैं तथा माता शीतला अपने बच्चों पर कृपा करते हुए ठंडे झोंके प्रदान करती हैं ताकि किसी प्रकार का रोग परिवार के किसी सदस्य को न सताए। वैसे भी शीतलाष्टमी गर्मी के मौसम से पहले आती है तथा आगामी भीषण गर्मी से बचने के लिए पहले ही माता शीतला का पूजन करके उनकी कृपा प्रसाद रूप में प्राप्त की जाती है। इस व्रत में मां शीतला का पूजन किया जाता है तथा उन्हें ठंडी एवं बासी वस्तुएं चढ़ाई जाती हैं।


 कैसे होता है व्रत?


अष्टमी से पहले दिन सप्तमी तिथि यानी 2 अप्रैल को शाम को सूर्य ढलने के पश्चात तेल और गुड़ में खाने-पीने की वस्तुएं तैयार की जाएं जिनमें मीठी रोटी, मीठे चावल, गुलगुले, बेसन एवं आलू आदि भर कर नमकीन पूरियां तैयार कर सकते हैं। मां शीतला को अष्टमी के दिन मंदिर में जाकर कच्ची लस्सी के साथ सभी चीजों का भोग लगाया जाता है। 

मीठी रोटी के साथ दही और मक्खन, कच्चा दूध, भिगोए हुए काले चने, मूंग और मोठ आदि मां का भंगूर भी प्रसाद रूप में चढ़ाने की परम्परा है। माता शीतला को भोग लगाने के बाद मंदिर में बनी विभिन्न पिंडियों पर भी कच्ची लस्सी चढ़ाई जाती है तथा भगवान शिव के मंदिर में शिवलिंग पर कच्ची लस्सी चढ़ाकर आशीर्वाद लिया जाता है। 

कंजक पूजन की परम्परा

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वैसे तो भारत में हिन्दुओं के अनेक धार्मिक आयोजनों पर कंजक पूजन की परम्परा है परंतु नवरात्रों में इसका विशेष महत्व होता है। तभी तो कुछ लोग प्रत्येक नवरात्र में कंजक पूजन करते हैं। ऐसे ही चैत्र मास में शीतला अष्टमी पर कंजक पूजन करने की परम्परा है। माता को पहले दिन की बासी अथवा ठंडी वस्तुओं का भोग लगाने के बाद कंजक पूजन करके माता का आशीर्वाद लिया जाता है।

गर्म वस्तुओं का सेवन वर्जित है माता शीतला के पूजन में किसी प्रकार की गर्म वस्तु का न तो सेवन किया जाता है तथा न ही घर में उस दिन चूल्हा जलाया जाता है। यहां तक कि चाय भी नहीं पी जा सकती तथा पहले दिन बनाया गया भोजन ही बिना गर्म किए खाने की परम्परा है। ठंडी वस्तुएं खाने से ही व्रत पूरा होता है।



क्या लेकर आएं घर?

माता शीतला के मंदिरों में भारी मेला लगता है जहां जाकर भक्तजन मां शीतला का पूजन करते हैं। मेले में से हरे रंग का छोलिया तथा बेर प्रसाद के रूप में लाना शुभ माना जाता है। बच्चों के लिए मिट्टी के खिलौने घर लाने की परम्परा बहुत पुरानी है। माता पर चढ़ाई गई लस्सी का कुछ भाग लाकर घर के सभी ओर छिड़का जाता है, जो माता के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। 
पूजा जाता है जेठा मंगल

कुछ लोग तो फाल्गुन मास की पूर्णिमा से तथा कुछ लोग फाल्गुन मास की संक्रांति से माता शीतला पर लस्सी चढ़ाना शुरू कर देते हैं। वे महीना भर माता शीतला की पूजा करते हैं। माता शीतला का पूजन होली के बाद पहले मंगलवार से भी किया जाता है क्योंकि उस दिन जेठा मंगलवार पूजने की परम्परा भी काफी पुरानी चल रही है। 

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